
इस रक्षाबंधन पर बाजारों में अनाज, दाल और सब्जियों के बीजों से बनी नेचुरल राखियां दुकानों पर नजर आने वाली हैं. त्योहार पूरा होने के बाद लोग इन राखियों से बीज निकालकर इनसे पौधे भी उगा सकेंगे. इस क्रम में छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) से जुड़ी स्व-सहायता समूहों की महिलाओं के लिए यह रक्षाबंधन रोजगार का अवसर लेकर आया है. यहां धरमजयगढ़ विकासखंड की महिलाएं स्थानीय बीजों और अनाजों से आकर्षक बीज राखियां तैयार कर रही हैं.
इन राखियों से महिलाओं को अतिरिक्त आमदनी मिलने की उम्मीद है, वहीं इनसे पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी लोगों तक पहुंचेगा. आठ स्व-सहायता समूहों की महिलाएं बरबट्टी, मक्का, कुम्हड़ा, लौकी, करेला, सेमी, ग्वारफली, भिंडी, उड़द, मसूर, मूंगफली, धान और चावल जैसे स्थानीय बीजों का इस्तेमाल कर राखियां बना रही हैं. महिलाएं फेवीकोल, रंग, स्टीकर और धागे की मदद से इन राखियों को तैयार कर इन्हें पर्यावरण अनुकूल बनाने पर ध्यान दे रही हैं.
बीज राखियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें उपयोग के बाद मिट्टी में दबाने पर इनमें लगे बीज अंकुरित होकर पौधे बन सकते हैं. इस तरह यह पहल भाई-बहन के स्नेह के साथ हरियाली बढ़ाने और प्रकृति संरक्षण का संदेश भी देती है. ग्राम पंचायत कोयलार की जय ठाकुरदेव स्व-सहायता समूह की सदस्य और कृषि सखी गणपति राठिया ने बताया कि महिलाओं को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बीज राखी बनाने की ट्रेनिंग दी गई है. ट्रेनिंग पूरी होने के बाद जिले के विभिन्न विकासखंडों में समूहों ने बड़े स्तर पर बीज राखियों बनाने का काम शुरू किया है.
20 जुलाई को पुसौर, रायगढ़, धरमजयगढ़, खरसिया, तमनार और घरघोड़ा विकासखंडों से तैयार बीज राखियों का चयन समिति ने परीक्षण और मूल्यांकन किया. धरमजयगढ़ में तैयार राखियों का पहला बैच जिले में भेजा जा चुका है और जल्द ही इनकी बिक्री शुरू होगी.
बिहान से जुड़ी महिलाएं पहले से कृषि, पशुपालन और लघु उद्यम जैसी गतिविधियों से अपनी आय बढ़ा रही हैं. अब बीज राखियों का निर्माण उनके लिए आजीविका का एक नया माध्यम बनकर उभरा है. स्थानीय संसाधनों से तैयार ये राखियां इस रक्षाबंधन महिला आत्मनिर्भरता, पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ जीवनशैली का संदेश भी देंगी.