
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने हाल ही में एक कार्यक्रम में बताया कि राज्य का बासमती चावल 47 देशों में भेजा जा रहा है. यह बात उन्होंने रायसेन जिले में किसानों के एक बड़े कार्यक्रम में कही. यह सुनकर किसानों में खुशी की लहर दौड़ गई, क्योंकि इसका मतलब है कि उनके चावल की मांग विदेशों में भी है.
GI यानी “जियोग्राफिकल इंडिकेशन” एक खास पहचान होती है. यह बताती है कि कोई चीज किस खास जगह की है. जैसे दार्जिलिंग की चाय या बनारस की साड़ी. उसी तरह बासमती चावल के लिए भी कुछ खास इलाके तय किए गए हैं. अगर कोई चावल उस इलाके के बाहर उगाया जाता है, तो उसे “बासमती” नाम से बेचना मुश्किल हो जाता है.
अभी तक मध्य प्रदेश को बासमती उगाने वाले GI क्षेत्र में शामिल नहीं किया गया है. साल 2016 में सरकार ने कुछ राज्यों को ही बासमती के लिए मान्यता दी थी, जैसे पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड. मध्य प्रदेश इसमें शामिल नहीं था. इसलिए यहां उगाए गए चावल को आधिकारिक रूप से बासमती नहीं माना जाता.
अब सवाल उठता है कि जब GI टैग नहीं है, तो चावल विदेश कैसे जा रहा है? दरअसल, कुछ किसान बासमती जैसी किस्म उगाते हैं और उसे दूसरे तरीकों से बेचते हैं. मुख्यमंत्री का कहना है कि रायसेन का चावल विदेशों तक पहुंच रहा है, लेकिन यह मुद्दा अभी पूरी तरह साफ नहीं है और इस पर विवाद भी चल रहा है.
मध्य प्रदेश सरकार लंबे समय से कोशिश कर रही है कि उसे भी GI टैग में शामिल किया जाए. इस मामले को लेकर कोर्ट में केस चल रहा है. पहले हाईकोर्ट में मामला गया, फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. अब यह मामला फिर से सुनवाई के लिए लंबित है. सरकार का कहना है कि वह किसानों के हक के लिए लगातार प्रयास कर रही है.
इस मुद्दे पर राजनीति भी हो रही है. कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा है कि अगर किसानों को GI टैग का फायदा नहीं मिला, तो वे भूख हड़ताल करेंगे. उन्होंने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर भी यह मांग की है. इससे यह साफ है कि यह सिर्फ खेती का नहीं, बल्कि बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी बन गया है.
सिर्फ मध्य प्रदेश ही नहीं, राजस्थान के कुछ इलाके भी बासमती GI में शामिल होना चाहते थे. लेकिन उनका मामला आगे नहीं बढ़ पाया. इससे पता चलता है कि बासमती GI का मुद्दा कई राज्यों के लिए महत्वपूर्ण है.
भारत दुनिया में बासमती चावल का बड़ा निर्यातक है. साल 2025-26 में फरवरी तक करीब 6 मिलियन टन बासमती चावल विदेशों में भेजा गया. इसकी कीमत लगभग 46 हजार करोड़ रुपये रही. इससे साफ है कि बासमती चावल भारत के लिए बहुत बड़ा व्यापार है.
मध्य प्रदेश का बासमती चावल विदेशों में पहुंच रहा है, यह किसानों के लिए अच्छी खबर है. लेकिन GI टैग न मिलने से अभी भी कई दिक्कतें हैं. अगर राज्य को GI टैग मिल जाता है, तो किसानों को ज्यादा फायदा होगा और उनका चावल सही पहचान के साथ दुनिया में बिकेगा. अब सबकी नजर कोर्ट के फैसले पर है, जिससे किसानों का भविष्य तय होगा.
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