
इस साल “सुपर अल नीनो” को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं. साल 2026 की शुरुआत में वैज्ञानिकों ने प्रशांत महासागर के कई हिस्सों में पानी के गर्म होने के संकेत देखे हैं. समुद्र की सतह के नीचे भी गर्मी बढ़ रही है और हवाएं इस गर्मी को इधर‑उधर ले जा रही हैं. इन्हीं वजहों से इस साल अल नीनो के ज्यादा ताकतवर होने की आशंका बढ़ी है.
भारत में गर्मी पहले ही परेशान कर रही है. उत्तर प्रदेश के बांदा में 25 अप्रैल को तापमान 47.4 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो इस साल के सबसे ऊंचे तापमान में से एक है. देश के कई हिस्सों में तापमान 40 से 45 डिग्री के बीच बना हुआ है. भारतीय मौसम विभाग के मुताबिक कई राज्यों में लू की स्थिति है.
ऐसे हालात में जब अल नीनो की बात होती है, तो कमजोर मॉनसून और सूखे की चिंता बढ़ जाती है. भारत में खेती, पानी और बिजली काफी हद तक बारिश पर निर्भर हैं. इसलिए अल नीनो का नाम आते ही फसल नुकसान की आशंका जताई जाती है.
हालांकि विशेषज्ञ कहते हैं कि अल नीनो और कमजोर मॉनसून का रिश्ता सीधा नहीं है. आईआईटी खड़गपुर की प्रोफेसर प्रीथा दत्ता ने 'Firstpost' से कहा कि किसी अल नीनो को “सुपर” कहना यह पक्का नहीं करता कि भारत में भारी सूखा पड़ेगा. अल नीनो जोखिम को बढ़ा सकता है, लेकिन वही सब कुछ तय नहीं करता.
आंकड़े भी यही बताते हैं. पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अनुसार 1950 के बाद से भारत में 16 अल नीनो वाले साल आए, लेकिन इनमें से सिर्फ 7 सालों में ही मॉनसून सामान्य से कमजोर रहा. 1997 जैसे बहुत ताकतवर अल नीनो के दौरान भी भारत में अच्छी बारिश हुई थी. उस साल हिंद महासागर में इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) मजबूत था, जिसने अल नीनो के असर को कम कर दिया.
मॉनसून कई चीजों से मिलकर बनता है. जैसे—हिंद महासागर का तापमान, सोमाली जेट हवाओं की ताकत, मैडेन‑जूलियन ऑस्सीलेशन (MJO), मॉनसूनी द्रोणिका की स्थिति और बंगाल की खाड़ी में बनने वाले कम दबाव के क्षेत्र. ये सभी मिलकर तय करते हैं कि कहां और कितनी बारिश होगी.
खेती पर भी असर हर जगह एक जैसा नहीं होता. धान जैसी फसलें कम बारिश से ज्यादा प्रभावित होती हैं, लेकिन मिट्टी की नमी, तापमान और सिंचाई की सुविधा नुकसान को कम या ज्यादा कर सकती है. कई बार पूरे सीजन की बारिश औसत रहती है, लेकिन बीच‑बीच में लंबा सूखा किसानों के लिए परेशानी बन जाता है.
फिलहाल “सुपर अल नीनो” को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ अल नीनो के नाम पर घबराने के बजाय स्थानीय बारिश, तापमान और छोटी अवधि के पूर्वानुमानों पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है. आखिरकार भारत में मॉनसून का हाल क्या होगा, यह कई संकेतों के एक साथ आने पर ही तय होता है.