मनरेगा में कैसे हुआ 302 करोड़ का घोटाला? रिपोर्ट ने किए चौंकाने वाले खुलासे

मनरेगा में कैसे हुआ 302 करोड़ का घोटाला? रिपोर्ट ने किए चौंकाने वाले खुलासे

ग्रामीण विकास मंत्रालय की रिपोर्ट में मनरेगा योजना में 302 करोड़ रुपये के घोटाले का खुलासा हुआ है. 25 राज्यों में जांच के दौरान कागजों में काम और जमीन पर कुछ न होने की सच्चाई सामने आई.

मनरेगा ऑडिट रिपोर्ट ने खोली पोलमनरेगा ऑडिट रिपोर्ट ने खोली पोल
क‍िसान तक
  • Noida ,
  • Jan 15, 2026,
  • Updated Jan 15, 2026, 6:48 PM IST

ग्रामीण विकास मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानी (MGNREGA) योजना में सैकड़ों करोड़ रुपये का घोटाला सामने आया है. यह योजना गरीब लोगों को रोजगार देने और गांवों में विकास कार्य कराने के लिए बनाई गई थी. लेकिन रिपोर्ट में बताया गया है कि इसी योजना के नाम पर बहुत बड़ा फर्जीवाड़ा किया गया. मौजूदा वित्तीय वर्ष में नवंबर तक यानी अप्रैल 2025 से नवंबर 2025 के बीच 8 महीनों में 25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 55 जिलों में सतर्कता यानी विजिलेंस जांच की गई. इस जांच में 11 लाख से ज्यादा गड़बड़ी के मामले सामने आए. इन मामलों में करीब 302 करोड़ रुपये के घोटाले का अनुमान लगाया गया है.

काम गरीबों के नाम पर, पैसा घोटाले में

यह घोटाला गरीब लोगों को रोजगार देने और मनरेगा के तहत विकास कार्य करने के नाम पर किया गया. ऑडिट सिर्फ आठ महीने का था, लेकिन इतने कम समय में ही इतनी बड़ी गड़बड़ी सामने आ गई. जांच में यह भी पाया गया कि इस घोटाले में अधिकारी, ठेकेदार और बैंक मैनेजर भी शामिल थे.

काम जमीन पर नहीं, सिर्फ कागजों में

जांच में यह बात साफ सामने आई कि कई जगह काम जमीन पर हुआ ही नहीं. काम सिर्फ कागजों में दिखाया गया. नकली दस्तावेज बनाए गए और उनके आधार पर भुगतान कर लिया गया. असली काम कहीं दिखाई नहीं दिया.

आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और बंगाल में सबसे ज्यादा मामले

इस घोटाले के सबसे बड़े मामले आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में पाए गए. ग्रामीण विकास मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार यह पूरा मामला अप्रैल 2025 से नवंबर 2025 तक केवल 8 महीनों का है. इन 8 महीनों में किसानों, अधिकारियों और बैंक मैनेजरों ने आपस में मिलकर इस घोटाले को अंजाम दिया. काम जमीन पर नहीं हुआ, लेकिन उसकी पूरी नकली कागजी तैयारी दिखाई गई. जांच से बचने के लिए बड़े कामों को छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दिया गया.

रोक के बावजूद गलत काम

कई राज्यों में रोक होने के बावजूद गैरकानूनी काम भी मनरेगा के तहत दिखाए गए. कई जगहों पर 80 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की भागीदारी दर्ज की गई, जो साफ तौर पर गलत थी. कई जगहों पर खरीद प्रक्रिया में भी गड़बड़ियां मिलीं. कई मामलों में एक ही विक्रेता से बार-बार सामान खरीदा गया. कहीं एक ही टेंडर का भुगतान किया गया. कुछ जगहों पर यूनिट में रॉयल्टी भुगतान से जुड़े दस्तावेज भी नहीं मिले.

विजिलेंस जांच में बड़े खुलासे

ग्रामीण विकास मंत्रालय की विजिलेंस जांच में यह पूरा फर्जीवाड़ा सामने आया. इन 8 महीनों में 25 राज्यों के 25 जिलों में विजिलेंस जांच की गई. इस दौरान 1000 से ज्यादा कार्य स्थलों का निरीक्षण किया गया.

