
इस साल अल नीनो बनने की संभावनाओं को और मजबूत करते हुए, अमेरिका की राष्ट्रीय मौसम एजेंसी के ताजा अपडेट में कहा गया है कि भारत में कम मॉनसून बारिश से जुड़ी यह मौसम की स्थिति जून-अगस्त की तिमाही में ही शुरू हो सकती है. इस बात की एक-तिहाई संभावना है कि यह एक मजबूत घटना का रूप ले लेगी जिससे बारिश कम होगी और सूखे की संभावना अधिक होगी.
गुरुवार को अमेरिका के पूर्वानुमान केंद्र की ओर से जारी अपडेट में जून-अगस्त तक अल नीनो के उभरने की 62% संभावना जताई गई है, जो बाद के महीनों में बढ़कर 80% से ज्यादा हो जाएगी. जून-अगस्त का महीना बारिश के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण होता है जो भारत में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून का समय होता है.
अमेरिका की इस एजेंसी ने 12 फरवरी को भी अल नीनो का अपडेट दिया था जिसमें संभावना कम जताई गई थी. लेकिन ताजा अपडेट में काफी अधिक एक्टिविटी की संभावना जताई गई है. 12 फरवरी के अपडेट में जुलाई-सितंबर तक अल नीनो शुरू होने की 52% संभावना जताई गई थी, जो बाद के महीनों में बढ़कर लगभग 60% हो गई थी.
केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के पूर्व सचिव और अनुभवी मौसम विज्ञानी एम. राजीवन ने 'टाइम्स ऑफ इंडिया' से कहा, "हालांकि अगले दो महीनों में स्थिति और साफ हो जाएगी, लेकिन हम काफी हद तक निश्चित हो सकते हैं कि इस साल अल नीनो शुरू होगा, क्योंकि IMD सहित दुनिया भर की प्रमुख मौसम एजेंसियों में इस पर आम सहमति है. भारत में कम मॉनसून बारिश से इस मौसम की स्थिति के जुड़ाव को देखते हुए, सरकार को उसी के अनुसार तैयारी करनी चाहिए."
अल नीनो की स्थिति तब बनती है जब मध्य-पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का पानी गर्म होता है, जो हवा के पैटर्न में बदलाव लाता है. ये दोनों मिलकर दुनिया भर के मौसम पर गहरा असर डालते हैं.
1980 के बाद से, 14 अल नीनो वाले साल रहे हैं, जिनमें से नौ साल भारत में कम मॉनसून वाले रहे हैं, जिनमें बारिश लंबे समय के औसत से कम से कम 10% कम हुई है. एक और साल 2018 में, मॉनसून कमजोर स्थिति के करीब था जो -9.4% पर था.
राजीवन ने कहा, "भारत में अल नीनो और कमजोर मॉनसून के बीच गहरा संबंध है, हालांकि कुछ अपवाद भी रहे हैं. इसका सबसे खास उदाहरण 1997 है, जब बहुत मजबूत अल नीनो के बावजूद मॉनसून सामान्य रहा था."
1997 में पॉजिटिव 'इंडियन ओशन डाइपोल' (IOD) ने अल नीनो के असर को कम कर दिया था. पूर्वानुमानों से पता चलता है कि इस मॉनसून में IOD के पॉजिटिव रहने की संभावना है. अगर ऐसा होता है तो अल नीनो का असर कम हो सकता है.
राजीवन ने कहा, IOD के पूर्वानुमान बहुत कम भरोसेमंद होते हैं, और भारतीय मॉनसून पर इसका असर मजबूत और एक जैसा नहीं होता.
अमेरिका का यह अपडेट, 'यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट्स' की एक रिपोर्ट से अलग है. उस रिपोर्ट में प्रशांत महासागर के ज्यादा तेजी से गर्म होने का अनुमान लगाया गया था, और इस साल के आखिर में एक बहुत ही मजबूत या 'सुपर' अल नीनो की संभावना जताई गई थी, जिससे शायद पहले कभी न देखी गई लू की स्थिति बन सकती है.