
राजस्थान के कोटा में आलू को लेकर लोगों के बीच बनी एक आम धारणा पर वैज्ञानिकों ने बात की है. बोरखेड़ा स्थित कृषि विज्ञान केंद्र में आलू पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार शुरू हुआ है. इसमें देश के अलग-अलग राज्यों से करीब 70 वैज्ञानिक शामिल हुए. सेमिनार में आलू की नई किस्मों, इसके पोषण, जलवायु परिवर्तन के बीच खेती और किसानों की आय बढ़ाने जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई. इस मौके पर कृषि विज्ञान केंद्र में आलू की 16 अलग-अलग किस्मों की प्रदर्शनी भी लगाई गई. वैज्ञानिकों ने बताया कि आलू को लेकर अक्सर कहा जाता है कि इसे खाने से मोटापा बढ़ता है, लेकिन सिर्फ आलू को इसके लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता.
कृषि विश्वविद्यालय की कुलगुरु डॉ. विमला डुंकवाल ने बताया कि आलू में करीब 0.8 प्रतिशत फैट होता है. ऐसे में सिर्फ आलू खाने से वजन बढ़ने की बात सही नहीं है. उन्होंने बताया कि जब आलू को तेल या घी जैसी ज्यादा कैलोरी वाली चीजों के साथ पकाया जाता है, तो खाने में कैलोरी की मात्रा बढ़ जाती है. यानी आलू किस तरह पकाकर खाया जा रहा है, इसका भी काफी महत्व है.
केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला के डॉ. बृजेश सिंह ने बताया कि आलू को पकाने और खाने का तरीका उसके स्वास्थ्य प्रभाव पर असर डालता है. अगर आलू को ज्यादा तेल में फ्राई किया जाता है, तो उसमें तेल की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे यह स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है. वहीं, उबला हुआ आलू खाने के लिए बेहतर विकल्प हो सकता है, इसलिए आलू खाने के साथ इस बात पर भी ध्यान देना जरूरी है कि उसे किस तरीके से तैयार किया गया है.
सेमिनार में वैज्ञानिकों ने आलू को ज्यादा पौष्टिक बनाने पर भी चर्चा की. वैज्ञानिकों ने बताया कि ऐसी किस्में विकसित करने पर काम किया जा रहा है, जिनमें जिंक और आयरन की मात्रा ज्यादा हो. इसके अलावा वैज्ञानिक शुगर फ्री और प्रोटीन से भरपूर आलू विकसित करने की दिशा में भी शोध कर रहे हैं. ऐसी किस्मों से लोगों को बेहतर पोषण देने के साथ किसानों को भी नई फसल किस्मों का विकल्प मिल सकता है. साथ ही वैज्ञानिक ऐसी आलू की किस्मों पर भी काम कर रहे हैं, जिन्हें खाने के बाद ब्लड शुगर तेजी से न बढ़े. इसके लिए आलू की अलग-अलग किस्मों और उनके गुणों पर शोध किया जा रहा है.
महाराणा प्रताप कृषि विश्वविद्यालय, उदयपुर के कुलगुरु डॉ. प्रताप सिंह ने बताया कि कोटा के अर्जुनपुरा में भी आलू की अलग-अलग किस्मों पर काम किया जा रहा है. वैज्ञानिक ऐसी किस्में विकसित करने पर ध्यान दे रहे हैं, जिनसे किसानों को अच्छा उत्पादन मिले और लोगों को भी बेहतर पोषण मिल सके. सेमिनार में जलवायु परिवर्तन के असर के बीच आलू की खेती को बेहतर बनाने और किसानों की आमदनी बढ़ाने के तरीकों पर भी चर्चा की गई. यह आलू पर आयोजित 44वां राष्ट्रीय सेमिनार है.