11 लाख 4627 मामलों में गड़बड़ी

जांच के दौरान 11 लाख 4627 मामलों में गड़बड़ियां पाई गईं. इनमें कई जगह खर्च दिखाया गया लेकिन जमीन पर काम मौजूद नहीं था. कई जगह गैर-अनुमेय काम किए गए. वित्तीय गड़बड़ी और पैसे का दुरुपयोग भी सामने आया. कई मामलों में ऊपरी स्तर से मंजूरी लेने से बचने के लिए कामों को जानबूझकर छोटे-छोटे भागों में बांट दिया गया. मनरेगा कानून में ठेकेदारों की भागीदारी पर साफ रोक है, फिर भी कई जगह ठेकेदारों या तीसरे पक्ष से काम कराया गया.

खरीद प्रक्रिया और निगरानी कमजोर

जांच में यह भी सामने आया कि खरीद प्रक्रियाएं बहुत कमजोर थीं. शासन और निगरानी व्यवस्था में भी गंभीर कमियां देखी गईं.

फर्जी जॉब कार्ड और मस्टर रोल

कई जगह फर्जी और इनएक्टिव जॉब कार्ड पाए गए. मस्टर रोल में मजदूरों की संख्या बढ़ा-चढ़ाकर दर्ज की गई. अधूरे और खराब गुणवत्ता वाले काम किए गए. कई संपत्तियां स्थानीय जरूरतों से मेल नहीं खाती थीं.

इस पूरे मामले में 302 करोड़ 45 लाख रुपये को वसूली योग्य माना गया. लेकिन इसमें से 293 करोड़ 43 लाख रुपये ही वसूल हो सके.

जिन राज्यों में जांच हुई

जिन 25 राज्यों में जांच हुई उनमें तमिलनाडु के 10 जिले, आंध्र प्रदेश के 4, केरल के 6, पंजाब के 5, उत्तर प्रदेश के 2 और हरियाणा, उत्तराखंड, गुजरात, जम्मू-कश्मीर, छत्तीसगढ़ और बिहार के एक-एक जिले शामिल हैं.

शुरुआती वर्षों में रिकॉर्ड बहुत कमजोर

मंत्रालय की जांच में यह भी सामने आया कि शुरुआती वर्षों में योजना की निगरानी और रिकॉर्ड व्यवस्था बहुत कमजोर थी. कई जगह करोड़ों रुपये के काम सिर्फ कागजों में दिखाए गए. जमीन पर न सड़क बनी, न तालाब और न ही मेड़.

न फोटो, न लोकेशन, न रिकॉर्ड

काम की न कोई फोटो होती थी, न जीपीएस लोकेशन दर्ज होती थी और न ही कोई पक्का रिकॉर्ड रखा जाता था. जांच में यह भी पाया गया कि एक ही व्यक्ति के नाम पर कई जॉब कार्ड बनाए गए.

मृत लोगों के नाम पर भुगतान

कई मृत लोगों के नाम पर भी मजदूरी का भुगतान किया गया. असली मजदूरों तक पूरा पैसा नहीं पहुंचा. बिचौलिए बीच में पैसा खा जाते थे और सिस्टम में हर जगह घुसे हुए थे.

2014 तक आधार से जुड़ाव बहुत कम

जनवरी 2014 तक सिर्फ 76 लाख मजदूरों के आधार नंबर ही मनरेगा रिकॉर्ड से जुड़े थे, जबकि योजना में करोड़ों लोग दर्ज थे. जांच में यह भी पाया गया कि पंचायत स्तर पर रिकॉर्ड की स्थिति बहुत खराब थी. फील्ड कर्मचारियों को 22 से 29 अलग-अलग रजिस्टर भरने पड़ते थे. इतने ज्यादा रजिस्टर होने से गलती और गड़बड़ी की संभावना बढ़ गई.

