राजस्‍थान में 'सुंदर' पहाड़ बना अन्‍नदाताओं की मुसीबत, किसान बाेले- घटकर आधी रह गई उपज

राजस्‍थान में 'सुंदर' पहाड़ बना अन्‍नदाताओं की मुसीबत, किसान बाेले- घटकर आधी रह गई उपज

Kishangarh Marble Site: राजस्थान के किशनगढ़ में मार्बल वेस्ट से बना सफेद डंपिंग साइट पर्यटन का आकर्षण बन गया है, लेकिन आसपास के गांवों के किसानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं. खेतों पर जमा मार्बल धूल से मिट्टी की उर्वरता घट रही है और फसलों की पैदावार आधी तक गिरने की बात सामने आ रही है.

Kishangarh Marble Dumping SiteKishangarh Marble Dumping Site
क‍िसान तक
  • Noida,
  • Apr 01, 2026,
  • Updated Apr 01, 2026, 3:30 PM IST

राजस्थान के किशनगढ़ की पहचान कभी मार्बल इंडस्ट्री और बनी-ठनी पेंटिंग्स के लिए होती थी, लेकिन अब यह इलाका एक अनोखे टूरिस्ट स्पॉट के रूप में तेजी से उभरा है. यहां मौजूद विशाल सफेद मार्बल वेस्ट डंपिंग साइट दूर से बर्फीले पहाड़ जैसी दिखती है, जिसके चलते हर दिन हजारों सैलानी यहां पहुंच रहे हैं. इस चमक-दमक के पीछे आसपास के गांवों के किसान गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं. किशनगढ़ के पास स्थित यह डंपिंग यार्ड एशिया का सबसे बड़ा मार्बल वेस्ट साइट माना जाता है. यहां रोजाना बड़ी मात्रा में मार्बल स्लरी डाली जाती है, जो सूखकर बारीक धूल में बदल जाती है.

यही धूल हवा के साथ उड़कर आसपास के खेतों में फैल रही है. टोकड़ा, भोजियावास, रहीमपुरा, फलोदा, मोहनपुरा और काली डूंगरी जैसे गांवों के किसानों ने कहा कि उनके खेतों पर सफेद परत जमने लगी है, जिससे फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों प्रभावित हो रहे हैं.

उपज में गिरावट और बढ़ती परेशानी

स्थानीय किसानों ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में उनकी फसल की पैदावार में भारी गिरावट आई है. गेहूं, जौ, सरसों और चना जैसी प्रमुख फसलें पहले की तुलना में काफी कम उत्पादन दे रही हैं. कुछ किसानों का दावा है कि उनकी उपज आधी रह गई है. लगातार जमा हो रही मार्बल की धूल मिट्टी की उर्वरता को कमजोर कर रही है और सिंचाई के पानी को भी प्रभावित कर रही है.

खेती छोड़ने को मजबूर किसान

सबसे ज्यादा असर उन किसानों पर पड़ा है जिनकी जमीन डंपिंग साइट के करीब है. कई मामलों में मार्बल स्लरी सीधे खेतों में पहुंचकर मोटी परत बना चुकी है, जिससे जमीन खेती के लायक नहीं बची. कुछ किसानों को मजबूरी में खेती छोड़कर दूसरा काम करना पड़ा है. वहीं, धूल के कारण सांस और एलर्जी जैसी स्वास्थ्य समस्याएं भी बढ़ रही हैं.

पर्यावरण और स्वास्थ्य पर खतरा

विशेषज्ञों के अनुसार, मार्बल स्लरी केवल मिट्टी की उर्वरता ही नहीं घटाती, बल्कि जल स्रोतों को भी दूषित करती है. भूजल में घुलनशील ठोस पदार्थों का स्तर सुरक्षित सीमा से कई गुना ज्यादा पाया गया है. साथ ही, हवा में उड़ती महीन धूल आसपास के लोगों के लिए सांस संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ा रही है. यह इलाका अब प्रदूषण के हॉटस्पॉट के रूप में भी चिन्हित किया जा रहा है.

प्रबंधन पर उठ रहे सवाल

पर्यावरणविदों का कहना है कि इस डंपिंग यार्ड में जरूरी सुरक्षा इंतजामों की कमी है. न तो धूल को नियंत्रित करने के पर्याप्त उपाय हैं और न ही भूजल की सुरक्षा के लिए कोई ठोस सिस्टम. इस मामले में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) तक शिकायत पहुंच चुकी है, जिसने जांच के लिए समिति भी गठित की है.

मार्बल एसोसिएशन ने खारिज किए आरोप

वहीं, किशनगढ़ मार्बल एसोसिएशन ने इन आरोपों को नकारा है. एसोसिएशन ने कहा कि डंपिंग साइट के चारों ओर घनी हरियाली विकसित की गई है, जो धूल को बाहर जाने से रोकती है. यह साइट सुरक्षित तरीके से संचालित हो रही है और खेती पर इसका कोई असर नहीं पड़ रहा है.

किशनगढ़ का यह मार्बल डंपिंग यार्ड आज पर्यटन का बड़ा केंद्र बन चुका है, जहां हजारों लोग फोटो और वीडियो बनाने पहुंचते हैं. लेकिन इसी के साथ यह सवाल भी गहरा रहा है कि क्या पर्यटन की यह सफलता आसपास के किसानों और पर्यावरण की कीमत पर हासिल की जा रही है? (पीटीआई)

MORE NEWS

Read more!