
दक्षिण भारत में मॉनसून की बारिश शुरू होते ही नदियों और जलाशयों का जलस्तर तेजी से बदलने लगता है. कर्नाटक के कबिनी और कृष्ण राजा सागर (KRS) जलाशय भी इसी प्राकृतिक जल चक्र का अहम हिस्सा हैं. अक्सर देखा जाता है कि भारी बारिश के बाद दोनों जलाशयों में पानी का स्तर एक साथ बढ़ने लगता है. इसके पीछे सिर्फ बारिश ही नहीं, बल्कि कावेरी नदी और उसकी कई सहायक नदियों का पूरा नेटवर्क काम करता है. केरल के वायनाड से निकलने वाली कबिनी नदी से लेकर कर्नाटक की कावेरी नदी तक, कई नदियां मिलकर इन जलाशयों को भरती हैं. आइए आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर मॉनसून की बारिश का पानी कबिनी और KRS तक कैसे पहुंचता है, दोनों जलाशयों का आपस में क्या संबंध है और क्यों भारी बारिश के दौरान इनका जलस्तर तेजी से बढ़ जाता है.
कावेरी नदी दक्षिण भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदियों में से एक है. इसका उद्गम कर्नाटक के कोडागु जिले की ब्रह्मगिरी पहाड़ियों में स्थित तलाकावेरी से होता है. यहां से निकलने के बाद कावेरी नदी कर्नाटक के कई इलाकों से होकर बहती है और आगे तमिलनाडु में प्रवेश करती है. अंत में यह बंगाल की खाड़ी में जाकर मिल जाती है.
कावेरी नदी अपने सफर के दौरान कई छोटी-बड़ी नदियों और जलधाराओं का पानी अपने साथ जोड़ती है. यही सहायक नदियां आगे चलकर कावेरी नदी के जलस्तर को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं.
कबिनी जलाशय कर्नाटक के मैसूर जिले में बीचनहल्ली के पास कबिनी नदी पर बनाया गया है. कबिनी नदी का जन्म केरल के वायनाड की पहाड़ियों में होता है. पश्चिमी घाट के जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों से निकलने वाली कई छोटी धाराएं मिलकर कबिनी नदी का निर्माण करती हैं.
केरल में बहने वाली पनामरम नदी और मानंतवाडी नदी जैसी सहायक नदियां कबिनी नदी में पानी पहुंचाती हैं. भारी मॉनसून बारिश के दौरान वायनाड क्षेत्र में तेज बारिश होने से कबिनी नदी में पानी की आवक अचानक बढ़ जाती है. यही पानी आगे चलकर कबिनी बांध में जमा होता है.
कृष्ण राजा सागर बांध यानी KRS बांध मुख्य कावेरी नदी पर बनाया गया है. इस जलाशय में केवल कावेरी नदी का ही नहीं, बल्कि कई सहायक नदियों का पानी भी पहुंचता है.
कावेरी नदी में रास्ते में कई प्रमुख नदियां आकर मिलती हैं, जिनमें हरंगी नदी, हेमावती नदी और लक्ष्मण तीर्थ नदी शामिल हैं. इसके अलावा कबिनी नदी भी आगे चलकर कावेरी नदी में मिलती है. जब कबिनी बांध से पानी छोड़ा जाता है, तो यह पानी तिरुमकुदालु नरसिपुरा के पास कावेरी नदी में शामिल हो जाता है और आगे KRS जलाशय तक पहुंचता है.
मॉनसून के दौरान कर्नाटक और केरल के पश्चिमी घाट क्षेत्रों में होने वाली भारी बारिश इन जलाशयों के लिए सबसे बड़ा जल स्रोत बनती है. वायनाड में तेज बारिश होने से कबिनी नदी में तेजी से पानी बढ़ता है और कबिनी जलाशय भरने लगता है.
वहीं, कोडागु, हासन और आसपास के क्षेत्रों में होने वाली बारिश से कावेरी, हरंगी और हेमावती नदियों में पानी बढ़ता है. जब कबिनी जलाशय से पानी छोड़ा जाता है, तो यह कावेरी नदी में मिलकर KRS जलाशय में पानी की आवक को और बढ़ा देता है.
इस तरह कबिनी और KRS जलाशय एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और दोनों का जलस्तर कई नदियों और बारिश पर निर्भर करता है.
कबिनी और KRS जलाशयों से छोड़ा गया पानी आगे कावेरी नदी के रास्ते तमिलनाडु की ओर जाता है. कावेरी नदी का पानी दोनों राज्यों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच कावेरी जल बंटवारे की व्यवस्था के तहत नदी के पानी का उपयोग किया जाता है.
भारी बारिश के समय जलाशयों में तेजी से पानी भरने लगता है. ऐसे में बांधों की सुरक्षा और निचले इलाकों में बाढ़ के खतरे को देखते हुए प्रशासन जलस्तर पर लगातार नजर रखता है. जरूरत पड़ने पर बांधों से नियंत्रित मात्रा में पानी छोड़ा जाता है, ताकि जलाशयों की सुरक्षा बनी रहे और अचानक बाढ़ की स्थिति न बने.
कुल मिलाकर, कबिनी और KRS जलाशयों में पानी बढ़ना केवल एक नदी या एक क्षेत्र की बारिश पर निर्भर नहीं करता, बल्कि पश्चिमी घाट, सहायक नदियों और पूरे कावेरी नदी तंत्र की संयुक्त भूमिका होती है. मॉनसून के दौरान यही प्राकृतिक जल प्रणाली दक्षिण भारत के बड़े हिस्से की जल जरूरतों को पूरा करने में मदद करती है.
ये भी पढ़ें:
Sawan Shivratri 2026: क्यों चढ़ाया जाता है शिवलिंग पर जल? जानें जलाभिषेक और व्रत का रहस्य
E20 पेट्रोल पर बहस के बीच पंजाब के किसानों की चिंता, बोले- नीति बदली तो मक्का और गन्ना उत्पादकों को होगा नुकसान