
देश में चीनी की बढ़ती कीमतों के पीछे गन्ने का घटता उत्पादन और गन्ने में फैल रही खतरनाक रेड रॉट बीमारी को प्रमुख कारण माना जा रहा है. केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा है कि गन्ने की फसल में रेड रॉट रोग के बढ़ते प्रकोप और अल नीनो की प्रतिकूल मौसमीय परिस्थितियों ने चीनी उत्पादन को प्रभावित किया है. इसका असर केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के कई देशों में मौसम और फसल संबंधी चुनौतियों के कारण कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ है.
मंत्री के अनुसार सरकार स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और जरूरत पड़ने पर आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं. हालांकि कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि गन्ना क्षेत्र में रेड रॉट का बढ़ता प्रकोप आने वाले समय में और बड़ी चुनौती बन सकता है.
रेड रॉट गन्ने की सबसे खतरनाक बीमारियों में से एक है, जिसे आम तौर पर "गन्ने का कैंसर" कहा जाता है. यह एक फफूंदजनित रोग है, जो गन्ने के तने पर हमला कर उसे अंदर से सड़ा देता है. बीमारी से प्रभावित तनों को काटने पर अंदर लाल रंग की सड़न दिखाई देती है, जो इसकी सबसे प्रमुख पहचान मानी जाती है.
यह फफूंद गन्ने के ऊतकों में घुस कर पानी और पोषक तत्वों के पूरे सिस्टम को खराब कर देती है. नतीजतन पौधे कमजोर पड़ जाते हैं, सूखने लगते हैं और उनकी बढ़वार रुक जाती है. कई मामलों में पूरा खेत ही गंभीर रूप से प्रभावित हो जाता है. विशेषज्ञों के मुताबिक रेड रॉट बीमारी का असर केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसकी वजह से चीनी मिलों को भी भारी नुकसान उठाना पड़ता है.
रेड रॉट बीमारी की वजह से गन्ने का वजन 30 से 83 प्रतिशत तक कम हो सकता है. गन्ने के रस की मात्रा में 90 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है. खेतों में गन्ने की पैदावार 30 से 80 प्रतिशत या उससे अधिक घट सकती है. सुक्रोज़ की मात्रा कम होने से चीनी रिकवरी दर में भारी कमी आती है. संक्रमित गन्ने से खराब, खट्टी या शराब जैसी गंध आने लगती है. रस में फर्मेंटेशन बढ़ जाता है, जिससे मिलों की उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है. यही कारण है कि रेड रॉट को गन्ना उद्योग के लिए सबसे विनाशकारी रोगों में गिना जाता है.
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि रेड रॉट किसी भी अवस्था में गन्ने को संक्रमित कर सकती है, लेकिन फसल के परिपक्व होने के साथ इसका असर अधिक गंभीर हो जाता है. यह बीमारी विशेष रूप से कटाई के समय से पहले या पकने की अवस्था में ज्यादा दिखाई देती है.
गन्ने के तने के अंदर लाल रंग की धारियां या सड़न जैसी निशानी दिखती है. गंभीर लक्षणों की बात करें तो इसमें पत्तियों का सूखना और मुरझाना, पौधों की वृद्धि रुक जाना, नोड और इंटरनोड पर लाल या गुलाबी धब्बे बनना, गन्ने का कमजोर और खोखला होना शामिल हैं.
रेड रॉट के बढ़ते खतरे को देखते हुए उत्तर प्रदेश गन्ना अनुसंधान परिषद (UPCSR) ने गन्ने की 10 नई किस्में विकसित और पेश की हैं, जिन्हें इस बीमारी के प्रति अधिक सहनशील और प्रतिरोधी माना जा रहा है. इन किस्मों को विकसित करने की जरूरत तब महसूस हुई जब किसानों के बीच बेहद लोकप्रिय Co-0238 किस्म में रेड रॉट का एक बहुत खतरनाक स्ट्रेन सामने आया. इस स्ट्रेन ने उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र और पश्चिमी जिलों में बड़े पैमाने पर फसल को नुकसान पहुंचाया, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा.
ट्रायल के दौरान नई किस्मों ने बेहतर उत्पादन क्षमता भी दिखाई है, जिससे वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि वे भविष्य में रेड रॉट के खतरे को कम कर सकती हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के वर्षों में अल नीनो के कारण तापमान और बारिश के पैटर्न में बदलाव ने गन्ने की फसल को प्रभावित किया है. दूसरी ओर रेड रॉट के प्रकोप ने उत्पादन और रिकवरी दोनों को कम कर दिया. इन दोनों कारणों के मिले जुले प्रभाव से घरेलू चीनी उत्पादन में कमी आई, जिसका असर बाजार कीमतों पर भी दिखाई दे रहा है. यही वजह है कि देश में चीनी की उपलब्धता और कीमतों को लेकर सरकार और उद्योग जगत दोनों सतर्क नजर आ रहे हैं.
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार इस बीमारी से बचाव उपचार से अधिक प्रभावी होता है. इसके लिए किसानों को कुछ जरूरी उपाय अपनाने चाहिए, जैसे केवल रोगमुक्त बीज गन्ने का उपयोग करें. बीज के लिए ऐसे खेतों का चयन करें जिनकी नियमित निगरानी की गई हो. धान रोपाई से पहले गन्ने के सेट्स का गर्म भाप या गर्म हवा से उपचार करें. रेड रॉट प्रतिरोधी किस्मों की खेती को प्राथमिकता दें. कम से कम दो वर्षों का फसल चक्र अपनाएं. संक्रमित खेतों में रेटून फसल लेने से बचें. संक्रमित पौधों और अवशेषों को तुरंत नष्ट करें. खेत में जल निकासी और साफ-सफाई बनाए रखें. जरूरत पड़ने पर अनुशंसित फफूंदनाशकों का वैज्ञानिक सलाह के अनुसार प्रयोग करें.
रेड रॉट बीमारी आज केवल किसानों की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह देश की चीनी उत्पादन क्षमता और फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री के लिए भी गंभीर चुनौती बनती जा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रोग प्रतिरोधी किस्मों को तेजी से बढ़ावा दिया जाए और एकीकृत रोग प्रबंधन रणनीति अपनाई जाए, तो इस बीमारी के प्रभाव को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है. अन्यथा गन्ने की पैदावार, चीनी उत्पादन और किसानों की आय पर इसका असर आने वाले वर्षों में और अधिक गहरा हो सकता है.