
लेखक: डॉ. सुशील कुमार सिंगला
भारत का सबसे बड़ा ऊर्जा बदलाव किसी बड़ी फैक्ट्री, पावर प्लांट या सोलर पैनल से नहीं, बल्कि गांवों की रसोइयों से शुरू हुआ है. जहां सदियों से हमारी माताएं-बहनें गोबर के उपलों और लकड़ी के जानलेवा धुएं में खाना पकाने को मजबूर थीं, वहां एलपीजी (LPG) गैस और 'उज्ज्वला योजना' के आने से उनके स्वास्थ्य और जीवन स्तर में एक क्रांतिकारी सुधार आया है. लेकिन, इस ऐतिहासिक बदलाव की वजह से अब हमारे जंगलों के सामने 'वनाग्नि' (जंगलों की आग) का एक नया संकट खड़ा हो गया है. आइए समझते हैं कि कैसे रसोई का यह धुआं-मुक्त सफर, अब जंगलों के मैनेजमेंट और खेती की एक नई कहानी कैसे लिख रहा है.
बीसवीं शताब्दी के शुरुआती दशकों (1900 के बाद) में गांवों की अधिकांश आबादी खाना पकाने के लिए गोबर के उपलों का उपयोग करती थी. यह ईंधन आसानी से मिल जाता था और गरीब परिवारों के लिए सबसे सस्ता विकल्प भी था. लेकिन खेती के वैज्ञानिकों ने जल्द ही महसूस किया कि गोबर को जलाने से खेतों की उपजाऊ शक्ति कम हो रही है. जिस गोबर का उपयोग जैविक खाद के रूप में खेतों में होना चाहिए था, वह धुएं में बदलकर नष्ट हो रहा था, जिससे मिट्टी की क्वालिटी और फसलों के उत्पादन दोनों पर बुरा असर पड़ रहा था.
इसी चिंता के चलते 1930 के दशक में उस समय की ब्रिटिश सरकार ने 'फ्यूलवुड कॉन्फ्रेंस' आयोजित की थी. इस सम्मेलन का मुख्य विचार यह था कि गोबर को खेतों के लिए बचाकर रखा जाए और खाना पकाने के लिए जंगलों से लकड़ी लाई जाए. यह केवल एक ऊर्जा नीति नहीं थी, बल्कि इसके पीछे खेती की पैदावार बढ़ाने और देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने का एक बड़ा उद्देश्य भी था. इस सोच ने पहली बार जंगलों को केवल इमारती लकड़ी या सरकारी कमाई का जरिया नहीं, बल्कि ग्रामीण ऊर्जा सुरक्षा का आधार माना.
जंगलों के प्रति यही नजरिया आगे चलकर आजाद भारत की सरकारी नीतियों में भी साफ दिखाई दिया:
केवल सरकारी नीतियां बना देने से जमीन पर असली हालात नहीं बदलते. गांवों में ईंधन लकड़ी का उपयोग इसलिए लंबे समय तक बना रहा क्योंकि इसके पीछे एक मजबूत आर्थिक कारण था. जंगल से सूखी लकड़ी बीनकर लाने में कोई नकद पैसा खर्च नहीं होता था, जबकि बाजार से कोई भी ईंधन खरीदना अधिकांश गरीब परिवारों की हैसियत से बाहर था. हालांकि, इसके लिए महिलाओं और बच्चों को रोज कई घंटे जंगलों में बिताने पड़ते थे, लेकिन कम आमदनी वाले परिवारों के लिए यही सबसे व्यावहारिक रास्ता था.
