
उत्तर प्रदेश में कम बारिश के बावजूद योगी सरकार की तैयारियों और किसानों की मेहनत के कारण खरीफ फसलों का आच्छादन लक्ष्य के करीब पहुंच गया है. प्रदेश के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने बताया कि इस वर्ष सुपर अल नीनो की आशंका के कारण सामान्य से कम वर्षा का अनुमान था. इसके बावजूद सरकार ने किसानों को समय पर बीज, उर्वरक और सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराई. उन्होंने कहा कि इस वर्ष सामान्य से लगभग 25 प्रतिशत कम वर्षा होने के बावजूद कृषि विभाग, सिंचाई विभाग तथा कृषि विज्ञान केंद्रों के समन्वित प्रयासों से किसानों को किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होने दी गई. दरअसल, उत्तर प्रदेश में धान की रोपाई और मक्का, दालों व तिलहन जैसी फसलों की बुवाई के लिए जुलाई का महीना बहुत महत्वपूर्ण होता है.
शाही ने बताया कि खरीफ सीजन में 50 प्रतिशत अनुदान पर 1.73 लाख कुंतल से अधिक बीज वितरित किए गए. साथ ही दलहन, तिलहन, मूंगफली, सोयाबीन और तिल जैसी फसलों के रकबे को बढ़ावा देने के लिए विशेष अभियान चलाया गया. योगी सरकार ने 6.13 लाख से अधिक किसानों को 16,449 कुंतल मुफ्त मिनी किट वितरित किए, जबकि 1.23 लाख कुंतल से अधिक बीज अनुदान पर उपलब्ध कराया गया. उन्होंने बताया कि दलहन, तिलहन तथा मोटे अनाज के बीजों का बड़े पैमाने पर वितरण कर किसानों को कम वर्षा की परिस्थितियों में भी खेती जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया गया.
कृषि मंत्री शाही ने बताया कि 28 जुलाई तक प्रदेश में औसत से लगभग 25 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई. 11 जिलों में 40 से 60 प्रतिशत तक कम बारिश हुई, जबकि 13 जिलों में स्थिति और अधिक चिंताजनक रही. ऐसी परिस्थितियों को देखते हुए सरकार ने सितंबर में अल्प अवधि की तोरिया फसल को बढ़ावा देने का निर्णय लिया है.
उन्होंने बताया कि 1,000 कुंतल तोरिया बीज वितरण का लक्ष्य तय किया गया है, जिसमें 600 कुंतल मुफ्त मिनी किट और 400 कुंतल अनुदान पर उपलब्ध कराए जाएंगे. इसके लिए पोर्टल खोल दिया गया है तथा 17 अगस्त के बाद ई-लॉटरी के माध्यम से किसानों का चयन किया जाएगा.
बता दें कि भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, यूपी में 1 जून से 29 जुलाई के बीच कुल 258.6 मिमी बारिश दर्ज की गई, जबकि सामान्य बारिश 342.8 मिमी होनी चाहिए थी. इस तरह मौसम में 25 प्रतिशत की बारिश कम ही हुई है. लखनऊ के वरिष्ठ मौसम वैज्ञानिक अतुल कुमार सिंह के मुताबिक, अल नीनो एक बड़ी जलवायु घटना है, जो महीनों के पैमाने पर मानसून पर असर डालती है. बादल और बारिश क्षेत्रीय मौसम प्रणालियों पर निर्भर करते हैं, जो कुछ दिनों के लिए एक्टिव होती हैं.
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