
भारत में गन्ने और चीनी की राजनीति कोई आज की बात नहीं है, बल्कि पिछले पांच दशकों से इस पर खूब सियासत होती आ रही है. गन्ने की खेती में शुरू से ही हज़ार झंझट रहे हैं. कभी गन्ना किसानों और चीनी मिल मालिकों के बीच पैसों को लेकर टकराव देखने को मिलता है, तो कभी सरकार से फसल के दाम बढ़ाने की ज़ोरदार मांग उठती है.गन्ना किसान खेतों में खून-पसीना एक करके कड़ी मेहनत करते हैं, लेकिन अपनी ही उपज का पैसा पाने के लिए उन्हें लंबे वक़्त तक इंतज़ार करना पड़ता था.आज के दौर में भले ही चीनी बाज़ार में बड़ी आसानी से हर जगह मिल जाती है, लेकिन आज भी देश में चीनी के बढ़ते दामों को लेकर खूब ज़ोरदार राजनीति हो रही है.
लेकिन आज की 'जेन-जी' जनरेशन को यह जानकर सच में बहुत बड़ा अचंभा होगा कि एक दौर ऐसा भी था,जब चीनी आज की तरह बाज़ार में पूरी तरह आज़ाद नहीं थी.नब्बे के दशक तक यह मिठास बाक़ायदा सरकारी कोटे की दुकानों में एक तरह से कैद रहती थी. उस पुराने ज़माने में ग़रीब लोगों औरआम आदमी के लिए इसे पाना बहुत मुश्किल काम था.चीनी सिर्फ़ राशन कार्ड के ज़रिए ही मिलती थी और इसके लिए बहुत सरकारी नियम बने हुए थे.
उस दौर में रसोई के अंदर भी चीनी और गुड़ की अपनी एक अलग ही 'राजनीति' और रुतबा चलता था. चीनी का रुतबा इतना 'वीआईपी' था कि आम घरों में रोज़मर्रा के दिनों में सिर्फ गुड़ की ही चाय बनती थी. आम आदमी के लिए गुड़ ही मिठास का असली साथी था. उस ज़माने में चीनी वाली चाय तो सिर्फ़ ख़ास मेहमानों या बड़े अफ़सरों के आने पर ही बड़ी इज़्ज़त के साथ पीने को नसीब होती थी. यानी एक तरफ किसान गन्ने के सही दाम के लिए खेतों में संघर्ष कर रहा था,और दूसरी तरफ आम आदमी इस 'वीआईपी' चीनी को पाने के लिए कोटे की दुकानों पर पापड़ बेल रहा था.
देवरिया के मेदनापुर गांव के किसान सुभाष सिंह उस पुराने और मुश्किल वक़्त को याद करते हुए बताते हैं कि सत्तर के दशक में चीनी सवा दो रुपये किलो के भाव से मिलती थी. 80 के दशक आते-आते इसका दाम साढ़े तीन रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया था. उस ज़माने में एक यूनिट पर महज़ पांच सौ ग्राम चीनी ही हर महीने नसीब हो पाती थी. तब घर में किसी ख़ास अफ़सर के आने पर ही बड़ी ख़ुशी से चीनी वाली चाय बनती थी. नाश्ते में भी चीनी प्लेट में बड़ी इज़्ज़त के साथ मेहमानों के सामने परोसी जाती थी और बाज़ार में यह सरकारी राशन की दुकान की तुलना में सीधे दोगुनी कीमत पर बेची जाती थी.
वहीं, गोरखपुर के किसान राजू सिंह ने बताया कि 1990 के दशक में राशन की दूकान पर यूनिट क के हिसाब से बच्चों को 500 ग्राम और बड़ों को 1 किलो चीनी मिलती थी. पर एक कार्ड पर 3-4 किलो से ज़्यादा चीनी नहीं मिलती थीसरकारी रेट समय के हिसाब से साल 1981 से 6.50 रूपये किलो रूपये धीरे धीरे बढ़ते हुए साल 1990 तक 9.50 रुपये तक हो गया था.
शादी-ब्याह जैसे बड़े मौकों पर महज़ एक क्विंटल चीनी पाना भी बहुत भारी काम होता था. सुभाष सिंह बताते हैं कि अगर किसी के घर शादी हो, तो चीनी जुटाना एक बड़ी जंग जीतने जैसा था. इसके लिए गांव के प्रधान से लेकर ब्लॉक अधिकारी तक ख़ास अर्ज़ी लगानी ही पड़ती थी. इस अर्ज़ी के साथ शादी का कार्ड सुबूत के तौर पर लगाना एकदम लाज़िमी माना जाता था. फिर ब्लॉक के बड़े अफ़सर से इज़ाज़त मिलने के बाद ही एक क्विंटल चीनी मिल पाती थी. अगर इससे भी ज़्यादा चीनी की ज़रूरत होती, तो लोग अपने पड़ोसियों के राशन कार्ड मांग लाते थे.और चीनी का इंतजाम करते थें.
