
गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर रविवार को 2026 के पद्म पुरस्कार की लिस्ट का ऐलान हो गया है. इस लिस्ट में 5 कृषि वैज्ञानिक और 4 किसानों के नाम शामिल हैं, जिन्होंने कृषि और पशुपालन जगत बहुत असाधारण काम किए हैं. पद्म पुरस्कार के लिए पूसा के पूर्व निदेशक डॉ अशोक कुमार सिंह के नाम का भी ऐलान हुआ है. मूल रूप से गाजीपुर (उत्तर प्रदेश) के रहने वाले डॉ. सिंह ने बासमती धान की सबसे लोकप्रिय किस्मों में सुधार कर उन्हें रोगमुक्त और हर्बीसाइड टॉलरेंट बनाया. जिससे भारत के कृषि क्षेत्र और किसानों को फायदा हुआ. आज भारत सालाना 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक का बासमती चावल एक्सपोर्ट कर रहा है तो इसमें डॉ. अशोक कुमार सिंह का भी बड़ा योगदान है.
एक वक्त था जब भारतीय बासमती चावल में कीटनाशकों के अवशेष कई देशों द्वारा तय अधिकतम अवशेष सीमा (MRL) से अधिक पाए जा रहे थे, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में पाकिस्तान को लाभ मिल रहा था. इस चुनौती को देखते हुए डॉ. सिंह के नेतृत्व में पूसा के वैज्ञानिकों ने बासमती की लोकप्रिय किस्मों को रोगमुक्त बनाने पर काम शुरू किया और उन्हें सफलता मिली.
साल 2023 में जब डॉ. सिंह भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के निदेशक के तौर पर कार्यरत थे तब उनके नेतृत्व में ही देश की पहली हर्बिसाइड टॉलरेंट यानी खरपतवार-नाशक सहिष्णु बासमती धान की दो किस्में विकसित की गईं. ये किस्में थीं पूसा बासमती-1979 और पूसा बासमती-1985. इन किस्मों की खासियत यह है कि खेत में खरपतवार नाशी दवा के छिड़काव से धान की फसल को कोई नुकसान नहीं होता, जबकि घास और अन्य खरपतवार पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं. धान की खेती में पानी की खपत घटाने और किसानों की लागत कम करने के उद्देश्य से इन किस्मों को सीधी बुवाई के लिए जारी किया गया.
हर्बिसाइड टॉलरेंट पूसा बासमती-1979 और 1985 को देश की सबसे लोकप्रिय बासमती किस्मों में सुधार करके विकसित किया गया है. पूसा बासमती-1509 को सुधार कर 1985 तैयार की गई, जबकि पूसा बासमती-1121 को बेहतर बनाकर 1979 विकसित की गई. पूसा बासमती-1121 भारत की सबसे लोकप्रिय बासमती किस्म है, जिसका रकबा, उत्पादन और निर्यात सबसे अधिक है. इस किस्म का मूल विकास डॉ. विजयपाल सिंह ने किया था, जिसके लिए उन्हें पद्म श्री सम्मान भी मिल चुका है.
बासमती धान की खेती में कुछ ऐसे रोग लगते हैं जिनसे किसानों को बड़ा नुकसान होता है. इससे बचने के लिए वो कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं, जो कई बार एक्सपोर्ट में बाधा बन जाते हैं. इसके लिए डॉ. सिंह की लीडरशिप में बासमती धान की लोकप्रिय किस्मों को रोगमुक्त बनाने का काम हुआ.
आईएआरआई ने पूसा बासमती-1509 में सुधार कर पूसा बासमती-1847 विकसित की. इसी तरह पूसा बासमती-1121 को बेहतर बनाकर 1885 और पूसा बासमती-1401 को सुधार कर 1886 नाम की रोगरोधी किस्म तैयार की गई. ये किस्में रोगरोधी होने के कारण कीटनाशकों की आवश्यकता को काफी हद तक कम कर देती हैं.
डॉ. अशोक कुमार सिंह का जन्म वर्ष 1962 में उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के ग्राम बरहट में एक किसान परिवार में हुआ. उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव की बेसिक प्राइमरी पाठशाला से शुरू हुई. इसके बाद उन्होंने जूनियर हाई स्कूल कठघरा और हाई स्कूल कृषि से पढ़ाई की. इंटरमीडिएट (कृषि) की परीक्षा उन्होंने महावीर इंटर कॉलेज मलिकपुरा, गाजीपुर से प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की. इस परीक्षा में उन्होंने पूरे उत्तर प्रदेश बोर्ड में चौथा स्थान प्राप्त किया, जिससे उन्होंने अपने विद्यालय और जिले का नाम रोशन किया.
इंटरमीडिएट के बाद डॉ. सिंह ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञान संस्थान से कृषि में स्नातक की पढ़ाई प्रथम श्रेणी में पूरी की. इसके बाद उन्होंने जेनेटिक्स एवं प्लांट ब्रीडिंग विषय में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की और विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान हासिल किया, जिसके लिए उन्हें “बिनानी मेडल” से सम्मानित किया गया. आगे चलकर उन्होंने भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा), नई दिल्ली से चावल पर शोध कर वर्ष 1992 में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की.
डॉ. सिंह ने अपने करियर की शुरुआत टाटा ऊर्जा शोध संस्थान और बायो सीड जेनेटिक्स इंटरनेशनल से की. वर्ष 1994 में भारतीय कृषि सेवा परीक्षा उत्तीर्ण कर वे भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा में वैज्ञानिक बने. पिछले 30 वर्षों से वे बासमती चावल की अधिक उपज देने वाली, रोगरोधी और उच्च गुणवत्ता वाली किस्मों के विकास में लगे रहे. वर्ष 2014 में वे यहां जेनेटिक्स विभाग के अध्यक्ष बने और 2020 में संस्थान के निदेशक एवं कुलपति नियुक्त हुए. जून 2024 में वे सेवानिवृत्त हुए. छात्र रहते हुए जिस संस्थान से पढ़ाई की हो, उसी का निदेशक बनना भी उनके जीवन की बड़ी उपलब्धि रही है. वर्तमान में वे पूसा संस्थान में एमेरिटस वैज्ञानिक के रूप में कार्य कर रहे हैं.
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