
देश के ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों की आय बढ़ाने और रोजगार के नए अवसर पैदा करने के उद्देश्य से एक अनोखी पहल शुरू की गई है. ऊर्जा और प्रौद्योगिकी शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय एट्रिया ग्रुप ने आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में लगभग 600 एकड़ क्षेत्र में एकीकृत ग्रामीण परिवर्तन परियोजना विकसित की है. इस पायलट प्रोजेक्ट का मकसद खेती को अधिक लाभदायक बनाना, ग्रामीण आजीविका के अलग-अलग साधनों को बढ़ावा देना और ऐसा मॉडल तैयार करना है जिसे भविष्य में अन्य राज्यों और जिलों में भी लागू किया जा सके.
इस परियोजना के बारे में जानकारी देते हुए एट्रिया ग्रुप के संस्थापक सुंदर राजू ने बताया कि यह पहल खेती, ऊर्जा और शिक्षा को एक साथ जोड़कर तैयार की गई है. इसके तहत पुनर्योजी कृषि (Regenerative Farming), सौर ऊर्जा उत्पादन, डिजिटल शिक्षा और कृषि आधारित पर्यटन को एक ही ढांचे में शामिल किया गया है. इस मॉडल का उद्देश्य किसानों की आय को बढ़ाना है.
सुंदर राजू ने बताया कि फिलहाल कई किसानों की औसत आय लगभग 30 हजार रुपये प्रति एकड़ सालाना है, लेकिन इस परियोजना के जरिए इसे बढ़ाकर 1 लाख रुपये प्रति एकड़ से ज्यादा करने का लक्ष्य रखा गया है. इस मॉडल के जरिए करीब 250 ग्रामीण परिवारों को सीधे लाभ मिलने की उम्मीद है. इस परियोजना की खास बात यह है कि इसमें पारंपरिक एक फसल वाली खेती की जगह विविध खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है. इसके लिए वर्टिकल फूड फॉरेस्ट यानी बहुस्तरीय खाद्य वन विकसित किए जा रहे हैं, जहां अलग-अलग प्रकार के पेड़, फल और फसलें एक साथ उगाई जाएंगी. इसके साथ ही पशुपालन, स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और खाद्य प्रसंस्करण को भी इसमें शामिल किया गया है.
इससे किसानों को एक ही स्रोत पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा. अलग-अलग गतिविधियों से आय के कई रास्ते खुलेंगे और हर एकड़ जमीन एक छोटी आर्थिक इकाई की तरह काम करेगी. इस परियोजना के तहत कृषि-कल्याण पर्यटन (Agri-wellness tourism) को भी बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे गांवों में पर्यटन के जरिए भी आय बढ़ाने की संभावना बन सकती है. इस पहल का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य पर्यावरण संरक्षण भी है. पुनर्योजी कृषि पद्धतियों के जरिए जमीन की उर्वरता बढ़ाने, भूजल स्तर सुधारने और जैव विविधता को बढ़ावा देने पर ध्यान दिया जा रहा है. कृषि वानिकी यानी पेड़ों और फसलों को साथ उगाने की पद्धति से प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश की जा रही है.
इसके अलावा एकीकृत भूमि उपयोग के माध्यम से किसानों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए भी तैयार किया जा रहा है. इससे खेती अधिक टिकाऊ और सुरक्षित बन सकती है. इस परियोजना का एक और बड़ा उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाना है. एट्रिया ग्रुप का मानना है कि अगर गांवों में ही बेहतर कमाई हो और सुविधाएं मिलें, तो गांव युवा शहरों की ओर पलायन करने के बजाय अपने गांवों में ही काम करना पसंद करेंगे.
परियोजना को एक मॉडल के रूप में तैयार किया गया है, जिसे भविष्य में बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है. योजना है कि इसे आने वाले समय में कई जिलों और राज्यों में लगभग 6,000 एकड़ तक बढ़ाया जाए और आगे चलकर इसे 60,000 एकड़ तक विस्तार किया जाए. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह मॉडल सफल होता है, तो यह ग्रामीण विकास और किसानों की आय बढ़ाने के लिए एक नया रास्ता दिखा सकता है.