राजू सिंह स्कूल के दिनों का एक बहुत ही मज़ेदार और बड़ा दिलचस्प किस्सा भी सुनाते हैं. वह कहते हैं कि छोटे शहरों के स्कूलों में, बच्चों के टिफिन में भी चीनी का रुतबा था. अमीर घरों के बच्चों के टिफिन में बड़े शान से चीनी और पराठा रोटी पैक होकर आता था. वहीं, थोड़े गरीब घरों के बच्चों के टिफिन में सिर्फ गुड़ और रोटी ही देखने को मिलती थी बच्चों की मासूम दुनिया में भी, गुड़ के मुकाबले चीनी की हैसियत एकदम वीआईपी वाली ही होती थी.
ज़रा सोचिए, उस दौर में लोगों को चीनी पाने के लिए कितने भारी पापड़ बेलने पड़ते थे. वहीं दूसरी तरफ,चीनी मिलें लगातार घाटे में रहती थीं और किसानों की हालत बहुत खराब थी. मथुरा के एक बुज़ुर्ग किसान सुधीर अग्रवाल बताते हैं कि पहले गन्ने को लेकर खूब राजनीति होती थी और इस राजनीति का भारी खामियाज़ा बेबस चीनी उपभोक्ताओं और गन्ना किसानों, दोनों को ही भुगतना पड़ता था. एक तरफ जहां आम लोगों को चीनी के लिए राशन की दुकानों के बाहर घंटों इंतज़ार करना पड़ता था,तो वहीं दूसरी तरफ गन्ना किसानों की स्थिति भी इससे कहीं ज़्यादा ख़राब और बदतर बनी हुई थी. किसानों को मिलों में गन्ना बेचने के लिए पहले 'गन्ना पर्ची' का बहुत लंबा इंतज़ार करना पड़ता था. फसल बिक जाने के बाद भी भुगतान के लिए महीनों, और कभी सालों तक इंतज़ार करना पड़ता था.
अस्सी के दशक के उस दौर को याद करते हुए सुधीर जी बताते हैं कि उस समय गन्ने की पैदावार में भारी वृद्धि अचानक से देखने को मिली थी. लेकिन मिलों की क्षमता इतनी बिल्कुल नहीं थी कि वे किसानों का सारा गन्ना खरीद कर पेर सकें. मजबूर होकर कई किसानों को अपनी खून-पसीने की फसल यानी अपना गन्ना खेतों में ही जलाना पड़ा था. उस पुराने दौर में चीनी उपभोक्ता और किसानों दोनो परेशान रहते थे.
सुधीर अग्रवाल जी कहते हैं कि अगर उस पुराने दौर और आज के मौजूदा वक़्त को देखें, तो हालात काफी बदल चुके हैं. आज बाज़ार में चीनी बड़ी आसानी से हर जगह मिल जाती है और लोगों की माली हालत भी इतनी बेहतर है कि वे बिना किसी फिक्र के चीनी खरीद सकते हैं. अब चीनी के लिए न तो राशन की दुकानों के चक्कर काटने पड़ते हैं और न किल्लत होती है. अब चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति मज़बूत हुई है, जिससे किसानों को उनका पूरा पैसा मिल रहा है. नई तकनीक ने भी हमारे गरीब और मेहनतकश किसानों का काम पहले से काफी आसान कर दिया है. गन्ना तौलने वाली पर्ची का यह पूरा सिस्टम अब पूरी तरह से एकदम डिजिटल हो चुका है,
जिस वजह से अब किसानों को पर्ची के लिए किसी अफ़सर या नेता की सिफारिश नहीं लगानी पड़ती. सुधीर जी इस पूरी कहानी के अंत में एक बहुत ही अहम बात पर अपना ज़ोर देते हैं. उनका मानना है कि इस बदलते वक़्त की सबसे बड़ी और ज़रूरी मांग आज बस यही है कि बाज़ार में चीनी के बढ़े हुए दामों का असली मुनाफ़ा उन किसानों तक ज़रूर पहुंचना चाहिए.आखिर ये वही मेहनतकश इंसान हैं, जो कड़ी धूप में खेतों में अपना पसीना बहाकर मिठास पैदा करते हैं. इसलिए, खेतों में मेहनत करने वाले इन अन्नदाताओं को उनका पूरा हक़ हर हाल में मिलना ही चाहिए.