Ground Report: बिहार में बंद चीनी मिलें फिर चलेंगी? किसानों ने गिनाईं गन्ना उद्योग और खेती की बड़ी चुनौतियां

Ground Report: बिहार में बंद चीनी मिलें फिर चलेंगी? किसानों ने गिनाईं गन्ना उद्योग और खेती की बड़ी चुनौतियां

बिहार सरकार ने बंद पड़ी चीनी मिलों को दोबारा शुरू करने का ऐलान किया है, लेकिन गन्ना किसानों का कहना है कि यह राह आसान नहीं. सीड मल्टीप्लिकेशन, मिलों की कमी, सिंचाई, बीमारी और ढुलाई लागत जैसी चुनौतियां बड़ी बाधा बन सकती हैं.

Bihar sugar mills revivalBihar sugar mills revival
रवि कांत सिंह
  • New Delhi ,
  • Jan 15, 2026,
  • Updated Jan 15, 2026, 11:10 AM IST

बिहार सरकार ने अभी हाल में बताया कि राज्य में बंद पड़ी चीनी मिलों को दोबारा शुरू किया जाएगा. इसके लिए गन्ने की खेती को बढ़ावा दिया जाएगा और गन्ना उद्योग को भी संजीवनी दी जाएगी. इसके लिए सरकार के साथ-साथ किसानों को भी लगना होगा. सब्सिडी से लेकर अन्य वित्तीय मदद तक, सरकार हरसंभव किसानों की मदद में खड़ी होगी ताकि किसान गन्ने की खेती को दोबारा उस लय में लौटा सकें जैसा चार-पांच दशक पहले था. इस काम में सरकार की मंशा साफ है, किसानों की भी. लेकिन क्या यह काम इतना आसान है जितना दिख रहा है? किसानों की मानें तो नहीं, क्योंकि गन्ना उद्योग को पटरी पर लाने में चुनौतियां कई हैं और समय बहुत कम. ये चुनौतियां क्या हैं, आइए किसानों की जुबानी जानते हैं.

बिहार का चंपारण जिला गन्ने की खेती और गन्ना उद्योग का हब है. यहां के कई किसान इसी गन्ने की बदौलत आज 'संभ्रांत किसानों' की कतार में खड़े हुए हैं. जमीन-जायदाद से लेकर रोजी-रोजगार तक, इसी गन्ने की खेती और चीनी मिलों ने उन्हें बख्शा है. इन तमाम खुशियों के बीच किसानों की कुछ शिकायतें भी हैं. वे बताते हैं कि सरकार का ऐलान सही दिशा में है, मगर इसे पटरी पर आते-आते चार-पांच साल लग जाएंगे. यह काम इतना आसान नहीं जितना बोला जा रहा है.

मिलों का अभी तक काम शुरू नहीं

चंपारण के किसान विजय पांडेय ने 'किसान तक' से बातचीत में कहा, सरकारी ऐलान के महीने दिन से ज्यादा हो गए, लेकिन इस दिशा में अभी कोई काम शुरू नहीं हुआ है. चंपारण में तो हालात कुछ अच्छे हैं, मगर गोपालगंज की मिलों पर तो अभी सरकार की नजर भी नहीं गई. वे कहते हैं कि चीनी मिलों और गन्ने की खेती को रातों-रात नहीं सुधार सकते, इसमें कई साल लगेंगे.

वे तर्क देते हैं कि नई या पुरानी गन्ना मिल शुरू करने के लिए कच्चे माल की जरूरत होगी. यानी चीनी पेराई के लिए गन्ना भरपूर चाहिए. और यह गन्ना कुछ महीने या सालभर में तैयार नहीं कर सकते. इसके लिए किसानों को पहले तैयार करना होगा कि मिल की खपत लायक वे गन्ना उगाएं, जिसे वे बहुत पहले छोड़ चुके हैं. 

सीड मल्टीप्लिकेशन पर गौर करे सरकार

विजय पांडेय कहते हैं, किसी भी गन्ना फैक्ट्री को दोबारा शुरू करने या नई मिल खोलने के लिए कम से कम तीन साल 'सीड मल्टीप्लिकेशन' की जरूरत होती है. यानी तीन-चार साल में गन्ने का इतना स्टॉक तैयार किया जाए ताकि पेराई का काम सुचारू चल सके. वरना मिल घाटे में आ जाएगी, फिर किसानों को भी नुकसान होगा. उन्होंने बताया कि अभी तक सरकार की तरफ से सीड मल्टीप्लिकेशन के लिए कोई ऑफर नहीं मिला है. और न ही गन्ना मिलों ने खेती बढ़ाने के लिए किसानों से संपर्क किया है.

