
यह कहानी भारत के उस गौरवशाली अतीत की है, जिसे विदेशी कंपनियों की चकाचौंध ने पीछे धकेल दिया. यह कहानी उस कड़वे वर्तमान की भी है जहां 'जादुई' बताई गई एक विदेशी तकनीक आज भारतीय किसानों के गले का फंदा बन चुकी है. यह स्क्रिप्ट है उस सोची-समझी साजिश की, जिसने भारत की आत्मनिर्भर मिट्टी को बहुराष्ट्रीय कंपनियों की तिजोरियों का गुलाम बना दिया और हमारे अपने ही वैज्ञानिकों के ऐतिहासिक आविष्कारों को इतिहास की परतों के नीचे दफन कर दिया. बहरहाल, बीटी (बैसिलस थुरिंगिएंसिस) कपास को बड़े पैमाने पर अपनाए जाने से 2013-14 तक हमारी कॉटन उत्पादकता 565.72 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गई.
उत्पादन बढ़कर 398 लाख गांठ (एक गांठ = 170 किलोग्राम) हो गया. यह भारत का अधिकतम कपास उत्पादन के तौर पर रिकॉर्ड किया गया. इसका मतलब ऐसा नहीं है कि भारत में स्थानीय तौर-तरीकों से कपास की उत्पादकता बढ़ाने के प्रयास नहीं हुए. यहां पर H-4, वरलक्ष्मी और अन्य हाइब्रिड ने 1970-71 और 2001-02 के बीच राष्ट्रीय औसत पैदावार को 127 किलोग्राम से बढ़ाकर 308.65 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक पहुंचाने में मदद की. भारत में कपास की इन बेहतरीन किस्मों को विकसित करने वाले विशेषज्ञों का जिक्र करना भी बेहद जरूरी है.
जब 2002 में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आक्रामक विज्ञापनों, करोड़ों डॉलर के पीआर और राजनीतिक लॉबिंग के साथ बीटी तकनीक की भारत में एंट्री हुई, तो देश में एक ऐसा सुनियोजित झूठ फैलाया गया मानो इससे पहले भारतीय कपास अंधकार युग में जी रहा था.
विदेशी फंडेड लॉबी ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत भारत के महान स्वदेशी वैज्ञानिकों के ऐतिहासिक योगदान को बीटी के नैरेटिव के नीचे इस तरह दबा दिया ताकि भारतीय किसानों और नीति-निर्माताओं के मन में यह हीनभावना कूट-कूट कर भरी जा सके कि जब तक विदेशी प्रयोगशालाओं का पेटेंट हमारे खेतों में नहीं आएगा, हमारा उद्धार नहीं हो सकता. जबकि सच यह है कि भारत कॉटन के क्षेत्र में बड़ी सफलता हासिल कर चुका था.
डॉ. सीटी पटेल ने 1970 में दुनिया की पहली हाइब्रिड कपास किस्म "H-4" विकसित की थी. उनको भारतीय कपास रिसर्च के क्षेत्र का 'महान नायक' के तौर पर जाना जाता है. सूरत के मुख्य कपास रिसर्च केंद्र (गुजरात कृषि विश्वविद्यालय) में काम करते हुए डॉ. पटेल ने दो अलग-अलग गुणों वाली किस्मों को क्रॉस-ब्रीड करवाकर 'H-4' किस्म तैयार की थी.
इससे पहले दुनिया भर में यह माना जाता था कि कपास का हाइब्रिड बीज बड़े पैमाने पर तैयार करना संभव नहीं है. H-4 के आने से भारत में कपास की उत्पादकता में जबरदस्त उछाल आया. इस किस्म को विकसित करने की प्रक्रिया बहुत मेहनत वाली थी, क्योंकि इसमें फूलों का हाथ से संकरण करना पड़ता था, जो आज भी भारत में हाइब्रिड बीज उत्पादन का आधार है. डॉ. सीटी पटेल की यह 'देसी तकनीक' भारत की पहली कपास क्रांति थी.
