
बिहार कृषि विभाग राज्य के जल, मिट्टी और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को लेकर काम कर रहा है. इस साल इन क्षेत्रों में और ज्यादा बेहतर तरीके से कार्य हो. इसके लिए विभाग की ओर से वाटरशेड विकास घटक के तहत वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए ₹66.15 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की गई है. वाटरशेड विकास को लेकर विभाग के कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने कहा कि राज्य सरकार जल, मिट्टी और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ-साथ किसानों की आय बढ़ाने के लिए निरंतर कोशिश कर रही है. वहीं, उन्होंने अधिकारियों को निर्देश देते हुए कहा कि इस योजना के तहत किसानों को लाभ सही तरीके से और सही समय पर मिलना चाहिए.
बता दें कि कृषि प्रधान राज्य बिहार में आज भी खेती मॉनसून की बारिश पर निर्भर है. एक ओर जहां उत्तरी बिहार में पानी की प्रचुर मात्रा उपलब्ध है, वहीं दक्षिणी बिहार के कई जिलों में पानी की काफी किल्लत है, जिसमें गया, जमुई, बांका, मुंगेर और औरंगाबाद जैसे जिले शामिल हैं. इन जिलों में बारिश का पानी काफी तेजी से बह जाता है. वहीं, सरकार ऐसे जिलों को चिन्हित कर वाटरशेड विकास घटक के तहत बारिश के पानी का संग्रह करने के लिए चेक डैम और खेत-तालाब का निर्माण करा रही है.
कृषि मंत्री ने कहा कि राज्य के चयनित वाटरशेड इलाकों में मिट्टी के संरक्षण, जल संचयन, खेत-तालाब निर्माण, मेड़बंदी, नाला उपचार, वृक्षारोपण, चेक डैम और अन्य जल संरक्षण संरचनाओं का निर्माण और सुदृढ़ीकरण शामिल है. इन गतिविधियों से बारिश के पानी का बेहतर इस्तेमाल होगा, मिट्टी का कटाव रुकेगा और सूखे जैसी परिस्थितियों में भी खेती को सहारा मिलेगा.
उन्होंने आगे बताया कि इस कार्यक्रम के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी और स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे, जिसका सीधा फायदा किसानों को मिलेगा. इन सुविधाओं के जरिए किसानों को जहां सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध होगा, वहीं, फसल उत्पादन के साथ भूमि की उर्वरता में भी काफी सुधार होगा.
कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने कहा कि बिहार की कृषि व्यवस्था को बेहतर करने के लिए केंद्र सरकार के स्तर पर भी काफी मदद मिल रही है. केंद्र और राज्य सरकार मिलकर राज्य के कृषि क्षेत्र को आधुनिक, टिकाऊ और लाभकारी बनाने का काम करेगी. वाटरशेड आधारित विकास कार्य प्रधानमंत्री के जल संरक्षण और खेत संरक्षण के संकल्प को भी मजबूती प्रदान करेंगे.
इससे प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, जल उपलब्धता में वृद्धि और किसानों की आय में सुधार होगा. वहीं, उन्होंने संबंधित पदाधिकारियों को निर्देश दिया कि मंजूर राशि का इस्तेमाल निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुरूप समयबद्ध, पारदर्शी और गुणवत्तापूर्ण तरीके से किया जाए, ताकि योजनाओं का लाभ अधिकतम किसानों, ग्रामीण परिवारों और जलछाजन क्षेत्रों के निवासियों तक पहुंच सके.