
खाड़ी देशों में चल रही युद्ध जैसी स्थिति का असर अब महाराष्ट्र के जालना जिले के तरबूज उत्पादक किसानों पर साफ तौर पर दिखाई देने लगा है. ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव की वजह से खाड़ी देशों को होने वाला तरबूज निर्यात फिलहाल पूरी तरह प्रभावित हो गया है. रमज़ान के महीने में खाड़ी देशों में तरबूज की मांग आमतौर पर बहुत बढ़ जाती है. इसी उम्मीद में जालना के किसानों ने इस बार बड़े पैमाने पर तरबूज की खेती की थी. किसानों को उम्मीद थी कि उन्हें 20 से 30 हजार रुपये प्रति टन तक भाव मिलेगा. लेकिन निर्यात ठप पड़ने के कारण बाजार भाव में भारी गिरावट दर्ज की गई है. वर्तमान में किसानों को तरबूज का भाव केवल करीब 7 हजार रुपये प्रति टन, यानी लगभग 7 रुपये प्रति किलो मिल रहा है.
किसानों का कहना है कि इस दाम में उत्पादन लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है. खेती, सिंचाई, मजदूरी, परिवहन और दवाइयों पर किया गया खर्च भी नहीं निकल पा रहा है. निर्यात रुकने और बाजार में मांग कमजोर पड़ने से तरबूज उत्पादक किसान गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं.
जालना जिले के परतूर और घनसावंगी तहसीलों में किसान बड़े पैमाने पर तरबूज की खेती करते हैं. यहां के कई किसान हर साल खाड़ी देशों में होने वाली मांग को ध्यान में रखकर तरबूज की खेती करते हैं. रमज़ान के दौरान खाड़ी देशों के बाजारों में तरबूज की अच्छी खपत होने से किसानों को बेहतर दाम मिलने की उम्मीद रहती है. लेकिन इस बार अंतरराष्ट्रीय तनाव और युद्धजन्य माहौल की वजह से निर्यात प्रक्रिया प्रभावित हो गई है.
निर्यात बंद होने का सीधा असर स्थानीय बाजारों पर पड़ा है. बड़ी मात्रा में तरबूज स्थानीय मंडियों में पहुंच रहा है, जिससे आवक बढ़ी है और कीमतें गिर गई हैं. किसानों का कहना है कि अगर हालात जल्द सामान्य नहीं हुए, तो उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है. कई किसानों के सामने आगे की खेती की तैयारी करने का भी संकट खड़ा हो गया है.
फिलहाल अंतरराष्ट्रीय तनाव का सबसे बड़ा असर जालना के तरबूज उत्पादक किसानों की जेब पर पड़ रहा है. किसानों की मांग है कि सरकार इस मामले में ध्यान दे और उन्हें उचित राहत या बाजार समर्थन उपलब्ध कराया जाए. केवल निर्यात की समस्या ही नहीं, बल्कि किसानों की मेहनत और भविष्य की तैयारी भी इस संकट से प्रभावित हो रही है. (गौरव साळी का इनपुट)
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