इसके बाद 1972 में धारवाड़ (कर्नाटक) में 'वरलक्ष्मी' नाम की कॉटन किस्म विकसित हुई. जिसे डॉ. बीएच कटारकी ने विकसित किया. इन दोनों महानायकों ने बिना किसी विदेशी जीन या करोड़ों डॉलर की पेटेंटेड लैब्स के, राष्ट्रीय औसत पैदावार को 127 किलोग्राम से बढ़ाकर 308.65 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक पहुंचा दिया था.
तो फिर सवाल यह उठता है कि क्या कॉटन पर किए गए भारत के अपने काम को दबा दिया गया? इसका सीधा जवाब है-हां. यह सिर्फ अपने देसी काम को दबाना नहीं था, बल्कि विदेशी कंपनियों के आर्थिक हितों के लिए भारत के अपने पारंपरिक और कृषि रिसर्च का व्यवस्थित संहार भी था.
लेकिन यहां सबसे बड़ा और चुभता हुआ सवाल देश के सबसे बड़े कृषि रिसर्च संगठन आईसीएआर (ICAR) और इसके ढर्रे पर चल रहे केंद्रीय कपास रिसर्च संस्थान पर उठता है. आखिर भारत में आईसीएआर का इतना बड़ा और भारी-भरकम बजट वाला सिस्टम कपास के लिए विदेशी कंपनियों का मोहताज क्यों बना रहा?
हजारों वैज्ञानिकों की फौज, सैकड़ों एकड़ की प्राइम रिसर्च लैंड और अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं होने के बावजूद हमारे नीति-निर्माता और वैज्ञानिक मोन्सेंटो जैसी अमेरिकी कंपनी के सामने घुटने टेक कर क्यों बैठ गए? उन्होंने खुद क्यों कुछ नहीं किया? क्यों अपनी ही स्वदेशी तकनीक का गला घोंट दिया?
सच्चाई यह है कि आईसीएआर के भीतर एक पूरी कंपनी-परास्त लॉबी सक्रिय थी, जिसने स्वदेशी आत्मनिर्भरता पर काम करने के बजाय विदेशी पेटेंट की 'दलाली' को तरजीह दी. इन वैज्ञानिकों ने अमेरिकी कंपनियों के रिसर्च पेपर और दावों को 'परम सत्य' मान लिया. हद तो तब हो गई जब सरकारी लैब्स ने अपनी खुद की कोई स्वतंत्र जीन-तकनीक विकसित करने के बजाय, स्वदेशी रिसर्च की बलि चढ़ा दी.
शर्मनाक उदाहरण देखिए. जब आईसीएआर ने स्वदेशी बीटी कपास किस्म 'बीकानेरी नरमा' विकसित करने का दावा ठोका, तो बाद में पता चला कि उसमें भी मोन्सेंटो का ही चुराया हुआ जीन मौजूद था. सरकारी जांच में वैज्ञानिकों की यह जालसाजी पकड़ी गई और इस बीज की बिक्री पर रोक लगानी पड़ी.
यह घटना साबित करती है कि हमारे राष्ट्रीय कृषि संस्थानों के शीर्ष पर बैठे लोग खुद कुछ मौलिक करने की क्षमता या नीयत खो चुके थे और पूरी तरह से विदेशी आयातित तकनीकों की नकल पर निर्भर थे. उन्होंने डॉ. पटेल और डॉ. कटारकी की उस महान आत्मनिर्भर विरासत का गला घोंट दिया जिसने कभी भारत को दुनिया में सिरमौर बनाया था.
विदेशी कंपनियों ने बीटी कॉटन को भारत में 'कपास की पैदावार दोगुनी करने वाली जादुई तकनीक' बताकर बेचा था, लेकिन सरकारी आंकड़े ही इस खोखले दावे के गाल पर सबसे बड़ा तमाचा हैं. यदि हम निष्पक्ष होकर दोनों दौर की उत्पादकता के आंकड़ों की तुलना करें, तो बीटी तकनीक का भ्रम पूरी तरह बेनकाब हो जाता है.
