मोबाइल नहीं, माचिस का फोन... अकोला के गणेश पंडाल में दिखा 1980 का पूरा गांव

मोबाइल नहीं, माचिस का फोन... अकोला के गणेश पंडाल में दिखा 1980 का पूरा गांव

अकोला के रोज परिवर्तन गणेश पंडाल में 1980 के दशक के गांव की झलक दिखाई गई है. झांकी में माचिस की डिब्बियों का फोन, कुआं, बैलगाड़ी, मिट्टी का चूल्हा, सिलबट्टा, पुराना टीवी, बायोस्कोप और चिट्ठी जैसे दृश्य दिखाए गए हैं. यह झांकी पुरानी पीढ़ी की यादें ताजा करने के साथ नई पीढ़ी को उस दौर की जिंदगी से रूबरू कराती है.

AI नहीं, असली झांकी में दिखा 1980 का गांवAI नहीं, असली झांकी में दिखा 1980 का गांव
धनंजय साबले
  • Akola,
  • Sep 23, 2026,
  • Updated Sep 23, 2026, 12:44 PM IST

आज सोशल मीडिया पर 1980 के दशक की तस्वीरों को AI की मदद से दोबारा बनाने का ट्रेंड चल रहा है. लेकिन महाराष्ट्र के अकोला में एक गणेश पंडाल ने इस पुराने दौर को तस्वीरों तक सीमित नहीं रखा. यहां 1980 के दशक के गांव और उस समय की जिंदगी को पूरी झांकी के रूप में तैयार किया गया है. इस झांकी में कुएं से पानी भरने से लेकर बैलगाड़ी, मिट्टी का चूल्हा, सिलबट्टा, पुराने टीवी, बायोस्कोप और बच्चों के माचिस की डिब्बियों से बनाए गए फोन तक सब कुछ दिखाया गया है.

गणेश पंडाल में दिखा 1980 का गांव

अकोला के सिंधी कैंप स्थित रोज परिवर्तन गणेश पंडाल में पहुंचने पर ऐसा लगता है जैसे समय कई दशक पीछे चला गया हो. यहां आज की मोबाइल और इंटरनेट वाली दुनिया के बजाय उस समय के गांव की तस्वीर दिखाई देती है. मिट्टी की दीवारों और कवेलू की छत वाले घर, गांव का कुआं, खेतों में बैल और पुराने समय की रसोई इस झांकी का हिस्सा हैं. यह झांकी खास तौर पर इसलिए लोगों का ध्यान खींच रही है, क्योंकि इसमें 1980 के दशक की जिंदगी को सिर्फ तस्वीरों या मॉडल के रूप में नहीं, बल्कि एक पूरे गांव की तरह दिखाने की कोशिश की गई है.

जब माचिस की डिब्बियां बन जाती थीं फोन

आज बच्चों के हाथ में स्मार्टफोन होता है. वीडियो कॉल और इंटरनेट के जरिए कुछ ही सेकंड में दुनिया के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से बात हो जाती है. लेकिन कुछ दशक पहले बच्चों के मनोरंजन के साधन बहुत साधारण हुआ करते थे. इस पंडाल में दो माचिस की डिब्बियों को धागे से जोड़कर बनाया गया खिलौना फोन भी दिखाया गया है. बच्चे एक डिब्बी को कान से लगाकर और दूसरी में बोलकर एक-दूसरे से बात करने का खेल खेलते थे. आज की Gen Z और Gen Alpha पीढ़ी के लिए यह चीज भले ही नई और मजेदार हो, लेकिन 1980 के दशक में बड़े हुए लोगों के लिए यह उनके बचपन की याद है.

कुएं से पानी और बैल से खेती

उस समय गांव की जिंदगी आज की तरह सुविधाओं से भरी नहीं थी. कई जगहों पर घरों तक नल का पानी नहीं पहुंचता था. कुएं से पानी भरकर घर लाना रोज की जिंदगी का हिस्सा था. पंडाल की झांकी में भी इसी तरह कुएं से पानी भरते हुए लोगों का दृश्य बनाया गया है. खेती की तस्वीर भी उस समय से काफी अलग थी. खेतों में आज की तरह हर जगह ट्रैक्टर और आधुनिक मशीनें नहीं दिखाई देती थीं. बैल और हल से खेती करना आम बात थी. झांकी में बैल, खेत और पारंपरिक खेती के साधनों के जरिए उस दौर की ग्रामीण जिंदगी को दिखाया गया है.

मिट्टी के चूल्हे और सिलबट्टे वाली रसोई

1980 के दशक के गांव की रसोई भी आज से काफी अलग थी. कई घरों में खाना मिट्टी के चूल्हे पर बनाया जाता था. गैस स्टोव और आधुनिक किचन का चलन उस तरह नहीं था जैसा आज दिखाई देता है. मसाले पीसने के लिए मिक्सर की जगह सिलबट्टे का इस्तेमाल किया जाता था. अकोला के इस गणेश पंडाल में मिट्टी के चूल्हे और सिलबट्टे को भी झांकी का हिस्सा बनाया गया है. पुरानी पीढ़ी के लोग जब इन चीजों को देखते हैं तो उन्हें अपने घर और बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं.