2014 के बाद सुधार शुरू

2014 के बाद पूरी व्यवस्था सुधारने की कोशिश शुरू हुई. 2016 में मनरेगा के तहत बने कामों की जियो टैगिंग जरूरी कर दी गई. अब हर काम की फोटो और उसकी जीपीएस लोकेशन सिस्टम में दर्ज होने लगी.

पेमेंट सिस्टम में बदलाव

मजदूरों की पहचान मजबूत करने के लिए आधार सीडिंग पर जोर दिया गया. आज 12 करोड़ से ज्यादा सक्रिय मजदूरों के आधार नंबर मनरेगा से जुड़े हैं. मजदूरी का भुगतान आधार पेमेंट ब्रिज सिस्टम और नेशनल इलेक्ट्रॉनिक फंड मैनेजमेंट सिस्टम से सीधे बैंक खाते में भेजा जाने लगा. पहले ई-पेमेंट सिर्फ 37 प्रतिशत था, जो अब बढ़कर 100 प्रतिशत हो गया है.

शिवराज सिंह चौहान का बयान

कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि मनरेगा में बहुत भ्रष्टाचार था. मजदूरों की जगह मशीनों से काम कराया जाता था. मजदूरों की जगह ठेकेदारों से काम कराया जाता था. ओवर एस्टीमेट बनाए जाते थे और एक ही काम बार-बार दिखाया जाता था. उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी राशि का सही इस्तेमाल गांवों के विकास में नहीं हो पा रहा था. इसलिए विकसित भारत जी राम जी योजना लाई गई. इसमें 100 की जगह 125 दिन का रोजगार और 1,51,282 करोड़ रुपये की राशि से गांवों का विकास किया जाएगा. उन्होंने कहा कि मजदूरों के हितों की रक्षा की जाएगी. रोजगार नहीं मिलने पर बेरोजगारी भत्ता मिलेगा. मजदूरी में देरी होने पर ब्याज के साथ भुगतान किया जाएगा. खेती के समय 60 दिन तक योजना रोकने का प्रावधान भी किया गया है.

भागलपुर का 20 करोड़ का मामला

भागलपुर के जगदीशपुर प्रखंड की सैनो पंचायत में मनरेगा कार्यों में लगभग 20 करोड़ रुपये का घोटाला सामने आया. जमीन पर काम नहीं हुआ और पैसे निकाल लिए गए. रोजगार सेवक छट्टू दास को बर्खास्त कर दिया गया.

मुंगेर में नहर सफाई का मामला

मुंगेर के असरगंज प्रखंड में नहर की सफाई नहीं होने से खेतों में पानी भर गया और फसल खराब हो गई. किसानों ने जांच और कार्रवाई की मांग की.

झारखंड में बकरी शेड घोटाला

झारखंड के साहिबगंज जिले में बकरी शेड योजना में लोगों से पैसे लिए गए. काम अधूरा रहा और पूरी राशि निकाल ली गई.

पसौरी पंचायत में काम नहीं

मनेंद्रगढ़ जिले की पसौरी पंचायत में दो साल से मजदूरों को कोई काम नहीं मिला. जॉब कार्ड होने के बावजूद रोजगार नहीं मिला.

मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के मामले

मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में मृत लोगों के नाम पर काम दिखाया गया. उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले में कागजों में काम दिखा लेकिन जमीन पर मजदूर नहीं मिले. (अशोक सिंघल- दिल्ली, अतुल तिवारी- अहमदाबाद, गोविंद कुमार- मुंगेर, प्रवीण कुमार- साहिबगंज, धीरेन्द्र विश्वकर्मा- एमसीबी, रविश- झाबुआ, अमितेश त्रिपाठी- महराजगंज का इनपुट)

ये भी पढ़ें: 

Chana Procurement: कर्नाटक में चना किसान संकट में, सीएम सिद्धारमैया ने की प्रधानमंत्री मोदी से बड़ी अपील 
Wheat Export: उत्पादन में र‍िकॉर्ड बना रहे गेहूं का क्यों बैन है एक्सपोर्ट, क‍िसानों को हुए नुकसान की कौन करेगा भरपाई?

MORE NEWS

Read more!