बिहार के मत्स्य क्षेत्र में बड़ी छलांग, ICAR–कॉफेड समझौते से बढ़ेगा उत्पादन और किसानों की आय

बिहार के मत्स्य क्षेत्र में बड़ी छलांग, ICAR–कॉफेड समझौते से बढ़ेगा उत्पादन और किसानों की आय

बिहार में मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के लिए ICAR और कॉफेड के बीच समझौता हुआ है. इससे आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षण और सहकारी मॉडल के जरिए उत्पादन और किसानों की आय में बड़ी बढ़ोतरी की उम्मीद है.

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अंक‍ित कुमार स‍िंह
  • Patna,
  • Jul 01, 2026,
  • Updated Jul 01, 2026, 12:58 PM IST

बिहार के मत्स्य किसानों और मछुआरों के लिए एक नई उम्मीद जगी है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना और बिहार कॉपरेटिव फिशरीज फेडरेशन (कॉफेड) के बीच 30 जून 2026 को एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए. यह समझौता वैज्ञानिक तकनीक, अनुसंधान और सहकारी मॉडल को जोड़कर मत्स्य क्षेत्र को नई ऊंचाई देने वाला साबित होगा.

समझौते का उद्देश्य और महत्व

समझौता ज्ञापन कॉफेड की 2398वीं बोर्ड बैठक के दौरान संपन्न हुआ. मुख्य अतिथि बिहार विधान परिषद सदस्य और पूर्व मंत्री हरि सहनी ने कहा कि राज्य विभाजन के बाद बिहार को मिले विशाल जल संसाधन आर्थिक प्रगति की सबसे बड़ी संभावना हैं. उन्होंने मछली, मखाना और सिंघाड़ा की एकीकृत खेती पर जोर देते हुए मत्स्य क्षेत्र को मजबूत बनाने की आवश्यकता बताई. ICAR पूर्वी अनुसंधान परिसर के निदेशक डॉ. अनुप दास ने कहा कि यह साझेदारी मत्स्य किसानों तक आधुनिक तकनीक और अनुसंधान पहुंचाएगी. इससे उत्पादन बढ़ेगा, आय सुधरेगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी.

मत्स्य उत्पादन बढ़ाने के लिए संयुक्त प्रयास

समझौते के तहत गन्ना उत्पादन बढ़ाने, उन्नत प्रजातियों का विकास, आधुनिक तकनीकों का प्रसार, किसानों का प्रशिक्षण और मत्स्य आधारित उद्यमिता को बढ़ावा दिया जाएगा. संस्थान एकीकृत मत्स्य पालन, झींगा पालन, बायोफ्लॉक तकनीक, अजोला उत्पादन, सजावटी मत्स्य पालन और बैकयार्ड हैचरी जैसे क्षेत्रों में काम कर रहा है. बैठक में बताया गया कि बिहार की मछलियों की गुणवत्ता और स्वाद देशभर में प्रसिद्ध है. अगर 8 लाख हेक्टेयर जल क्षेत्र का वैज्ञानिक उपयोग किया जाए, तो मत्स्य उत्पादन और किसानों की आय में भारी वृद्धि संभव है.

मछुआरों और किसानों को मिलेगा लाभ

यह समझौता मत्स्य किसानों को वैज्ञानिक तरीके से जोड़ेगा. सजावटी मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन और जल संसाधनों के बेहतर उपयोग से नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे. आपदा प्रबंधन विभाग के उप सचिव पंकज कुमार कमल ने कहा कि मत्स्यजीवी समुदाय राज्य की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ आपदा प्रबंधन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

भविष्य की मजबूत नींव

कॉफेड के अध्यक्ष प्रयाग साहनी और प्रबंध निदेशक ऋषिकेश कश्यप ने इस साझेदारी को बिहार के मत्स्य क्षेत्र के विकास में मील का पत्थर बताया. कार्यक्रम के समापन पर प्रतिभागियों ने संस्थान के अनुसंधान प्रक्षेत्र का भ्रमण किया और नवीन तकनीकों का अवलोकन किया.

चौर भूमि पर मत्स्य पालन

बिहार सरकार ने बेकार पड़ी चौर भूमि को मछली पालन के लिए उपयोगी बनाने की दिशा में बड़ा काम किया है. पिछले तीन सालों में मुख्यमंत्री चौर विकास योजना के तहत 2.72 हजार हेक्टेयर भूमि पर नए तालाब बनाए गए हैं. इससे ना सिर्फ बेकार जमीन उपयोगी बनी है, बल्कि हजारों किसानों और मछुआरों की आय में भी अच्छी बढ़ोतरी हुई है. कृषि रोडमैप के तहत मुख्यमंत्री चौर विकास योजना उत्तर बिहार के चौर-बहुल जिलों में लागू की गई. वित्तीय वर्ष 2022-23 से 2025-26 तक 2,800 हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले 2,721.73 हेक्टेयर में आधुनिक तालाब तैयार कर लिए गए. इन तालाबों से मछली पालन को मजबूती मिली है. साथ ही, 5,264 ट्यूबवेल लगाकर साल भर पानी की उपलब्धता सुनिश्चित की गई है.

मछली उत्पादन में तेज उछाल

वर्ष 2024-25 में राज्य का मछली उत्पादन 9.69 लाख मीट्रिक टन था, जो 2025-26 में बढ़कर 10.28 लाख मीट्रिक टन हो गया. बिहार अब मछली उत्पादन में आत्मनिर्भर होने के साथ-साथ निर्यात की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है.

किसानों की आय और समृद्धि

इस योजना से मछली पालक किसानों की आय में अच्छी वृद्धि हुई है. बेकार पड़ी भूमि अब आय का स्रोत बन गई है. सरकार का लक्ष्य है कि चौर भूमि को पूर्ण रूप से उपयोगी बनाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जाए.

भविष्य की दिशा

सरकार इस योजना को और विस्तार देने की तैयारी में है. इससे ना सिर्फ मछली उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे. बिहार की यह पहल देश के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन सकती है.

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