साइकिल के टायर से होता था बच्चों का खेल

आज बच्चों के मनोरंजन के लिए मोबाइल फोन, वीडियो गेम और कई तरह के ऑनलाइन गेम मौजूद हैं. लेकिन पहले बच्चों के खेल के लिए किसी महंगे सामान की जरूरत नहीं होती थी. साइकिल का पुराना टायर और एक लकड़ी का टुकड़ा ही बच्चों के लिए खेल का साधन बन जाता था. बच्चे लकड़ी से टायर को धकेलते हुए गलियों में दौड़ते थे. पंडाल में इस खेल को भी दिखाया गया है, जिससे पुरानी पीढ़ी को अपना बचपन याद आ रहा है.

गांव में आया नया-नया टीवी तो पूरा परिवार बैठता था

1980 का दशक तकनीक में बदलाव का समय भी था. उस दौर में टेलीविजन गांवों तक पहुंचना शुरू हुआ तो यह अपने आप में बड़ी बात होती थी. घर की छत पर लगा टीवी का एंटीना और टीवी के सामने बैठे परिवार का दृश्य उस समय की खास यादों में शामिल था. एक टीवी देखने के लिए सिर्फ परिवार ही नहीं, बल्कि कई बार आसपास के लोग भी एक जगह इकट्ठा हो जाते थे. आज जब हर व्यक्ति के हाथ में मोबाइल और अलग-अलग स्क्रीन हैं, उस समय एक टीवी लोगों को एक साथ बैठने का मौका देता था. पंडाल में पुराने बॉक्स टीवी और एंटीना के जरिए इसी माहौल को दोबारा तैयार किया गया है.

टॉकीज नहीं थी तो बायोस्कोप बना मनोरंजन का साधन

आज फिल्म देखने के लिए मोबाइल, टीवी, ओटीटी प्लेटफॉर्म और सिनेमा हॉल जैसे कई विकल्प मौजूद हैं. लेकिन पुराने समय में गांवों में मनोरंजन के साधन सीमित थे. हर जगह सिनेमा हॉल या टॉकीज उपलब्ध नहीं होती थी. ऐसे में बायोस्कोप लोगों के लिए खास आकर्षण हुआ करता था. छोटे से बायोस्कोप में फिल्मी तस्वीरें देखने के लिए बच्चे और बड़े उत्सुकता से पहुंचते थे. गणेश पंडाल की झांकी में बायोस्कोप को भी जगह दी गई है, ताकि नई पीढ़ी उस समय के मनोरंजन को समझ सके.

चिट्ठी का इंतजार भी था जिंदगी का हिस्सा

आज किसी को संदेश भेजना हो तो कुछ सेकंड में मोबाइल पर मैसेज पहुंच जाता है. लेकिन उस दौर में किसी अपने की चिट्ठी आने का इंतजार कई दिनों तक करना पड़ता था. साइकिल से घर पहुंचता पोस्टमैन, हाथ में चिट्ठी और उसे पढ़ने की उत्सुकता उस समय की जिंदगी का हिस्सा थी. पंडाल में पोस्टमैन और चिट्ठी के जरिए उस दौर की डाक व्यवस्था और लोगों की भावनाओं को भी दिखाया गया है.

नई पीढ़ी को पुराने दौर से जोड़ रही झांकी

रोज परिवर्तन गणेश पंडाल की यह झांकी सिर्फ पुरानी चीजों को दिखाने तक सीमित नहीं है. इसका एक उद्देश्य नई पीढ़ी को यह बताना भी है कि उनके माता-पिता और दादा-दादी का बचपन कैसा था. आज की पीढ़ी मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल सुविधाओं के बीच बड़ी हो रही है. ऐसे में उनके लिए कुएं से पानी भरना, मिट्टी के चूल्हे पर खाना बनाना, बैल से खेती करना या बायोस्कोप में फिल्म देखना बिल्कुल अलग अनुभव हो सकता है.

गणेश उत्सव के जरिए दिया पुरानी यादों का संदेश

रोज परिवर्तन गणेश पंडाल के अध्यक्ष राजकुमार गिर ने बताया कि गणेश उत्सव के जरिए हर साल किसी न किसी खास संदेश को सामने लाने की कोशिश की जाती है. इस बार 1980 के दशक के गांव और उस समय की जीवनशैली को झांकी के जरिए दिखाया गया है. उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी मोबाइल और डिजिटल दुनिया में बड़ी हो रही है. इसलिए कोशिश की गई है कि उन्हें यह भी पता चले कि उनके माता-पिता और बुजुर्ग किस तरह की जिंदगी जीते थे. उनके मुताबिक, इस झांकी को तैयार करते समय पुरानी यादें खुद उनके लिए भी भावुक करने वाली रहीं.

एक झांकी में दो पीढ़ियों की कहानी

अकोला के इस गणेश पंडाल की झांकी में एक तरफ 1980 का गांव दिखाई देता है तो दूसरी तरफ आज की डिजिटल दुनिया का अंतर भी समझ आता है. एक समय था जब बच्चे माचिस की डिब्बियों से फोन बनाकर खेलते थे, पानी कुएं से आता था, खाना मिट्टी के चूल्हे पर बनता था और चिट्ठी का इंतजार कई दिनों तक रहता था. आज मोबाइल फोन, इंटरनेट और आधुनिक सुविधाओं ने जिंदगी को काफी बदल दिया है. लेकिन इस झांकी के जरिए पुरानी पीढ़ी को अपना बचपन याद करने और नई पीढ़ी को उस दौर को समझने का मौका मिल रहा है.

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