
देश में चीनी की कीमतों में तेजी को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं. चीनी के दाम कुछ ही महीनों में करीब 3,800 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़कर 6,500 रुपये तक पहुंचने का दावा किया जा रहा है. इस बढ़ोतरी को लेकर किसान नेता राजू शेट्टी का आरोप है कि बाजार में चीनी की कमी का माहौल बनाया गया और इसी वजह से कीमतों में तेजी आई. दावा यह भी है कि अगर कीमतों में यह बढ़ोतरी अगले कुछ महीनों तक जारी रहती है, तो इसका सीधा बोझ आम उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है.
हालांकि, चीनी की कीमतों, उपलब्ध स्टॉक और कथित 22 हजार करोड़ रुपये के नुकसान से जुड़े इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि किया जाना जरूरी है. नीचे दिए गए आंकड़े और आरोप संबंधित बयान में किए गए दावों पर आधारित हैं.
दावे के मुताबिक, नवंबर 2025 में जब चीनी का नया सीजन शुरू हुआ था, उस समय चीनी की कीमत करीब 3,500 से 3,600 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास थी. इसके बाद जून 2026 तक कीमत धीरे-धीरे बढ़कर करीब 3,800 रुपये प्रति क्विंटल पहुंच गई. इस दौरान चीनी के दाम में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं देखा गया. लेकिन जून के बाद बाजार में तेजी आने लगी और कुछ ही समय में चीनी के भाव में बड़ी बढ़ोतरी हो गई.
आरोप के मुताबिक, 20 जून से 20 जुलाई 2026 के बीच चीनी की कीमत करीब 4,800 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई. इसके बाद 20 अगस्त तक कीमत करीब 6,500 रुपये प्रति क्विंटल होने का दावा किया गया है. यानी कुछ ही महीनों में चीनी के भाव में करीब 2,700 रुपये प्रति क्विंटल तक का अंतर बताया जा रहा है. सवाल यह है कि जब सीजन की शुरुआत में बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बताई जा रही थी, तो अचानक इतनी बड़ी तेजी क्यों आई?
दावे में कहा गया है कि चीनी के दाम बढ़ाने के लिए बाजार में यह माहौल बनाया गया कि आने वाले दिनों में चीनी की कमी हो सकती है. खासतौर पर गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे बड़े त्योहारों के दौरान चीनी की मांग बढ़ने की बात कही गई. त्योहारों के समय मिठाइयों और दूसरी खाद्य चीजों में चीनी की खपत बढ़ जाती है. ऐसे में अगर बाजार में कमी की आशंका पैदा हो, तो व्यापारी और खरीदार दोनों ज्यादा मात्रा में चीनी खरीद सकते हैं. इससे मांग बढ़ने पर कीमतों पर भी दबाव आ सकता है. आरोप है कि इसी तरह का माहौल बनाकर चीनी के दाम बढ़ाए गए.
इस पूरे मामले में दक्षिण भारत का चीनी सीजन भी महत्वपूर्ण है. दावे के मुताबिक, तमिलनाडु और दक्षिण कर्नाटक की कई चीनी मिलों में नया पेराई सीजन करीब 15 सितंबर के बाद शुरू होता है. इसका मतलब है कि सितंबर के बाद इन इलाकों से नई चीनी बाजार में आना शुरू हो सकती है. ऐसे में बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ने की संभावना रहती है. यही वजह है कि यह सवाल उठाया जा रहा है कि जब नया सीजन जल्द शुरू होने वाला है और नई चीनी बाजार में आ सकती है, तो फिर कमी की आशंका के नाम पर कीमतों में इतनी तेजी क्यों आई?
बयान में दावा किया गया है कि अगर चीनी की कीमत सामान्य स्तर से करीब 2,000 से 2,300 रुपये प्रति क्विंटल अधिक रहती है, तो अगले कुछ महीनों में इसका बड़ा आर्थिक असर हो सकता है. दावे के मुताबिक, करीब एक करोड़ टन से अधिक चीनी की बिक्री पर अगर इतना अंतर आता है, तो कुल रकम करीब 22,000 से 23,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है. आरोप लगाने वाले इसे एक बड़े घोटाले के तौर पर देख रहे हैं और उनका कहना है कि इस अतिरिक्त बोझ का असर आखिरकार चीनी खरीदने वाले आम लोगों पर पड़ेगा.
