
भारत में जब टैलेंट, व्यापार और कंपनियों की बात आती है, तो हम 'ओपन मार्केट' और 'असीमित विकास' की वकालत करते हैं. लेकिन जैसे ही बात देश के पेट भरने वाले किसान की आती है तब हमारा कानून 'समाजवाद' का चश्मा पहन लेता है. देश में 'लैंड सीलिंग एक्ट' यानी भूमि सीमा कानून लागू है, जो एक किसान को एक निश्चित सीमा से अधिक जमीन रखने की इजाजत नहीं देता. सोचिए, अगर यही 'सीलिंग एक्ट' देश की अन्य महान हस्तियों पर लागू होता तो क्या होता? 'किसान तक' के पॉडकास्ट 'अन्नगाथा' में शेतकरी संगठन के नेता और एमएसपी कमेटी के सदस्य गुणवंत पाटिल ने समाज के अन्य क्षेत्रों के दिग्गजों का उदाहरण देकर बताया कि कैसे इस कानून ने भारतीय किसान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आर्थिक रूप से गरीब और लाचार बनाए रखने का काम किया है.
पाटिल का सबसे बड़ा तर्क समाज के अन्य सफल क्षेत्रों से की गई तुलना है. वे सवाल उठाते हैं कि क्या हम किसानों की तरह किसी कलाकार, खिलाड़ी या उद्योगपति के लिए कोई सीमा तय कर सकते हैं? भारत की एग्रीकल्चर पॉलिसी में लैंड सीलिंग एक्ट को सामाजिक न्याय और जमीन के समान वितरण के एक बड़े हथियार के रूप में पेश किया गया है. लेकिन पाटिल का विश्लेषण इस स्थापित नैरेटिव को पूरी तरह से उलट देता है.
गुणवंत पाटिल कहते हैं कि अगर अमिताभ बच्चन पर सीलिंग होती कि वे 100 फिल्मों से ज्यादा काम नहीं कर सकते, तो वे कभी महानायक नहीं बनते. अगर सचिन तेंदुलकर को 90 रनों पर रोक दिया जाता कि बाकी दूसरों को भी खेलने दो तो न उनकी सेंचुरी होती और न वे 'भारत रत्न' बनते. अगर लता मंगेशकर पर 400 गानों की अधिकतम सीमा तय होती तो भारतीय संगीत इतिहास इतना समृद्ध नहीं होता....लेकिन ठीक यही अन्याय किसानों के साथ किया गया है.
पाटिल का कहना है कि कृषि सीलिंग एक्ट का तर्क था कि जमीन सीमित है, इसलिए इसका समान वितरण होना चाहिए. यह तर्क पहली नजर में अच्छा लगता है, लेकिन इसके गहरे नुकसानों को नजरअंदाज कर दिया गया. सीलिंग एक्ट और पारिवारिक बंटवारों के कारण आज भारत में औसतन किसानों के पास 2 एकड़ से भी कम जमीन बची है.
इस कानून ने अनजाने में जमीनों के इतने छोटे-छोटे टुकड़े कर दिए हैं कि वहां आधुनिक तकनीक, भारी मशीनरी जैसे कंबाइन हार्वेस्टर, ड्रोन और बड़े पैमाने पर उत्पादन करना आर्थिक रूप से घाटे का सौदा बन गया है. कानूनन बड़ी जमीन न रख पाने की मजबूरी ने भारतीय खेती को मुनाफे का बिजनेस बनने से रोककर महज गुजारे का साधन बनाकर छोड़ दिया है.
एक उद्योगपति हजारों एकड़ में फैक्ट्री फैला सकता है, अपनी संपत्ति अरबों-खरबों में बढ़ा सकता है, लेकिन एक किसान अपनी मेहनत की कमाई से भी ज्यादा जमीन खरीदकर एक 'कृषि साम्राज्य' खड़ा नहीं कर सकता. अगर किसी किसान में काबिलियत है, तो उसे 500 एकड़ का आधुनिक फार्म बनाने की आजादी क्यों नहीं होनी चाहिए?
अन्नदाता को सिर्फ 'गुज़ारे' लायक बनाए रखने की जिद ने कृषि को एक घाटे का सौदा बना दिया है. केवल किसान पर ही 12 या 18 एकड़ की अधिकतम सीमा (सीलिंग) क्यों थोपी गई है? यह कानून किसान की आर्थिक ऊंचाइयों को छूने की क्षमता पर सरकार द्वारा लगाए गए एक प्रतिबंध की तरह है. अब समय आ गया है कि हम किसान को सिर्फ 'राहत और सब्सिडी' के जाल में न फंसाएं, बल्कि उसे अपनी संपत्ति और व्यापार बढ़ाने की वही आजादी दें, जो देश के किसी भी अन्य नागरिक को हासिल है.
पाटिल ने कहा कि बाबासाहेब भीम राव अंबेडकर द्वारा लिखे गए मूल संविधान में किसानों के विरोध में कोई कानून नहीं था. लेकिन, 18 जून 1951 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में पहला संशोधन लाकर 9वीं अनुसूची का निर्माण किया गया. उसके बाद किसानों के खिलाफ बने कानूनों को अदालती समीक्षा के दायरे से बाहर कर दिया गया.
इसके तहत साफ प्रावधान किया गया कि जो भी कानून इस 9वीं अनुसूची में डाल दिया जाएगा, उसे अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती. यानी वह अदालती समीक्षा से बाहर हो जाएगा. अदालतों को उसे 'अवैध' घोषित करने का अधिकार छीन लिया गया. पाटिल का आरोप है कि यह सब किसानों के खिलाफ था. साल 1951 में जब यह अनुसूची बनी, तो इसमें सबसे पहले 13 कानून डाले गए थे. ये सभी 13 कानून राज्यों के भूमि सुधार, जमींदारी उन्मूलन और कृषि भूमि से जुड़े थे.
पाटिल के मुताबिक, मूल संविधान ने नागरिकों को संपत्ति का मौलिक अधिकार दिया था. जब जमींदारों और संपन्न किसानों ने अपनी जमीनें छीने जाने के खिलाफ हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में केस जीते तो नेहरू सरकार ने कोर्ट के फैसले को पलटने और किसानों के संपत्ति के अधिकार को दबाने के लिए ही यह सुरक्षा कवच बनाया. इस व्यवस्था के तहत किसानों को आर्थिक रूप से पंगु बनाने के लिए कई कानून बनाए गए. जिनमें एग्रीकल्चर लैंड सीलिंग एक्ट भी शामिल है.
इस कानून ने किसानों को बड़ी जोत रखने से रोका, जिससे कृषि का औद्योगिक विकास रुक गया. पाटिल ने कहा कि एसेंशियल कमोडिटीज एक्ट, 1955 में बना. यह कानून किसानों को अपनी फसल के स्वतंत्र बिक्री के अधिकार को छीनता है. जैसे ही बाजार में फसल के दाम बढ़ते हैं, सरकार व्यापारियों पर स्टॉक लिमिट लगा देती है या एक्सपोर्ट बैन कर देती है. इससे बाजार में कृषि उपज के भाव गिर जाते हैं. किसानों को खुली लूट का शिकार होना पड़ता है. यानी इस कानून से कृषि उपज का दाम कंट्रोल किया जाता है. पाटिल कहते हैं कि भारत में कृषि संकट केवल मौसम या कर्ज की समस्या नहीं है, बल्कि यह गलत नीतियों की देन भी है.
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