
देश के कई हिस्सों में इन दिनों एलपीजी गैस की कमी की खबरें सामने आ रही हैं. गैस सिलेंडर समय पर नहीं मिलने से लोगों को खाना बनाने में परेशानी हो रही है. खासकर गांवों में रहने वाले लोगों के लिए यह समस्या और भी बड़ी बन जाती है. द ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे समय में संजीव शर्मा नाम के एक शिक्षक ने एक अनोखा तरीका खोजा है. उन्होंने कचरे से ऐसा ईंधन बनाया है जिससे खाना बनाया जा सकता है. यह तरीका सस्ता भी है और पर्यावरण के लिए अच्छा भी है.
संजिव शर्मा अमृतसर के एक सरकारी स्कूल में पढ़ाते हैं. वे सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल, जब्बोवाल में व्यावसायिक शिक्षक हैं. उन्होंने अपने स्कूल के बच्चों के साथ मिलकर एक साइंस क्लब बनाया है. इस क्लब में बच्चे अलग-अलग तरह के प्रयोग करते हैं. इसी क्लब में उन्होंने खेतों के बचे हुए भूसे, पत्तों और रसोई के कचरे से बायोफ्यूल ब्रिकलेट बनाना शुरू किया. ब्रिकलेट छोटे-छोटे ईंधन के टुकड़े होते हैं जिन्हें जलाकर खाना बनाया जा सकता है.
इस काम में सबसे खास बात यह है कि इसमें बेकार चीजों का इस्तेमाल किया जाता है. जैसे धान का भूसा, सूखे पत्ते, लकड़ी का बुरादा, कागज और रसोई का कचरा. पहले इन चीजों को अलग-अलग इकट्ठा किया जाता है. फिर इन्हें सुखाकर दबाया जाता है और छोटे-छोटे टुकड़ों में बनाया जाता है. यही टुकड़े बाद में ब्रिकलेट बन जाते हैं. इन्हें जलाने पर अच्छी गर्मी मिलती है और इससे खाना भी पकाया जा सकता है.
इस प्रोजेक्ट में स्कूल के बच्चों ने भी खूब मेहनत की है. बच्चों ने कचरा इकट्ठा किया, उसे सुखाया और ब्रिकलेट बनाने में मदद की. इस काम से बच्चों को यह सीखने को मिला कि कचरा भी बहुत काम की चीज हो सकता है. बच्चों की टीम ने अपने इस काम के लिए कई प्रतियोगिताओं में इनाम भी जीते हैं, जिनमें विप्रो अर्थियन पुरस्कार और राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस जैसे बड़े कार्यक्रम शामिल हैं.
संजिव शर्मा बताते हैं कि बायोफ्यूल ब्रिकलेट बनाना पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद है. जब लोग खेतों में कचरा या पत्ते सीधे जला देते हैं तो हवा में धुआं और प्रदूषण फैलता है. लेकिन अगर उसी कचरे से ब्रिकलेट बना लिए जाएं तो उन्हें साफ तरीके से जलाया जा सकता है. इससे कम धुआं निकलता है और पर्यावरण भी सुरक्षित रहता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर रोज करीब 2.5 से 3 किलो बायोमास का इस्तेमाल किया जाए तो एक घर की एलपीजी की जरूरत कुछ हद तक पूरी हो सकती है. संजिव शर्मा का मानना है कि अगर गैस की कमी बढ़ती है तो स्कूल और गांव के लोग इस तरीके को अपना सकते हैं. इससे स्कूलों की रसोई भी चलती रहेगी और बच्चों को मिलने वाला मिड-डे मील भी बंद नहीं होगा.
इस तरह अमृतसर के एक शिक्षक ने यह दिखा दिया कि अगर सही सोच हो तो कचरे से भी बड़ी समस्या का हल निकाला जा सकता है.
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