डॉ. सीटी पटेल और हमारे वैज्ञानिकों की देसी तकनीक ने देश की कपास उत्पादकता को 127 किलोग्राम से बढ़ाकर 308.65 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पहुंचाया. यानी बिना किसी विदेशी कंपनी की मदद के शुद्ध 142% से अधिक की छलांग. जबकि, बीटी कपास के बड़े पैमाने पर अपनाए जाने के बाद भारत की अधिकतम कपास उत्पादकता अपने सर्वोच्च शिखर 565.72 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पर पहुंची.
गणित बहुत सीधा और साफ है. साल 2002 में हमारी देसी तकनीक से जितनी उत्पादकता (308.65 किलोग्राम) हासिल हो चुकी थी, बीटी तकनीक अपने सबसे बेहतरीन दौर में भी उसका डबल नहीं कर पाई. कहां स्वदेशी तकनीक की 142% की ऐतिहासिक बढ़त, और कहां पूरे देश की कृषि नीति और संसाधन दांव पर लगाने के बाद बीटी के दौर में मिली महज 83% की बढ़त. यह आंकड़ा साबित करता है कि उत्पादकता बढ़ाने के मामले में हमारी स्वदेशी तकनीक बीटी से कहीं ज्यादा दमदार और प्रभावी थी.
अमेरिकी कंपनी मोन्सेंटो जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत में एक अरबों डॉलर का बीज बाजार दिख रहा था. अगर भारत सरकार डॉ. पटेल की देसी तकनीक और हाथ से संकरण करने वाले आत्मनिर्भर मॉडल को ही आगे बढ़ाती रहती, तो विदेशी कंपनियों की तिजोरियां कैसे भरतीं? इसलिए, अपनी किस्मों को कमतर करके बीटी को बहुत महान बताने का एक खेल खेला गया.
बीटी का सबसे बड़ा वादा यह था कि कीटनाशकों का खर्च शून्य हो जाएगा. लेकिन प्रकृति ने कॉर्पोरेट विज्ञान को हरा दिया. गुलाबी सूंडी ने बीटी के जहर के खिलाफ पूर्ण प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली. आज का किसान दोहरी मार झेल रहा है. पहली, महंगे बीटी बीज खरीदने की मजबूरी, और दूसरी, अब उस पर फेल हो चुके बीटी के कारण कीड़ों को मारने के लिए बाजार से फिर से महंगे रासायनिक कीटनाशकों को छिड़कने का भारी-भरकम खर्च.
नतीजा यह है कि लागत आसमान छू रही है, लेकिन भारत की कपास उत्पादकता पिछले एक दशक से 450 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पर आकर पूरी तरह ठप हो गई है. लागत और मुनाफे के इसी असंतुलन ने भारत के कपास बेल्ट (विदर्भ, पंजाब, तेलंगाना) को कर्ज और किसान आत्महत्याओं का श्मशान बना दिया है.
चीन और ब्राजील जैसे देशों ने समझदारी दिखाई. उन्होंने बीटी तकनीक को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मनमाने हाइब्रिड मॉडल में नहीं फंसाया, बल्कि सीधे बीजों (ओपन पॉलिनेटेड वैरायटी) में डाला, जिससे वे आज सघन खेती करके भारत से 4 गुना अधिक उत्पादकता ले रहे हैं. भारत में विदेशी कंपनियों के प्रभाव में आकर हाइब्रिड और बीटी का ऐसा कॉकटेल बनाया गया जिससे सिर्फ कंपनियों का मुनाफा बढ़ा और देश का किसान कंगाल हो गया.
अब समय आ गया है कि इस ऐतिहासिक भूल को सुधारा जाए. आज जब यह साबित हो चुका है कि बीटी कॉटन तकनीक पुरानी पड़ गई है, तो हमें डॉ. पटेल जैसे वैज्ञानिकों की याद आती है. भारत को कपास में दोबारा सिरमौर बनना है, तो आईसीएआर को अपनी रीढ़ सीधी करनी होगी, कॉर्पोरेट बीजों की गुलामी की बेड़ियों को तोड़कर अपनी स्वदेशी किस्मों, सरकारी रिसर्चों और किसानों के पारंपरिक अधिकारों को वापस बहाल करना ही होगा.
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