यही कारण है कि जब एलपीजी (LPG) गैस गांवों तक पहुंच भी गई, तब भी अधिकांश परिवारों ने लकड़ी का उपयोग पूरी तरह बंद नहीं किया. वे दोनों ईंधनों का साथ-साथ उपयोग करते रहे. ऊर्जा अर्थशास्त्र (Energy Economics) में इस व्यवहार को "फ्यूल स्टैकिंग" (Fuel Stacking) कहा जाता है. इसका अर्थ है कि एक ही परिवार अपनी आमदनी, ईंधन की उपलब्धता, मौसम और भोजन के प्रकार के अनुसार लकड़ी और एलपीजी दोनों का मिलाकर उपयोग करता है. उदाहरण के लिए:
भारत की रसोइयों में ईंधन का यह बदलाव अचानक न होकर एक धीमी प्रक्रिया रही है, जो पिछले दो दशकों में काफी तेजी से बढ़ी है:
इस ऐतिहासिक बदलाव में समय-समय पर चले सरकारी कार्यक्रमों की बड़ी भूमिका रही है. 1980 के दशक में 'राष्ट्रीय सुधरे हुए चूल्हा कार्यक्रम' के माध्यम से पारंपरिक चूल्हों की क्षमता बढ़ाने और धुएं को कम करने का प्रयास किया गया था. इस कार्यक्रम ने पहली बार यह साबित किया कि खाना पकाने का ईंधन केवल ऊर्जा का विषय नहीं है, बल्कि यह लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण से भी जुड़ा हुआ गंभीर मुद्दा है.
हालांकि, भारत की घरेलू ऊर्जा व्यवस्था में असली और क्रांतिकारी बदलाव 'प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना' के साथ आया. वर्ष 2016 में शुरू हुई इस योजना के तहत गरीब परिवारों को बड़े पैमाने पर मुफ्त एलपीजी कनेक्शन दिए गए. इससे देश की करोड़ों महिलाओं को जानलेवा धुएं से राहत मिली, घरेलू वायु प्रदूषण में कमी आई और ईंधन इकट्ठा करने में लगने वाला उनका समय भी बचा. यह योजना केवल एक ऊर्जा नीति की सफलता नहीं थी, बल्कि महिलाओं के स्वास्थ्य, सम्मान और सामाजिक सशक्तिकरण की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम थी.
फिर भी, भारत की रसोइयों में यह बदलाव अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. एलपीजी की पहुंच बढ़ने के बावजूद अनेक ग्रामीण परिवार आज भी ईंधन लकड़ी का उपयोग कर रहे हैं. इसके पीछे गैस सिलेंडर को दोबारा भराने का भारी खर्च (रिफिल कॉस्ट), अनियमित कमाई, स्थानीय स्तर पर लकड़ी का मुफ्त मिलना और पारंपरिक खान-पान जैसी व्यावहारिक वजहें शामिल हैं. इसलिए यह मान लेना कि ईंधन लकड़ी का जमाना पूरी तरह खत्म हो चुका है, असलियत से दूर होगा.
इस पूरी कहानी का एक दूसरा पहलू भी है, जिस पर अब तक बहुत कम ध्यान दिया गया है. पिछले 100 से अधिक वर्षों से ग्रामीण परिवार नियमित रूप से जंगलों से सूखी लकड़ियां और गिरी हुई टहनियां इकट्ठा करते आ रहे थे. लेकिन अब एलपीजी के आने से यह गतिविधि लगातार कम हो रही है.
जंगलों के मैनेजमेंट विशेषज्ञों का मानना है कि ईंधन लकड़ी का इकट्ठा किया जाना कम होने के कारण जंगलों के भीतर मृत जैविक पदार्थों यानी सूखी लकड़ियों, टहनियों और पत्तों का जमाव पहले की तुलना में बहुत अधिक बढ़ गया है. यह जमा हुआ सूखा कचरा विज्ञान की भाषा में 'फ्यूल लोड' (Fuel Load) कहलाता है, जो बारूद की तरह काम करता है. हाल के वर्षों में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और दक्षिण भारत के कई राज्यों में वनाग्नि (जंगलों की आग) की घटनाओं में जो भयानक बढ़ोतरी देखी गई है, उसके पीछे मौसम के बदलाव और बढ़ते तापमान के साथ-साथ यह भारी 'फ्यूल लोड' भी एक मुख्य कारण हो सकता है.
यह मृत जैविक पदार्थ (सूखा कचरा) जंगलों में पोषक तत्वों के चक्र, मिट्टी की क्वालिटी, सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों और जंगलों के दोबारा प्राकृतिक रूप से उगने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इसलिए इसका बहुत ज्यादा जमा होना या बहुत ज्यादा साफ कर देना, दोनों ही स्थितियां जंगली पर्यावरण के संतुलन को बिगाड़ सकती हैं. जरूरत इस बात की है कि भारत के अलग-अलग वन क्षेत्रों में इस विषय पर गहरा वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए, ताकि बदलते हालातों के हिसाब से जंगलों के मैनेजमेंट की नई रणनीति तैयार की जा सके.
