राजस्थान के भीलवाड़ा की अन्नू कानावत आज हर उस महिला के लिए एक मिसाल हैं, जो सामाजिक बंधनों के बावजूद अपने सपनों को पूरा करना चाहती हैं. एक सिसोदिया राजपूत परिवार में जन्मीं अन्नू ने एक ऐसा रास्ता चुना, जिसे समाज ने आसानी से स्वीकार नहीं किया. शुरुआती दिनों में उन्हें तानों और विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. यही विरोध उनकी ताकत बना और मशरूम की खेती उनके जीवन में एक बड़े बदलाव की वजह बनी.
मशरूम की खेती में आने से पहले अन्नू जयपुर के एक विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर थीं. उनके पास एक सुरक्षित नौकरी और भविष्य था. अपने छात्रों के साथ एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में देहरादून जाने पर उन्हें मशरूम उत्पादन और उसके प्रसंस्करण (processing) के बारे में जानने का मौका मिला. उनके मन में हमेशा से एक उद्यमी बनने का सपना था और मशरूम उद्योग में उन्हें यह सपना साकार करने का एक रास्ता दिखा, जिसमें कम लागत में शुरुआत की जा सकती थी.अन्नू एक पूरानी विचारो वाले परिवार से आती थीं, जहां लड़कियों की उच्च शिक्षा पर ज्यादा जोर नहीं दिया जाता था. उन्हें 12वीं के बाद आगे की पढ़ाई के लिए भी विरोध का सामना करना पड़ा. अपनी लगन से उन्होंने उदयपुर कृषि विश्वविद्यालय में बीएससी (कृषि) में प्रवेश लिया और फिर एमबीए की डिग्री हासिल की.
साल 2018 में देहरादून यात्रा के बाद अन्नू ने मशरूम की खेती करने का फैसला किया. उन्होंने देखा कि राजस्थान में बटन मशरूम की मांग तो बहुत है, लेकिन इसकी उपलब्धता सीमित है. उन्होंने अपने मायके, भीलवाड़ा के आमल्दा गांव में दो खाली कमरों में छोटे स्तर पर परीक्षण शुरू किया. सिर्फ ₹5,000 के शुरुआती निवेश से उन्होंने बटन मशरूम के बीज ऑनलाइन मंगवाए. 60 दिनों के अंदर ही उन्हें ₹1.5 लाख का मुनाफा हुआ.
इस सफलता से उत्साहित होकर उन्होंने ऑयस्टर मशरूम की खेती की ओर रुख किया, क्योंकि यह सिर्फ 45 दिनों में तैयार हो जाती है, जबकि बटन मशरूम में चार महीने लगते हैं.
जब उनका कारोबार बढ़ रहा था, तभी कोरोना महामारी और लॉकडाउन एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया. लाखों रुपये का मशरूम तैयार था, लेकिन बाजार बंद थे. ऐसे में अन्नू ने हार मानने की बजाय इस संकट को अवसर में बदल दिया. उन्होंने मशरूम को सुखाकर उसका पाउडर, कैप्सूल और तरल अर्क (liquid extract) बनाने की तकनीक विकसित की. लॉकडाउन के दौरान उन्होंने गांव की कुपोषित महिलाओं को मुफ्त में मशरूम पाउडर बांटा, जिससे उनके स्वास्थ्य में तेजी से सुधार देखा गया. यहीं से उनकी कंपनी आमल्दा ऑर्गेनिक फूड्स की मजबूत नींव पड़ी.
आज लोग अन्नू को 'मशरूम क्वीन' के नाम से जानते हैं. उनकी कंपनी, आमल्दा ऑर्गेनिक फूड्स, जिसकी स्थापना 2020 में हुई, आज सालाना ₹1 करोड़ का कारोबार कर रही है. यह राजस्थान की पहली ऐसी कंपनी है जिसे मशरूम से बने उत्पादों के लिए आयुर्वेद विभाग से मान्यता मिली है. वे ऑयस्टर, कॉर्डिसेप्स, लायंस मेन और रेशी सहित लगभग 10 किस्म के मशरूम उगा रही हैं. इनसे बिस्कुट, आचार, मॉर्निंग बूस्टर और कैप्सूल जैसे 50 से ज्यादा उत्पाद बनाए जा रहे हैं.अन्नू ने न केवल खेती की, बल्कि उसमें कई नए प्रयोग भी किए. उन्होंने मशरूम की फसल को 60-70 दिनों की जगह 45 दिनों में तैयार करने का तरीका विकसित किया. कॉर्डिसेप्स जैसे महंगे मशरूम, जो बाजार में 3-4 लाख रुपये प्रति किलो बिकता है, उसे उन्होंने राजस्थान की गर्म जलवायु में उगाकर लागत को घटाकर 1.5 लाख रूपये प्रति किलो कर दिया है.
अन्नू का लक्ष्य सिर्फ मुनाफा कमाना नहीं, बल्कि ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना है. उन्होंने पिछले सात सालों में देश भर की डेढ़ लाख से ज्यादा महिलाओं को मशरूम की खेती का प्रशिक्षण दिया है. आज 30 से ज्यादा महिलाएं उनके साथ सीधे तौर पर काम कर रही हैं और हर महीने अच्छी कमाई कर रही हैं.अन्नू का मानना है कि मशरूम सिर्फ एक पौष्टिक आहार ही नहीं, बल्कि यह कैंसर, शुगर और ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों की रोकथाम में भी मददगार है. वह चाहती हैं कि मशरूम हर आम आदमी की थाली तक पहुंचे ताकि कुपोषण से लड़ाई को आसान बनाया जा सके.