मुख्य फसल गन्ना, लेकिन कोई फैक्ट्री नहीं

पश्चिमी चंपारण जिले के गांव मधुबनी के किसान कामेश्वर कुमार भी कई चुनौतियां बताते हैं. उनके जिले में चार ब्लॉक हैं-मधुबनी, भितहां, ठकराहां और पिपरासी. ये चारों ब्लॉक गन्ने का बड़ा बेल्ट हैं. यूपी के कुशीनगर जिले से यह इलाका सटा हुआ है, लेकिन अभी तक यहां कोई फैक्ट्री शुरू नहीं हुई. यहां के किसानों की मुख्य फसल गन्ना ही है. 

वे बताते हैं कि कोई मिल नहीं होने से किसानों को 80 किलोमीटर दूर चंपारण की मिलों में गन्ना ले जाना होता है. इससे गन्ना ढुलाई का खर्च बढ़ जाता है. एक ट्रैक्टर माल ले जाने में ही 5 हजार रुपये खर्च हो जाता है. अगर नजदीक में कोई मिल हो तो किसानों का खर्च बचेगा, उनकी कमाई बढ़ेगी. उन्हें उम्मीद है कि सरकार कुछ करेगी, लेकिन कब, अभी इसका अंदाजा नहीं.

किसानों की ये मांगें मान लो सरकार

उनकी कुछ वाजिब मांगें हैं. वे कहते हैं, सरकार इस क्षेत्र में सिंचाई और जलनिकासी का समुचित बंदोबस्त करे. खेतों में सिंचाई के लिए बोरिंग ही एकमात्र सहारा है जिसके लिए हजारों रुपये का डीजल खर्च होता है. वे मांग करते हैं कि सरकार हर खेत तक बिजली की व्यवस्था करे ताकि समय पर फसल को पानी मिले. बरसात के दिनों में खेतों में पानी लगने से गन्ने की फसल सूख जाती है. इसलिए सरकार मनरेगा के तहत जलनिकासी की उचित व्यवस्था करे ताकि फसल बर्बाद न हो.

बेस्ट वैरायटी को किसकी लगी नजर

चंपारण में मधुबनी के ही एक और किसान दीपक यादव बड़ी समस्या उजागर करते हैं. वे कहते हैं, इस पूरे इलाके में कुछ साल पहले तक गन्ने की सबसे उत्तम प्रजाति CO 0238 की खेती होती थी. यह किस्म कम लागत में सबसे अधिक पैदावार देती थी. लेकिन दो-तीन साल से इस किस्म में नई बीमारी लग रही है. बीमारी लगने से गन्ने की अधिकांश फसल खेत में ही सूख जाती है. दीपक यादव की 40-50 क्विंटल फसल इस बार सूख गई. इसका समाधान मांगने वे जिले के कृषि अधिकारियों के पास भी जाते हैं, लेकिन कोई इलाज नहीं मिलता. इलाके के पूरे किसान बेबस हैं, आखिर वे करें क्या.

सरकार जरूर सुने ये सुझाव 

दीपक यादव कहते हैं कि सरकार कोई बड़ा काम करे, उससे पहले CO 0238 किस्म की बीमारी दूर करे ताकि कम लागत में अधिक पैदावार मिल सके. गन्ने की और भी कई किस्में हैं जिनकी खेती हो रही है, लेकिन उसमें खर्च ज्यादा और आमदनी कम है. वे कहते हैं कि सरकार चीनी मिलें शुरू करके क्या करेगी जब किसानों को गन्ने की बेस्ट वैरायटी नहीं मिलेगी. किसान आखिर अधिक खर्च में कम फायदे वाली फसल क्यों लगाएगा. 

किसानों के सामने ये तमाम चुनौतियां हैं जो आगे चलकर सरकार के लिए भी चैलेंज बनेंगी. इसलिए सरकार बड़ा कदम उठाने से पहले किसानों की इन शिकायतों से निपटे तो आगे का रास्ता साफ और आसान हो सकता है.

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