जंगलों में सूखे कचरे के बढ़ते खतरे को रोकने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि भारत को फिर से जंगलों से बड़े पैमाने पर लकड़ी काटने की पुरानी नीति पर लौट जाना चाहिए. स्वच्छ ईंधनों का विस्तार सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण की दृष्टि से देश की एक महान उपलब्धि है, जिसे किसी भी कीमत पर पीछे नहीं धकेला जा सकता. समाधान केवल इतना है कि वन मैनेजमेंट को नए वैज्ञानिक आधार पर दोबारा तय किया जाए.
इस दिशा में 'बायोचार' (Biochar) जैसी आधुनिक तकनीकें बेहद उपयोगी साबित हो सकती हैं. बायोचार एक कार्बन-समृद्ध पदार्थ है, जिसे जंगलों के अतिरिक्त जैविक कचरे (सूखी लकड़ियों-पत्तियों) को सीमित ऑक्सीजन की मौजूदगी में उच्च तापमान पर गर्म करके तैयार किया जाता है. इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें कार्बन लंबे समय तक सुरक्षित रहता है, जो पर्यावरण के बदलाव (जलवायु परिवर्तन) को रोकने में मदद करता है.
यदि वैज्ञानिक जांच के आधार पर जंगलों के इस एक्स्ट्रा ज्वलनशील कचरे का नियंत्रित उपयोग बायोचार बनाने में किया जाए, तो इसके कई फायदे होंगे:
यदि हम भारत की ऊर्जा यात्रा को इतिहास के नजरिए से देखें, तो एक बेहद दिलचस्प मोड़ दिखाई देता है. लगभग 100 साल पहले नीति-निर्माताओं के सामने मुख्य सवाल यह था कि 'गोबर खेतों में जाए या चूल्हे में?' तब समाधान यह निकाला गया था कि गोबर को खेतों के लिए बचाकर रखा जाए और घरेलू ईंधन की जरूरत जंगलों की लकड़ी से पूरी की जाए. आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं. अब चुनौती ईंधन लकड़ी की उपलब्धता बढ़ाने की नहीं, बल्कि यह समझने की है कि लकड़ी पर निर्भरता घटने के बाद हमारे जंगलों का भविष्य कैसा होगा.
भारत ने स्वच्छ रसोई की दिशा में जो शानदार सफलता पाई है, अब समय आ गया है कि उस सफलता को स्वस्थ जंगलों और टिकाऊ वन मैनेजमेंट के साथ जोड़ा जाए. ऊर्जा नीति, जंगलों के पर्यावरण और खेती को अलग-अलग विषय मानने के बजाय एक मिला-जुला नजरिया अपनाना होगा. भविष्य की सरकारी नीतियों में मृत जैविक पदार्थ, वनाग्नि नियंत्रण, जैव विविधता, कार्बन संरक्षण और बायोचार जैसी आधुनिक तकनीकों को प्रमुख स्थान मिलना चाहिए.
भारत की ऊर्जा यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है. गोबर के उपलों से ईंधन लकड़ी, ईंधन लकड़ी से एलपीजी, और अब एलपीजी से आगे बढ़ते हुए एक टिकाऊ जैव-अर्थव्यवस्था की ओर कदम बढ़ाना इस यात्रा का अगला स्वाभाविक चरण है. यदि वैज्ञानिक रिसर्च, वन मैनेजमेंट और ऊर्जा नीति को एक साझा विजन के साथ जोड़ दिया जाए, तो भारत न केवल स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में, बल्कि स्वस्थ वनों, टिकाऊ खेती और कार्बन-तटस्थ विकास के क्षेत्र में भी पूरी दुनिया के सामने एक मिसाल प्रस्तुत कर सकता है. भारत की ऊर्जा नीति का अगला अध्याय केवल "धुएं से मुक्त रसोई" तक सीमित न रहकर "स्वस्थ जंगलों और मजबूत पर्यावरण" की बुनियाद पर लिखा जाना चाहिए.
(डॉ. सुशील कुमार सिंगला भारतीय वन सेवा के 1994 बैच के एक बेहद अधिकारी हैं.)
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