
दक्षिण कश्मीर के शोपियां जिले के प्रगतिशील किसान हारून राशिद ने अपनी मेहनत, नवाचार और जैविक खेती के जरिए एक नई मिसाल कायम की है. उन्होंने अपने घर की छत को एक हरे-भरे खेत में बदल दिया है, जहां 100 से अधिक प्रकार के फल, सब्जियां, औषधीय पौधे और दुर्लभ फसलें पूरी तरह जैविक तरीके से उगाई जा रही हैं. उनकी यह पहल न केवल किसानों के लिए प्रेरणादायक है, बल्कि यह दिखाती है कि सीमित जगह में भी आधुनिक और टिकाऊ खेती की जा सकती है.
हारून राशिद ने वर्ष 2017 में अपने घर की छत पर खेती करने की शुरुआत की थी. शुरुआत में यह एक छोटा प्रयास था, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने इसे एक बड़े और सफल जैविक फार्म में बदल दिया. आज उनकी छत पर विभिन्न प्रकार के पौधे और फसलें लहलहा रही हैं. खास बात यह है कि वह अपनी पूरी खेती में किसी भी प्रकार के रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक या अन्य रसायनों का इस्तेमाल नहीं करते हैं.
हारून राशिद का मानना है कि जैविक खेती न केवल लोगों को शुद्ध और सुरक्षित भोजन उपलब्ध कराती है, बल्कि पर्यावरण की भी रक्षा करती है. यही कारण है कि वह खेती के हर काम में प्राकृतिक और जैविक तरीकों को अपनाते हैं. उनके द्वारा उगाए गए सभी फल, सब्जियां और अन्य उत्पाद पूरी तरह प्राकृतिक होते हैं और इनमें किसी भी प्रकार के हानिकारक रसायन नहीं होते.
हारून राशिद की छत पर कई ऐसी फसलें और पौधे भी उगाए जा रहे हैं, जो आमतौर पर स्थानीय बाजारों में देखने को नहीं मिलते. उनके बगीचे में सेब की विशेष किस्में, चेरी, कीवी, संतरा, नींबू और कई औषधीय पौधे शामिल हैं. इनमें से कई पौधे विदेशों से लाए गए हैं. इन दुर्लभ फसलों की सफल खेती करके उन्होंने यह साबित किया है कि सही तकनीक और देखभाल से सीमित स्थान में भी विविध फसलें उगाई जा सकती हैं.
हारून राशिद की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक शोपियां में केसर की सफल खेती है. आमतौर पर केसर की खेती जम्मू-कश्मीर के पंपोर क्षेत्र में की जाती है और इसे वहीं की पहचान माना जाता है. लेकिन हारून राशिद ने शोपियां में भी केसर उगाकर यह साबित कर दिया कि उपयुक्त परिस्थितियों और सही देखभाल के साथ अन्य क्षेत्रों में भी इसकी खेती संभव है. उनकी यह सफलता फसल विविधीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है.
खेती और बागवानी के साथ-साथ हारून राशिद मधुमक्खी पालन का कार्य भी करते हैं. वह पूरी तरह जैविक और शुद्ध शहद का उत्पादन कर रहे हैं. उनका कहना है कि जैविक खेती और मधुमक्खी पालन एक-दूसरे के पूरक हैं और दोनों से किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिल सकती है.
हारून राशिद ने अपनी सफलता के लिए विभिन्न सरकारी और कृषि संस्थानों का आभार व्यक्त किया है. उन्होंने बताया कि बागवानी विभाग, कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) शोपियां, शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (SKUAST) और केसर विकास इकाई पंपोर से उन्हें लगातार तकनीकी सहायता और मार्गदर्शन मिला. इन संस्थानों के सहयोग ने उनके खेती के इस अनोखे मॉडल को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
हारून राशिद की सफलता यह साबित करती है कि यदि किसान नई तकनीकों को अपनाएं और जैविक खेती की ओर बढ़ें, तो कम जगह में भी बेहतर उत्पादन और अच्छी आय हासिल की जा सकती है. उनकी यह पहल जम्मू-कश्मीर ही नहीं, बल्कि देशभर के किसानों, युवाओं और बागवानी प्रेमियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन रही है. उनका सफर दिखाता है कि मेहनत, नवाचार और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी के साथ खेती को एक नई दिशा दी जा सकती है. (इरशाद मलिक की रिपोर्ट)
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