
गुजरात के मोरबी जिले में किसानों का आंदोलन अब धीरे-धीरे बड़ा होता जा रहा है. मोरबी तालुका के जेतपर गांव में किसान बिजली के खंभे लगाने के लिए जमीन के बदले उचित मुआवजे की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं. अब इस आंदोलन को पंजाब और के किसान नेताओं का भी समर्थन मिल गया है. पंजाब से भारतीय किसान यूनियन के नेताओं ने जेतपर गांव पहुंचकर आंदोलन कर रहे किसानों से मुलाकात की. इससे आंदोलन के राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचने की संभावना बढ़ गई है.
भारतीय किसान यूनियन के प्रेसिडेंट रघुवीर सिंह चौधरी और नेशनल स्पोक्सपर्सन राकेश टिकैत ने किसान आंदोलन की छावनी का दौरा किया. इस दौरान किसान नेताओं ने आंदोलन कर रहे किसानों की मांगों को सुना और उनके साथ खड़े रहने का भरोसा दिया. नेताओं ने कहा कि किसानों की मांगों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए और सरकार को बातचीत के जरिए इसका समाधान निकालना चाहिए.
किसानों की मुख्य मांग बिजली के खंभे लगाने के लिए जमीन के इस्तेमाल के बदले उचित मुआवजा देने की है. किसान नेताओं का कहना है कि उन्हें सरकार की ओर से जारी सर्कुलर के आधार पर मुआवजा मंजूर नहीं है. किसानों की मांग है कि उन्हें जमीन के बदले चार गुना मुआवजा दिया जाए. राकेश टिकैत ने अपने संबोधन में कहा कि गुजरात के किसानों ने जिस तरह अपनी मांगों को लेकर आंदोलन शुरू किया है, वह अच्छी बात है. उन्होंने कहा कि किसान अपनी मांगों के लिए एकजुट रहें और जरूरत पड़ने पर बड़ा आंदोलन खड़ा किया जाए.
राकेश टिकैत ने कहा कि अगर किसानों की मांगें पूरी नहीं होती हैं तो आंदोलन को और बड़ा किया जा सकता है. उन्होंने जरूरत पड़ने पर दिल्ली का घेराव करने की भी बात कही. इससे साफ है कि किसान संगठन इस मुद्दे को सिर्फ गुजरात तक सीमित रखने के बजाय राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की तैयारी में हैं. उन्होंने किसानों से यह भी अपील की कि हर जिले के किसान एक साथ आएं और एक मजबूत संगठन बनाएं. उनका कहना है कि किसानों की आवाज तभी मजबूती से उठाई जा सकती है, जब वे एकजुट होकर अपनी मांग सरकार के सामने रखें.
जेतपर गांव में किसानों का आंदोलन पिछले कुछ समय से जारी है. किसानों का आरोप है कि बिजली के खंभे लगाए जाने से उनकी जमीन प्रभावित हो रही है, लेकिन उन्हें इसके बदले उचित मुआवजा नहीं मिल रहा है. किसान चाहते हैं कि सरकार उनकी मांग पर दोबारा विचार करे और जमीन के नुकसान के हिसाब से मुआवजा तय करे. पंजाब के किसान नेताओं के समर्थन के बाद अब इस आंदोलन को नई ताकत मिलने की उम्मीद है. वहीं, आने वाले दिनों में अगर सरकार और किसानों के बीच बातचीत से कोई समाधान नहीं निकलता है, तो आंदोलन के और व्यापक होने की संभावना है. (राजेश अंबालिया की रिपोर्ट)