
बारिश हमारे जीवन का बहुत अहम हिस्सा है. खेतों में फसल उगाने से लेकर पीने के पानी की उपलब्धता तक, सब कुछ मॉनसून पर निर्भर करता है. लेकिन कई बार बारिश उम्मीद से कम हो जाती है. इसके पीछे एक बड़ा कारण होता है अल-नीनो (El-Nino), जो समुद्र में होने वाला एक खास मौसम बदलाव है.
दरअसल, El-Nino प्रशांत महासागर में उत्पन्न होने वाली एक स्थिति है, जब वहां का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है. यह गर्म पानी हवा और बादलों के रास्ते को बदल देता है. इसे ऐसे समझें- जैसे कि बादल भारत की तरफ आ रहे हों, लेकिन इसके बजाय वो रास्ता भटक जाएं. जब ऐसा होता है तो हमारे देश में बारिश कम होती है.
भारत में मॉनसून की हवाएं समुद्र से नमी लेकर आती हैं. यही नमी बाद में बारिश बनती है. लेकिन El-Nino के समय ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं और बादल सही मात्रा में नहीं बनते. इसका सीधा असर यह होता है कि कई राज्यों में बारिश कम हो जाती है और गर्मी ज्यादा महसूस होती है. वहीं, इस कम बारिश का असर सीधे खरीफ सीजन की खेती पर पड़ता है. फिर बाद में रबी सीजन की खेती पर.
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के मुताबिक, साल 2026 में जून से सितंबर के बीच देश में कुल बारिश सामान्य से थोड़ी कम रह सकती है. अनुमान है कि इस बार मॉनसून की बारिश Long Period Average यानी LPA का करीब 92 प्रतिशत (±5 प्रतिशत) रह सकती है. LPA का मतलब है लंबे समय की औसत बारिश, जो 1971 से 2020 के आधार पर तय की गई है. इस हिसाब से 92 प्रतिशत को “सामान्य से कम” यानी below normal माना जाता है.
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस साल El-Nino बनने की संभावना है, जो मॉनसून को कमजोर कर सकता है. हालांकि, हिंद महासागर में फिलहाल स्थिति सामान्य है, लेकिन सीजन के आगे बढ़ने के साथ पॉजिटिव इंडियन ओशन डायपोल (IOD) बनने के संकेत हैं. यह IOD कुछ हद तक बारिश को सहारा दे सकता है, लेकिन El-Nino का असर फिर भी भारी पड़ सकता है.
मौसम वैज्ञानिकों ने यह भी बताया है कि इस साल सर्दियों में उत्तरी गोलार्ध में बर्फ का स्तर सामान्य से थोड़ा कम रहा है. इसका मॉनसून से उल्टा संबंध होता है, यानी जब वहां बर्फ कम होती है तो भारत में बारिश भी कमजोर पड़ सकती है.
निजी मौसम एजेंसी स्काईमेट (Skymet) ने भी 2026 के मॉनसून को लेकर मिलता-जुलता अनुमान दिया है. स्काईमेट के मुताबिक, इस बार बारिश LPA का करीब 94 प्रतिशत रह सकता है. जून का महीना सामान्य रह सकता है, लेकिन जुलाई से सितंबर के बीच बारिश में कमी देखने को मिल सकती है. खासकर उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत में कम बारिश की आशंका प्रबल है.