
केंद्र सरकार की ओर से गेहूं निर्यात की मंजूरी दिए जाने के बाद भी घरेलू बाजार में कीमतों में गिरावट का दबाव लगातार गहराता जा रहा है. ताजा आंकड़े इस ट्रेंड को और मजबूत करते दिखाई दे रहे हैं. एगमार्कनेट पोर्टल पर उपलब्ध फरवरी के तीसरे हफ्ते के राज्यवार थोक भाव के अनुसार, ज्यादातर प्रमुख उत्पादक और उपभोक्ता राज्यों में गेहूं के दाम न सिर्फ पिछले महीने, बल्कि पिछले साल के मुकाबले भी काफी नीचे आ चुके हैं. कमजोर मांग, सरकारी बिक्री और आगामी नई फसल की आवक ने मिलकर बाजार की धारणा को पूरी तरह मंदी की ओर मोड़ दिया है.
फरवरी के तीसरे हफ्ते में देश का औसत थोक गेहूं भाव 2581 रुपये प्रति क्विंटल दर्ज किया गया, जबकि जनवरी के इसी दौर में यह 2688 रुपये और फरवरी 2025 में 3028 रुपये प्रति क्विंटल था. यानी एक साल में औसतन 440 रुपये प्रति क्विंटल से ज्यादा की गिरावट आ चुकी है. गुजरात में भाव 2474 रुपये प्रति क्विंटल पर आ गए हैं, जो पिछले साल के मुकाबले करीब 19 प्रतिशत नीचे हैं. मध्य प्रदेश में दाम 2415 रुपये के आसपास हैं और सालाना आधार पर यहां करीब 20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है.
पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े गेहूं उत्पादक राज्यों में भी भाव 2450 से 2470 रुपये प्रति क्विंटल के दायरे में सिमट गए हैं, जो कई मंडियों में मौजूदा एमएसपी 2425 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास हैं और आगामी फसल के लिए लागू होने वाले एमएसपी 2585 रुपये प्रति क्विंटल से नीचे हैं. कर्नाटक में गिरावट और ज्यादा तेज है, जहां एक साल में गेहूं के दाम 40 प्रतिशत से ज्यादा टूट चुके हैं. बाजार में गेहूं की उपलब्धता पर्याप्त है, लेकिन मांग उस अनुपात में नहीं बढ़ पा रही है.
इस बीच, सरकार की ओपन मार्केट सेल स्कीम यानी OMSS के तहत गेहूं की बिक्री भी बाजार पर दबाव बनाए हुए है. आईग्रेन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, फरवरी की शुरुआत तक OMSS के तहत ई-नीलामी में गेहूं की खरीद सुस्त रही है. पेशकश के मुकाबले वास्तविक बिक्री कम रही, जिससे यह संकेत मिलता है कि मिलर्स और थोक खरीदार फिलहाल बड़े स्तर पर खरीद से बच रहे हैं. सरकार की ओर से अभी भी OMSS के तहत गेहूं की बिक्री जारी रहने की संभावना है. ऐसे में निजी बाजार पर थोड़ा और दबाव रह सकता है.
उधर, सरकार ने मांग को सहारा देने के लिए कुछ नीतिगत कदम जरूर उठाए हैं, जिसमें 5 फरवरी को गेहूं पर स्टॉक लिमिट हटाने का फैसला लिया गया, जिससे व्यापारियों को भंडारण की छूट मिली. इसके बाद 13 फरवरी को 25 लाख टन गेहूं और 5 लाख टन गेहूं उत्पादों के निर्यात को मंजूरी दी गई. उम्मीद थी कि इससे घरेलू बाजार में मांग बढ़ेगी, लेकिन फिलहाल इसके असर सीमित ही नजर आ रहे हैं.
वहीं, आगे की तस्वीर भी किसानों के लिए ज्यादा राहत भरी नहीं दिखाई दे रही है. चालू रबी सीजन में गेहूं की रिकॉर्ड बुवाई हुई है और मार्च-अप्रैल से नई फसल की आवक तेज होने की संभावना है. जैसे ही नई फसल बाजार में आएगी, आपूर्ति और बढ़ेगी, जिससे दामों पर और दबाव बन सकता है. इसके साथ ही कई राज्यों में अप्रैल से सरकारी खरीद शुरू होने की उम्मीद है. ऐसे में किसानों के सामने एमएसपी पर गेहूं बेचने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं बचेंगे.
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बाजार पर लंबे समय तक सख्त नियंत्रण और सरकारी हस्तक्षेप नहीं होता तो दाम पिछले साल की तरह किसानों के लिए बेहतर रह सकते थे. फिलहाल गिरते थोक भाव, सुस्त मांग, OMSS की बिक्री और आगामी नई फसल की आवक ने गेहूं बाजार को पूरी तरह दबाव में डाल दिया है और आने वाले हफ्तों में इस स्थिति के बने रहने की आशंका जताई जा रही है.