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल चीनी के उपलब्ध स्टॉक को लेकर है. दावे के मुताबिक, जब नवंबर 2025 में नया चीनी सीजन शुरू हुआ था, तब सरकार के आंकड़ों में पिछले सीजन की करीब 44.47 लाख टन चीनी का स्टॉक बचा हुआ बताया गया था. इसके साथ ही पूरे सीजन में करीब 291 लाख टन चीनी के उत्पादन का दावा किया गया. इस हिसाब से कुल उपलब्ध चीनी करीब 321 लाख टन बताई गई. दावे के मुताबिक, देश की घरेलू जरूरत को देखते हुए इतनी चीनी उपलब्ध होने के बावजूद करीब 9 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी गई. ऐसे में सवाल उठाया जा रहा है कि अगर देश में इतना स्टॉक और उत्पादन था, तो अचानक बाजार में चीनी की कमी कैसे पैदा हो गई?
बयान में यह भी कहा गया है कि सरकार हर महीने करीब 22 लाख टन चीनी को बाजार में बेचने की अनुमति देती है. इसका उद्देश्य घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना और कीमतों को नियंत्रित रखना होता है. आरोप लगाने वाले का कहना है कि अगर सरकार के आंकड़ों के अनुसार पर्याप्त चीनी मौजूद थी और हर महीने बाजार में बिक्री की अनुमति भी दी जा रही थी, तो फिर बड़ी मात्रा में चीनी के गायब होने का सवाल उठता है. हालांकि, अलग-अलग सरकारी आंकड़ों, उत्पादन, पुराने स्टॉक, घरेलू खपत, निर्यात और मासिक रिलीज को एक साथ मिलाकर ही इस दावे की सही तस्वीर सामने आ सकती है.
बयान में करीब 45 लाख टन चीनी के स्टॉक को लेकर भी सवाल उठाया गया है. आरोप है कि अगर इतनी बड़ी मात्रा में चीनी देश से बाहर गई है, तो यह पता लगाना जरूरी है कि वह आखिर किस रास्ते से और कहां गई. इस दावे को समझाने के लिए करीब 3 लाख ट्रकों का उदाहरण दिया गया है. सवाल उठाया गया है कि इतनी बड़ी मात्रा में चीनी अगर बाहर भेजी गई, तो इतनी बड़ी लॉजिस्टिक गतिविधि को नजरअंदाज कैसे किया गया? हालांकि, यह आंकड़ा और इससे जुड़ा निष्कर्ष भी स्वतंत्र जांच और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर ही स्पष्ट हो सकता है.
आरोपों में कुछ चीनी मिल मालिकों और व्यापारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाया गया है. कहा गया है कि आज कई सहकारी और निजी चीनी मिलें खुद भी व्यापार का काम करती हैं. ऐसे में बाजार में चीनी की खरीद-बिक्री करने वाले लोगों और मिलों के हितों को लेकर पारदर्शिता जरूरी है. आरोप है कि कुछ कारोबारियों ने मिलकर ऐसा माहौल बनाया, जिससे त्योहारों के दौरान चीनी की कमी की आशंका पैदा हुई और कीमतें बढ़ गईं. हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि के लिए संबंधित व्यापारियों, चीनी मिलों और सरकारी एजेंसियों का पक्ष सामने आना जरूरी है.
चीनी की कीमतों और उपलब्धता को लेकर लगाए गए इन आरोपों के बीच सरकार से आंकड़ों को साफ करने की मांग की जा रही है. सवाल उठाया गया है कि देश में कुल कितनी चीनी उपलब्ध थी, कितना उत्पादन हुआ, कितनी चीनी घरेलू बाजार में जारी की गई और कितनी मात्रा का निर्यात हुआ. इसके साथ ही यह भी स्पष्ट करने की मांग है कि अगर देश में पर्याप्त स्टॉक था, तो जून से अगस्त के बीच चीनी की कीमतों में इतनी बड़ी बढ़ोतरी क्यों हुई. (दीपक सुरावंशी का इनपुट)
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