आधे दाम पर क‍िसानों का प्याज, चीनी पर नतमस्तक नीति...महंगाई कंट्रोल करने का डबल स्टैंडर्ड क्यों?

आधे दाम पर क‍िसानों का प्याज, चीनी पर नतमस्तक नीति...महंगाई कंट्रोल करने का डबल स्टैंडर्ड क्यों?

Onion Price: जब प्याज साल भर 2 रुपये किलो बिका, तब किसानों का कोई माई-बाप नहीं था. तब न तो किसी ने किसानों के नुकसान की भरपाई की और न ही न्यूनतम दाम की कोई गारंटी दी. लेकिन अब जब चार पैसे कमाने की उम्मीद जागी है तो सरकार दाम गिराने के लिए बाजार में कूद पड़ी है. वो भी स‍िर्फ 35 रुपये क‍िलो पर. क्या इस तरह से बढ़ेगी क‍िसानों की इनकम? आख‍िर एक देश में दो व‍िधान क्यों?

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ओम प्रकाश
  • New Delhi,
  • Aug 26, 2026,
  • Updated Aug 26, 2026, 1:21 PM IST

इस समय बाजारों में प्याज भी महंगा है और चीनी भी. इन दोनों जरूरी चीजों के दाम बढ़ने से आम कंज्यूमर परेशान है. उसकी रसोई का बजट बिगड़ रहा है. लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि इन दोनों के दाम गिराने के लिए सरकार जो तौर-तरीके अपना रही है, उनमें जमीन-आसमान का अंतर है. प्याज का दाम ग‍िराने के ल‍िए सरकार बफर स्टॉक जारी कर उसे बाजार भाव के मुकाबले लगभग आधी कीमत पर बेच रही है. जबक‍ि चीनी की कीमतों को कंट्रोल करने के ल‍िए ऐसा कोई प्रशासनिक सर्कस नहीं किया जा रहा. उसे भी सरकार बाजार भाव से आधी कीमत पर बेचकर उपभोक्ताओं को राहत क्यों नहीं देती? आखिर महंगाई को नापने और उसे काबू करने की सरकारी नीति में यह डबल स्टैंडर्ड क्यों? क्यों एक ही देश में रसूखदारों के उत्पाद के लिए अलग और किसानों के लिए अलग विधान चलाया जा रहा है?

इस समय खुले बाजार में प्याज की कीमतें 60 से 70 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई हैं. उसे कंट्रोल करने के ल‍िए सरकार कांदा एक्सप्रेस चलाकर नेफेड द्वारा खरीदे गए प्याज को शहरों को भेजने जा रही है. बफर स्टॉक का यह प्याज आनन-फानन में 35 रुपये प्रति किलो यानी लगभग आधे दाम पर बाजार में उतारा जा रहा है, ताकि शहरी उपभोक्ताओं को राहत मिल सके और खुले बाजार को क्रैश किया जा सके. लेकिन जब इसी देश में चीनी की कीमतें आसमान छूने लगती हैं, उसका दाम 45 रुपये से बढ़कर 70 रुपये पहुंचता है तब सरकार के नीतिगत पहिये अचानक जाम क्यों हो जाते हैं? सरकार चीनी के दाम गिराने के लिए भी प्याज की तरह ही उसे 35 रुपये प्रत‍ि क‍िलो के दाम पर बेचने का साहसिक फैसला क्यों नहीं कर रही? कांदा एक्सप्रेस चल सकती है तो चीनी एक्सप्रेस क्यों नहीं? 

एक देश, दो व‍िधान!

इस नीतिगत अंतर के पीछे राजनीतिक और आर्थिक रसूख का खेल है. देश के प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों जैसे महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक की अधिकांश सहकारी और निजी चीनी मिलों पर सीधे तौर पर सत्तापक्ष और विपक्ष के बड़े राजनेताओं, मंत्रियों, विधायकों और सांसदों का सीधा नियंत्रण है. चीनी उद्योग भारत का सबसे मजबूत, अमीर और संगठित राजनीतिक लॉबी क्षेत्र माना जाता है. 

यही वजह है कि अगर चीनी के दाम बहुत ज्यादा बढ़ भी जाएं, तो सरकार उसे प्याज की तरह सीधे आधे दाम पर सरकारी काउंटरों से बेचने का कोई बड़ा कदम नहीं उठाती. सरकार केवल मामूली और धीमे कागजी कदम तक सीमित रहती है, जैसे मिलों के लिए मासिक रिलीज कोटा तय करना या स्टॉक की सीमा तय करना. सरकार ऐसा कोई भी आक्रामक कदम उठाने से बचती है, जिससे शुगर मिल मालिकों की जेब पर या उनके भारी-भरकम मुनाफे पर कोई सीधा असर पड़े. 

इसके उलट, प्याज उगाने वाला देश का आम किसान असंगठित है, वह क‍िसान बनकर वोट भी नहीं करता. न ही नीति-निर्माण को प्रभावित करने वाली उसकी कोई राजनीतिक लॉबी है. इसलिए उसकी फसल के दाम को जबरन गिराकर नुकसान पहुंचाने में सरकारों को कोई हिचक या डर नहीं होता.

इंडस्ट्री वाले उत्पादों की महंगाई, महंगाई क्यों नहीं?

यह इस देश का सबसे बड़ा और कड़वा विरोधाभास है कि औद्योगिक उत्पादों और कृषि उत्पादों के लिए दो अलग-अलग तराजू इस्तेमाल किए जाते हैं. देश में सीमेंट, स्टील, मोबाइल, कार, दवाइयां या एक पैकेट बिस्कुट बनाने वाली कंपनियां अपनी लागत और मनचाहे मुनाफे को जोड़कर खुद अपने उत्पाद की अधिकतम खुदरा कीमत यानी एमआरपी तय करती हैं. 

