
भारत और अमेरिका के बीच हुए नए व्यापार करार को सरकार बड़ी उपलब्धि बता रही है. मंत्री बयान दे रहे हैं और इसे देश के लिए फायदेमंद बताया जा रहा है. लेकिन इस करार को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. क्या वाकई यह समझौता भारत के किसानों और आम लोगों के हित में है, या फिर नुकसान को जीत बताने की कोशिश की जा रही है? जब सच्चाई की परतें खुलती हैं, तो तस्वीर कुछ और ही नजर आती है.
पियुष गोयल ने कहा कि भारत–अमेरिका करार से देश को फायदा होगा. लेकिन आलोचकों का कहना है कि सरकार पूरी सच्चाई नहीं बता रही है. उनका मानना है कि हार को जीत बताने की कोशिश की जा रही है. इसलिए इस करार को ठीक से समझना बहुत जरूरी है.
भारत आमतौर पर बाहर से आने वाले सामान पर टैक्स लगाता है. खेती से जुड़े सामान पर यह टैक्स और ज्यादा होता है. लेकिन इस नए करार में अमेरिका से आने वाले सामान पर टैक्स शून्य कर दिया गया है. इसका मतलब यह है कि अब अमेरिका का सामान बिना टैक्स के भारत आएगा. इससे यह सवाल उठता है कि भारत को इसमें फायदा कैसे होगा.
अमेरिका में किसानों को सरकार बहुत ज्यादा मदद देती है. वहां खेती बड़े पैमाने पर होती है और नई तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है. इस वजह से वहां का खेती का सामान बहुत सस्ता होता है. जब यही सस्ता अनाज, दाल, फल, दूध और दूसरे उत्पाद बिना टैक्स भारत आएंगे, तो भारतीय किसानों को अपनी फसल कम दाम पर बेचनी पड़ेगी. इससे किसानों को भारी नुकसान होगा और उनकी हालत और खराब हो सकती है.
पहले भारत से अमेरिका जाने वाले सामान पर बहुत कम टैक्स लगता था. अब इस करार के बाद अमेरिका ने उस टैक्स को बढ़ा दिया है. इसका मतलब यह है कि भारत का सामान अमेरिका में महंगा हो जाएगा. जब सामान महंगा होगा तो उसकी बिक्री भी कम होगी. इससे भारतीय व्यापारियों और मजदूरों को नुकसान झेलना पड़ेगा.
इस करार के बाद अमेरिका का ऐसा खाना भारत में आएगा, जो खास तकनीक से बनाया गया है. कुछ खाने की चीजें ऐसे तरीकों से तैयार की जाती हैं, जिनका असर सेहत पर पड़ सकता है. जब ऐसा खाना हर भारतीय की थाली तक पहुंचेगा, तो यह सोचना जरूरी है कि इसका हमारी सेहत पर क्या असर होगा.
आलोचकों का कहना है कि यह समझना मुश्किल है कि सरकार ने यह करार किन मजबूरियों में किया. उनका मानना है कि यह करार भारतीय किसानों, मजदूरों और आम लोगों के हित में नहीं है. यह एक घाटे का सौदा लगता है.
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और किसान सभा का कहना है कि सरकार को सिर्फ बयान नहीं देने चाहिए. सरकार को इस करार की पूरी जानकारी संसद और जनता के सामने रखनी चाहिए. जब पूरा सच सामने आएगा, तभी लोग समझ पाएंगे कि यह करार देश के लिए सही है या नहीं.
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