
हाल ही में दक्षिण कोरिया के बुसान में स्थित जानी-मानी अंतरराष्ट्रीय संस्था 'एपैक क्लाइमेट सेंटर' (APCC) ने मौसम को लेकर एक बेहद अहम रिपोर्ट जारी की है. यह सेंटर पूरी दुनिया के मौसम, जलवायु परिवर्तन और खासकर मौसम के बड़े बदलावों पर पैनी नज़र रखने के लिए जाना जाता है. इस ताजा रिपोर्ट में सितंबर से लेकर नवंबर तक के मौसम का एक पूर्वानुमान जारी किया गया है. इस रिपोर्ट के मुताबिक,अल-नीनो के असर की वजह से पूरी दुनिया में तापमान सामान्य से काफी ज़्यादा रहने वाला है. साफ शब्दों में कहें तो गर्मी और तपिश ज्यादा रहेगी आर्कटिक सागर से लेकर यूरोप, अफ्रीका, अपना पूरा एशिया, प्रशांत महासागर और कैरेबियन देशों तक में तापमान के सामान्य से ऊपर रहने की बहुत ज़्यादा गुंजाइश है. इस रिपोर्ट में कोई सटीक आंकड़ा या डिग्री तो नहीं बताई गई है इन तीन महीनों में दुनिया के ज़्यादातर हिस्सों में ज्यादी गर्मी का एहसास होगा. उत्तरी अमेरिका और रूस के कुछ हिस्सों में भी पारा चढ़ने का पूरा अंदेशा है. ज़ाहिर सी बात है कि मौसम के नेचर का ये बदला रूप से पूरी दुनिया को परेशान करने वाला है.
इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के लिए कोई अच्छी खबर नहीं है. जहां एक तरफ पूर्वी प्रशांत और दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में झमाझम बारिश की उम्मीद है, वही अंदेशा ये जताया जा रहा है कि सितंबर के महीने में भारत में सामान्य से कम बारिश हो सकती है. मध्य भारत के कुछ हिस्सों में हल्की-फुल्की बारिश की उम्मीद भले ही बनी रह सकती है. हालांकि, इस बात का कोई पक्का पैमाना नहीं दिया गया है कि कितने मिलीमीटर पानी कम बरसेगा, लेकिन ये साफ है कि बारिश में अच्छी खासी कमी देखने को मिलेगी. कुल मिलाकर देश का बड़ा हिस्सा सूखे की मार झेल सकता है. इससे हमारी खेती, नदियों के जलस्तर और पीने के पानी की जरूरतों पर सीधा और गहरा असर पड़ना लगभग इस तय माना जा रहा है. आखिर अचानक से ये सब हो क्यों रहा है?
इसकी सबसे बड़ी वजह है 'अल-नीनो' बढ़ता हुआ प्रभाव. जब प्रशांत महासागर के पानी का तापमान सामान्य से ज़्यादा गर्म हो जाता है, तो ये पूरी दुनिया के मौसम का सिस्टम बिगाड़ कर रख देता है. समंदर के इस बढ़ते तापमान की वजह से हवाओं का रुख पूरी तरह से बदल जाता है. जो हवाएं मानसून के सीज़न में नमी लेकर भारत की तरफ आती हैं, वो कमज़ोर पड़ जाती हैं या उनका रास्ता ही भटक जाता है. नतीजा ये होता है कि हमारे यहां बारिश कम हो जाती है और आसमान साफ रहने की वजह से सूरज की सीधी किरणें जमीन पर भयंकर गर्मी बढ़ाने लगती हैं. यही वो वजह है जिससे मौसम का पूरा चक्र गड़बड़ हो जाता है.