जब अंतरराष्ट्रीय बाजार या कच्चे माल के दाम बढ़ते हैं, तो ये कंपनियां धड़ल्ले से अपने सामान की कीमतें बढ़ा देती हैं और कंज्यूमर उसे बिना किसी विरोध के खरीदता है. लेकिन तब सरकार को इंडस्ट्री वाले उत्पादों की महंगाई को महंगाई मानने में हिचक होती है.

क्या सरकार ने कभी किसी प्राइवेट सीमेंट कंपनी या मोबाइल कंपनी के दाम आधा करने के लिए उसके समानांतर अपनी गाड़ियां बाजार में उतारी हैं? क्या कभी किसी कंपनी के मुनाफे पर अंकुश लगाने के लिए इस तरह का प्रशासनिक हस्तक्षेप किया जाता है? तब महंगाई को बाजार का नियम मानकर छोड़ दिया जाता है और किसान के मुनाफे को महंगाई का खलनायक बना दिया जाता है.

क‍िसानों को नुकसान पहुंचाती नीत‍ि

किसान जो खाद, उन्नत बीज, कीटनाशक, ट्रैक्टर और डीजल खरीदता है, वह सब कंपनियों से महंगे और फिक्स दाम पर खरीदता है, लेकिन जब वही किसान अपनी छह महीने की गाढ़ी कमाई और मेहनत को बेचने बाजार में आता है, तो सरकार उस पर प्राइस कैपिंग, एक्सपोर्ट बैन, भारी एक्सपोर्ट ड्यूटी और बफर स्टॉक रिलीज करने का हंटर चला देती है. क‍िसानों के उत्पादों की कीमत पर सरकारी न‍ियंत्रण की वजह से ही आज भारतीय क‍िसान पर‍िवारों की औसत इनकम स‍िर्फ 10,218 रुपये प्रत‍िमाह है.

विकसित और समृद्ध देशों के अंतरराष्ट्रीय संगठन ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (OECD) की रिपोर्ट भारतीय कृषि नीति की कलई खोलती है. ओईसीडी की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2000 से लेकर 2025 के बीच पिछले 25 सालों में भारत के किसानों को 111 लाख करोड़ रुपये का भारी नुकसान उठाना पड़ा है. यह नुकसान इसलिए हुआ क्योंकि सरकार की ऐसी ही उपभोक्ता-केंद्रित नीतियों के कारण किसानों को उनकी फसलों का सही और वैश्विक बाजार के अनुरूप दाम नहीं मिलने दिया गया. 

कंज्यूमर बनाम क‍िसान

बहरहाल, प्याज और चीनी के दाम को कंट्रोल करने वाली स्थिति साफ तौर पर एक देश में दो अलग-अलग विधान की नीति को दर्शाती है, जो पूरी तरह से कंज्यूमर-केंद्रित है. नीति निर्माताओं को कंज्यूमर के आंसू तो दिखाई दे रहे हैं लेकिन चिलचिलाती धूप, कड़कड़ाती ठंड और बेमौसम बरसात में खेत की मिट्टी में अपना हाड़-मांस गलाने वाले किसान के पैरों के छाले और उसकी आंखों का सूखापन दिखाई नहीं दे रहा. 

जब प्याज साल भर 2 रुपये किलो बिका, तब किसानों का कोई माई-बाप नहीं था. तब न तो किसी ने किसानों के नुकसान की भरपाई की और न ही न्यूनतम दाम की कोई गारंटी दी. लेकिन अब जब चार पैसे कमाने की उम्मीद जागी है तो सरकार दाम गिराने के लिए बाजार में कूद पड़ी है.  

सरकार बफर स्टॉक खोलकर बाजार भाव से आधी कीमत महज 35 रुपये किलो पर प्याज उतार रही है, ताकि किसान के मुनाफे का कत्ल करके उपभोक्ता को खुश किया जा सके. यह तो खुलेआम 'प्रेडेटरी प्राइसिंग' यानी लागत से कम पर सामान बेचकर बाजार क्रैश करना है, तो फिर कंपटीशन कमीशन कहां सोया हुआ है?  

कब बनेगी क‍िसान केंद्र‍ित नीत‍ि?

अगर सरकार वास्तव में आम गरीब उपभोक्ताओं को सस्ता भोजन और सस्ती सब्जियां खिलाना ही चाहती है, तो उसे इसका पूरा खर्च अपने सरकारी खजाने और बजट से सब्सिडी के रूप में देना चाहिए. सरकार को चाहिए कि वह खुले बाजार से किसानों की फसल को उनके मुताबिक सही और मुनाफे वाले दाम पर खरीदे, ताकि किसान समृद्ध हो सके, और फिर उस खरीदे गए स्टॉक को अपने खर्च पर नुकसान उठाकर राशन की दुकानों या मोबाइल वैन के जरिए गरीबों को बांटे. लेकिन अपनी जेब से एक रुपया खर्च किए बिना, सिर्फ किसान के हक के मुनाफे का गला घोंटकर शहरों में सस्ती वाहवाही लूटने का  यह डबल स्टैंडर्ड नीति इस देश के अन्नदाता को हमेशा के लिए कर्जदार और लाचार बनाए रखेगी. जब तक देश के नीतिगत ढांचे में इस उपभोक्तावादी सोच को बदलकर किसान को एक सम्मानित बिजनेस पार्टनर नहीं माना जाएगा, तब तक यह एक देश, दो विधान का खेल चलता रहेगा और कृषि नीतियां किसानों की जेब काटने का काम करती रहेंगी.

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