
देश के कई राज्यों की मंडियों में आलू के लगातार गिरते दाम अब सियासी मुद्दा बनते जा रहे हैं. इस क्रम में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आलू के दामों में आई भारी गिरावट को लेकर केंद्र और राज्य की भाजपा सरकार पर निशाना साधा है. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार किसानों की समस्याओं को लेकर लापरवाह बनी हुई है. अखिलेश यादव ने कहा कि आलू के दाम गिरने से किसान बर्बाद हो रहे हैं, लेकिन सरकार उनकी मांगों की अनदेखी कर रही है.
उन्होंने कहा कि भाजपा को किसानों की परेशानी से ज्यादा अपनी राजनीतिक सत्ता की चिंता है. उनके मुताबिक भाजपा के नेता चुनाव प्रचार के लिए तो उपलब्ध रहते हैं, लेकिन किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए समय नहीं निकालते. सपा प्रमुख ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार की नीतियां ऐसी हैं जिससे फसलों के दाम इतने कम हो जाएं कि किसानों की लागत भी न निकल सके.
उन्होंने कहा कि इससे किसान खेती छोड़ने के लिए मजबूर होंगे और अंततः अपनी जमीनें बेचने की स्थिति में पहुंच जाएंगे. अखिलेश यादव ने कहा कि अगर यही स्थिति बनी रही तो किसान अपने ही खेत की पैदावार खरीदने के लिए मजबूर हो सकते हैं.
इधर, आलू की कीमतों को लेकर सरकारी आंकड़े भी किसानों की चिंता बढ़ाने वाले हैं. भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के तहत संचालित राष्ट्रीय कृषि बाजार सूचना नेटवर्क ‘एगमार्कनेट पोर्टल’ पर उपलब्ध प्राइस ट्रेंड डेटा के मुताबिक, नवंबर 2025 से मार्च 2026 के बीच देश में आलू की औसत थोक कीमतों में लगातार गिरावट दर्ज की गई है.
आंकड़ों के अनुसार नवंबर 2025 में आलू की औसत थोक कीमत करीब 1879.67 रुपये प्रति क्विंटल थी. दिसंबर में यह घटकर 1584.05 रुपये प्रति क्विंटल रह गई. इसके बाद गिरावट का सिलसिला जारी रहा और जनवरी 2026 में औसत भाव 1421.30 रुपये प्रति क्विंटल, फरवरी में 1266.59 रुपये प्रति क्विंटल और मार्च 2026 में घटकर 1185.65 रुपये प्रति क्विंटल तक आ गया. इस तरह पांच महीनों में औसत कीमत करीब 694 रुपये प्रति क्विंटल घट गई, जो लगभग 37 प्रतिशत की गिरावट दर्शाती है.
राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालें तो कई बड़े उत्पादक राज्यों में भी आलू के दाम तेजी से गिरे हैं. मध्य प्रदेश में नवंबर 2025 में आलू का भाव करीब 2203 रुपये प्रति क्विंटल था, जो मार्च 2026 में घटकर लगभग 460 रुपये प्रति क्विंटल रह गया. उत्तर प्रदेश में इसी अवधि में कीमतें करीब 1224 रुपये से घटकर लगभग 602 रुपये प्रति क्विंटल तक आ गईं. बिहार में नवंबर के लगभग 1612 रुपये प्रति क्विंटल के मुकाबले मार्च में भाव करीब 956 रुपये प्रति क्विंटल रह गया.
पंजाब, हरियाणा, गुजरात और पश्चिम बंगाल समेत कई अन्य राज्यों की मंडियों में भी इसी तरह की गिरावट दर्ज की गई है. हालांकि, दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में आलू के दाम अपेक्षाकृत ऊंचे बने हुए हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक केरल में मार्च 2026 में आलू की औसत कीमत लगभग 3979 रुपये प्रति क्विंटल ट्रेंड कर रही है, जबकि तमिलनाडु में यह करीब 3066 रुपये प्रति क्विंटल है. इन राज्यों में स्थानीय उत्पादन बहुत कम होने के कारण दूसरे राज्यों से आने वाली आपूर्ति पर बाजार निर्भर रहता है.
बाजार के जानकारों का कहना है कि आलू की कीमतों में गिरावट की मुख्य वजह नई फसल की बढ़ती आवक और मंडियों में आपूर्ति का बढ़ना है. फरवरी और मार्च के दौरान उत्तर भारत की मंडियों में आलू की बड़ी मात्रा में आवक होती है, जिससे कीमतों पर दबाव पड़ता है. इस बार आलू के उत्पादन में बढ़ोतरी का अनुमान भी लगाया जा रहा है, जिससे बाजार में भाव पिछले साल की तुलना में कमजोर बने हुए हैं.
लगातार गिरते दामों के बीच कई किसान संगठन आलू पर न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की मांग उठा रहे हैं, ताकि किसानों को कम से कम उनकी लागत के बराबर कीमत मिल सके. वहीं, विशेषज्ञों का कहना है कि निर्यात बढ़ाने, कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग क्षमता में सुधार से ही बाजार में संतुलन लाया जा सकता है.