
मध्य प्रदेश में मोहन यादव सरकार द्वारा समर्थन मूल्य (MSP) पर गेहूं खरीद की तारीख बार-बार बढ़ाने से किसानों की परेशानियां बढ़ रही हैं. समय पर सरकारी खरीद नहीं होने की वजह से किसानों को अपने गेहूं का सही दाम नहीं मिल पा रहा है. मजबूरी में किसानों को मंडी या निजी व्यापारियों को कम कीमत पर गेहूं बेचना पड़ रहा है. मंदसौर कृषि उपज मंडी में आए एक किसान ने बताया कि उन्हें तुरंत पैसों की जरूरत है, इसलिए वे कम दाम पर भी अपनी फसल बेचने को मजबूर हैं. वहीं, किसानों का कहना है कि सरकारी खरीद में देरी के कारण किसानों को नुकसान उठाना पड़ रहा है और उन्हें अपनी मेहनत का सही मूल्य नहीं मिल पा रहा है.
कई किसानों का कहना है कि 9 दिन की छुट्टी के बाद आज मंडी खुली है, लेकिन मंडी फिर बंद रहेगी. उन्होंने सोसायटी से कर्ज लेकर और ब्याज पर पैसा लगाकर फसल तैयार की है. अब मजदूरों, ट्रैक्टर चालकों और बाकी खर्चों का भुगतान करना है. कई किसानों पर पुराने कर्ज भी हैं और कुछ के घर में शादी जैसे जरूरी खर्च भी हैं, जिन्हें टाला नहीं जा सकता. ऐसे में किसान सरकारी समर्थन मूल्य पर खरीद का इंतजार नहीं कर पा रहे हैं और मजबूरी में कम दाम पर अपनी फसल बेच रहे हैं. इससे उन्हें नुकसान हो रहा है और उनकी चिंता और मानसिक दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है.
‘आज तक’ से बात करते हुए खतयाखेड़ी गांव के किसान मोहनलाल गुप्ता ने बताया कि जब वे गेहूं लेकर मंडी आए थे, तो उन्हें लगा था कि अच्छा भाव मिलेगा. लेकिन हकीकत में उन्हें अपना गेहूं सिर्फ 2000 से 2160 रुपये प्रति क्विंटल के भाव में बेचना पड़ा. इससे साफ है कि किसानों को उनकी मेहनत का सही दाम नहीं मिल रहा है. ऐसे में किसान खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं और अब उनके हित में सरकार द्वारा जल्दी से खरीद शुरू करना बहुत जरूरी हो गया है.
किसान मोहनलाल गुप्ता ने बताया कि उनका रजिस्ट्रेशन मार्च में हो गया था. उसके बाद सरकार ने 25 मार्च से गेहूं खरीदने का समय दिया था, 25 को सरकार ने खरीदी चालू नहीं कि उसके बाद 1 अप्रैल बताया गया, जिसके बाद उन्होंने 1 अप्रैल तक इंतजार किया. लेकिन उन्हें पैसे की सख्त जरूरत थी. किसान का कहना है कि उसे मजदूरों, ट्रैक्टर चालकों और सोसायटी का पैसा देना है. कई जरूरी काम और कर्ज भी हैं, इसलिए उसे तुरंत पैसों की जरूरत है.
सरकार ने गेहूं खरीद की 10 तारीख बताई थी, लेकिन इंतजार करना मुश्किल हो गया. मजबूरी में मोहनलाल को मंडी में कम दाम पर गेहूं बेचना पड़ा, जबकि समर्थन मूल्य 2640 रुपये प्रति क्विंटल है, फिर भी उसे केवल 2160 रुपये में गेहूं बेचना पड़ा. किसान ने बताया कि आगे की खेती के लिए भी पैसे चाहिए, इसलिए कम दाम पर भी फसल बेचनी पड़ी. उन्हें यह भी बताया गया कि 10 तारीख के बाद भी अगर बारदाना (बोरी) उपलब्ध हुआ तभी सरकार गेहूं खरीदेगी, नहीं तो तारीख फिर बढ़ सकती है. इस अनिश्चितता के कारण किसान ने इंतजार करने के बजाय मंडी में ही गेहूं बेच दिया. हांलाकि सीएम ने कई संभाग में गेहूं खरीद की तारीख 9 अप्रैल घोषित किया है.
बुजुर्ग किसान फूलचंद राठौड़ का कहना है कि उन्होंने खेत से गेहूं काटकर निकाला और 2 दिन तक इंतजार किया कि सरकार खरीद शुरू करेगी, लेकिन तारीख साफ नहीं थी. इसके बाद वह मजबूरी में गेहूं लेकर मंडी आ गए. मंडी में उन्हें करीब 2650 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिला, लेकिन यहां बेचने में भाड़ा, किराया और अन्य खर्च भी लगते हैं, जबकि समर्थन मूल्य पर बेचने में ये खर्च नहीं होता.
किसान ने बताया कि घर में शादी है, सोसायटी का पैसा भरना है और बाजार के कई जरूरी खर्च हैं, इसलिए उसे तुरंत पैसों की जरूरत है. पहले मार्च में खरीद शुरू होने की बात कही गई थी, फिर अप्रैल बता दिया गया, जिससे परेशानी और बढ़ गई. उनका कहना है कि सरकार तो अच्छी है, लेकिन कर्मचारियों की वजह से दिक्कत हो रही है. पैसे की जरूरत इतनी ज्यादा है कि उन्हें मजबूरी में मंडी में गेहूं बेचना पड़ रहा है.
किसान गोपाल गुर्जर का कहना है कि वे मंडी में गेहूं इसलिए बेच रहे हैं क्योंकि सरकार बार-बार खरीद की तारीख बढ़ा रही है और उन्हें तुरंत पैसों की जरूरत है. घर में शादी-ब्याह, मजदूरों का भुगतान और बाकी खर्चों के कारण वे इंतजार नहीं कर पा रहे हैं. वहीं, अन्य किसानों का कहना है कि अगर गेहूं नहीं बेचेंगे तो खर्च कैसे चलाएंगे. उन्हें अभी पैसे चाहिए, इसलिए समर्थन मूल्य का इंतजार करना मुश्किल हो रहा है. अगर खरीद 15 दिन और टलती है, तो तब तक उनके कई जरूरी काम पूरे हो जाएंगे, इसलिए वे मजबूरी में अभी फसल बेच रहे हैं.
उनका कहना है कि अगर सरकार समय पर खरीद शुरू कर देती, तो किसानों को नुकसान नहीं होता. पहले एक तारीख दी गई, फिर बारदाने की कमी बताकर तारीख आगे बढ़ा दी गई, जिससे परेशानी बढ़ गई. किसानों का यह भी कहना है कि वे कर्ज लेकर काम चला रहे हैं, उस पर ब्याज भी देना पड़ता है. बाजार से उधार लेकर सोसायटी में पैसा जमा करना पड़ता है, और दूसरी तरफ गेहूं का सही दाम भी नहीं मिल रहा है. (अजय बडोलीया की रिपोर्ट)