क्या आपने देखा है कि जैसे ही खेत में यूरिया डाला जाता है, कुछ ही दिनों में फसल की पत्तियां गहरी हरी दिखने लगती हैं. किसान अक्सर कहते हैं कि यूरिया डालते ही फसल में जान आ जाती है. यह कोई जादू नहीं है, इसके पीछे सीधा सा विज्ञान है, जिसे बच्चा भी समझ सकता है. इसके पीछे का राज है- पर्णहरिम (क्लोरोफिल), जो पौधों को हरा रंग देने वाला पदार्थ होता है. यही धूप से खाना बनाने में पौधे की मदद करता है.
दरअसल, क्लोरोफिल बनाने के लिए पौधे को सबसे ज्यादा जरूरत नाइट्रोजन की होती है और यूरिया में इसकी मात्रा भरपूर होती है. जैसे ही पौधे को यूरिया से नाइट्राेजन मिलती है, वह तेजी से क्लोरोफिल बनाता है और पत्तियां हरी दिखने लगती हैं. यही कारण है कि यूरिया डालते ही जल्द खेत में हरियाली बढ़ जाती है.
अगर किसी फसल में नाइट्रोजन की कमी हो जाए तो पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं. जैसे ही सही मात्रा में यूरिया मिलता है. वही पत्तियां फिर से हरी हो जाती हैं. यही नाइट्रोजन की पहचान मानी जाती है. अब सवाल यह है कि यूरिया हर फसल में जरूरी है या नहीं. जवाब है- हां, लेकिन सही मात्रा में. यूरिया दवा की तरह है. कम हो तो फायदा, ज्यादा हो तो नुकसान.
गेहूं: आमतौर पर गेहूं को ज्यादा नाइट्रोजन चाहिए. खेत में बुवाई के बाद और फिर पहली सिंचाई के आसपास यूरिया दिया जाता है. इससे पौधे ज्यादा फुटाव करते हैं और बालियां अच्छी बनती हैं.
धान: धान में यूरिया एक बार में नहीं देना चाहिए. इसे 2 या 3 हिस्सों में दिया जाता है. इससे पौधा मजबूत रहता है और नाइट्रोजन की बर्बादी कम होती है. कृषि वैज्ञानिक भी हिस्सों में छिड़काव की सलाह देते हैं.
मक्का: मक्का तेजी से बढ़ने वाली फसल है. इसे नाइट्रोजन की अच्छी खासी जरूरत होती है. सही समय पर यूरिया देने से भुट्टे में दाने अच्छे बनते हैं.
दालें: यहां किसान को सबसे ज्यादा सावधान रहना चाहिए. दालें खुद भी मिट्टी में नाइट्रोजन बनाती हैं. इसलिए इन्हें बहुत कम यूरिया चाहिए. ज्यादा यूरिया देने से सिर्फ पत्तियां बढ़ेंगी, दाना नहीं. ICAR भी दालों में कम नाइट्रोजन देने की सलाह देता है.
यहीं पर सबसे जरूरी बात है. ज्यादा यूरिया देने से पौधा बहुत कोमल हो जाता है. ऐसे पौधों पर कीट और बीमारी जल्दी लगती है. कई बार फसल गिर भी जाती है. फिर किसान शिकायत करते हैं कि फसल ‘बिछ’ गई. इसके अलावा अगर यूरिया को मिट्टी में न मिलाया जाए तो उसकी नाइट्रोजन हवा में उड़ जाती है. यानी पैसा भी गया और फायदा भी नहीं मिला. वैज्ञानिक इसे अमोनिया लॉस (ammonia loss) कहते हैं.
यूरिया पत्तियों को हरा करता है, क्योंकि उसमें नाइट्रोजन होती है. लेकिन हरियाली ही अच्छी फसल की गारंटी नहीं है. सही समय, सही मात्रा और सही तरीके से दिया गया यूरिया ही असली फायदा देता है. इसलिए मिट्टी जांच, कृषि विभाग की सलाह और जरूरत के हिसाब से ही यूरिया का इस्तेमाल करें. यही समझदार किसान की पहचान है.