अगर हम ख़ास तौर पर सितंबर बात करें, तो यह वक़्त अपने देश की खेती-बाड़ी के लिए बहुत ही अहम होता है. आम तौर पर इस मौसम में मॉनसून की आखिरी बारिश होती है. इस वक्त सितम्बर के बाद अक्टूबर में खरीफ की फसलें जैसे धान, सोयाबीन और मक्का लगभग पकने और कटाई के बिल्कुल करीब होती हैं. इसलिए सितंबर में इन फसलों को पानी की बहुत सख्त जरूरत होती है, ताकि अनाज के दाने अच्छी तरह भर सकें, उनका वजन बढ़े और क़्वालिटी शानदार हो. अगर ऐन इसी नाजुक वक्त पर पानी नहीं बरसेगा, तो जाहिर सी बात है कि किसानों का भारी नुकसान होना तय है. पानी की कमी से पौधों की बढ़वार अचानक रुक जाएगी, उनका सही से विकास नहीं होगा और पैदावार बुरी तरह गिर जाएगी.
खरीफ की फसलों के नुक़सान के बाद, एक और बड़ी मुश्किल रबी की फसलों की बुवाई को लेकर खड़ी हो सकती है. गन्ना गेहूं, चना, सरसों और आलू जैसी बेहद अहम फसलें सर्दियों की शुरुआत में बोई जाती हैं. किसी भी बीज को ज़मीन में पनपने और अंकुरित होने के लिए नमी की जरूरत होती है,जो मॉनसून की आखिरी बारिश की बदौलत ही मिलती है. अगर सितम्बर कम बारिश और अक्टूबर, नवम्बर में तापमान बढ़ने पर खेतों की मिट्टी पूरी तरह सूखकर चटक जाएगी. जमीन में नमी ना होने की वजह से किसानों को मजबूरन अपनी सिंचाई के लिए ट्यूबवेल, बोरवेल या नहरों के पानी का भारी इंतजाम करना होगा. इस पूरी कोशिश में उनका बहुत ज़्यादा पैसा मेहनत और कीमती वक्त बर्बाद होगा. अगर इस परेशानी के चलते बुवाई में जरा सी भी देरी हुई, तो इसका सीधा असर आगे चलकर रबी फसलों की पैदावार पर पड़ेगा. यानी,अल-नीनो का यह मनहूस साया लगातार दो सीजनों को अपनी चपेट में ले सकता है.
इस तमाम मायूसी और खौफ के बीच प्राकृतिक उम्मीद की एक शानदार किरण भी मौजूद है. जैसे इस साल जून के सूखे के बाद मौसम ने जिस तरह अचानक करवट ली, उसने किसानों को एक बड़ी राहत मिली. मौसम विभाग के ताजा रुझानों पर गौर करें, तो 15 जुलाई से 15 अगस्त के बीच हालात में एक शानदार बदलाव देखने को मिला. इस दौरान हिंद महासागर में 'पॉजिटिव इंडियन ओशन डाइपोल' (नाम का मौसमी सिस्टम तेजी से ऐक्टिव हुआ. हिंद महासागर की इस हलचल ने सुस्त पड़े मॉनसून को एक नई ताकत दी, जिसके असर से देश के कई हिस्सों में झमाझम बारिश हुई. इसका नतीजा था कि किसानों ने बिना कोई वक्त गंवाए तेजी से अपनी रुकी हुई बुवाई पूरी कर ली और खेती का बिगड़ा हुआ आंकड़ा वापस पटरी पर आ गया.
कृषि मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, 21 अगस्त 2026 तक देश भर में 1,056.70 लाख हेक्टेयर जमीन पर खरीफ की फसलें बोई जा चुकी हैं. हालांकि, अगर पिछले साल के इसी वक्त से हम इसका मिलान करें, तो ये आंकड़ा थोड़ा पीछे है. पिछले साल इसी समय तक 1,072.77 लाख हेक्टेयर में बुवाई हो गई थी. इसका सीधा मतलब ये हुआ कि इस बार बुवाई का रकबा करीब 16.07 लाख हेक्टेयर यानी मात्र 1.50 फीसदी कम है. अब सबसे बड़ी उम्मीद इसी बात पर टिकी है कि हिंद महासागर का यह मेहरबान मिज़ाज आगे भी क़ायम रहे.