ईरान युद्ध का असर: देश में सरसों तेल की बढ़ी मांग, अलवर बना देश का सप्लाई हब

ईरान युद्ध का असर: देश में सरसों तेल की बढ़ी मांग, अलवर बना देश का सप्लाई हब

ईरान में जारी युद्ध का असर अब भारत के खाद्य तेल बाजार पर साफ दिखने लगा है. पाम और सोयाबीन तेल के आयात में कमी के चलते सरसों तेल की मांग तेजी से बढ़ रही है, जिससे इसके दाम में उछाल आया है. राजस्थान, खासकर अलवर, देश का प्रमुख सरसों तेल सप्लाई हब बनकर उभरा है, जहां से पूरे देश में आपूर्ति हो रही है. बढ़ती कीमतों से किसानों को फायदा हो रहा है, लेकिन लंबे समय तक हालात बने रहने पर आम उपभोक्ताओं पर महंगाई का दबाव बढ़ सकता है.

हिमांशु शर्मा
  • Alwar,
  • Mar 25, 2026,
  • Updated Mar 25, 2026, 1:54 PM IST

पश्चिम एशिया के देशों में चल रहे युद्ध का असर अब सरसों के तेल पर भी नजर आने लगा है. विदेश से आने वाले सोयाबीन और पाम आयल सहित अन्य सभी तरह के तेल की सप्लाई पूरी तरह से बंद है. ऐसे में बाजार में सरसों के तेल की डिमांड तेजी से बढ़ रही है. इसलिए उसके भाव में भी बढ़ोतरी हो रही है. देश के सरसों उत्पादन में अकेला 50 प्रतिशत उत्पादन राजस्थान करता है. राजस्थान में भी सबसे ज्यादा उत्पादन अलवर, भरतपुर, झुंझुनू, सीकर, करौली, दौसा के क्षेत्रों में होता है. सबसे ज्यादा सरसों के तेल की मिल अलवर में है और अलवर से पूरे देश में तेल सप्लाई होती है. युद्ध के कारण सरसों के भाव बढ़ रहे हैं. इससे किसानों को तो राहत मिल रही है, लेकिन आने वाले समय में अगर यही हालात रहे तो बाजार में सरसों का तेल कम मिलेगा और इसके भाव कई गुना बढ़ जाएंगे.

राजस्थान में रबी की फसलों में सर्वाधिक बोई जाने वाली फसल सरसों की हालत यह है कि किसान अपने खेतों से सीधा मंडी तक ले जा रहे हैं क्योंकि खाड़ी देशों से आने वाले तेल का आयात ना के बराबर हो रहा है. इसलिए सरसों के तेल की मांग लगातार बनी हुई है. किसानों को सरसों के भाव अच्छे मिलने से वो काफी खुश नजर आ रहे हैं. इस वक्त समर्थन मूल्य पर ही सरसों 6200 प्रति क्विंटल के भाव बिक रही है जबकि खुले में भाव इससे ज्यादा है. इस बार पैदावार भी बहुत अच्छी है.

पाम, सोयाबीन तेल की सप्लाई रुकी

राजस्थान खाद्य पदार्थ संघ के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष सुरेश चंद्र अग्रवाल (जलालपुरिया) ने बताया कि पश्चिम एशिया के देशों में चल रहे युद्ध के कारण वहां से तेल का आयात नहीं होने से किसानों की सरसों महंगे दामों में बिक रही है. तेल मिलों को भी इसका फायदा मिल रहा है क्योंकि भारत में ही सबसे ज्यादा सरसों के तेल की खपत है. ऐसे में किसानों और व्यापारियों को काफी फायदा हो रहा है. इस बार अलवर और भरतपुर जिले में सरसों की पैदावार भी अच्छी हुई है.

पैदावार के साथ-साथ इस बार सरसों उत्तम क्वालिटी की है जिसमें तेल की मात्रा भी ज्यादा हुई है. औसतन 40 फीसदी तेल निकलता है लेकिन इस बार 42-43 फीसदी तेल निकल रहा है. मतलब 100 किलो में 43 किलो तेल. किसानों को इसका सीधा फायदा मिल रहा है. लगातार सरसों की आवक कृषि उपज मंडी में लगातार हो रही है. 35 से 40 हजार कट्टे प्रतिदिन सरसों आ रही है.

उन्होंने बताया कि मलेशिया से पाम आता है और अमेरिका से सोयाबीन रिफाइंड आता है. तेल की मांग की पूर्ति इसी से होती थी क्योंकि भारत का तेल खाद्यान्न उद्योग 55 फीसदी विदेश पर निर्भर है. इस वक्त सरसों, पाम और सोयाबीन के भाव बराबर होने से मिलावट के आसार नहीं हैं क्योंकि भाव में अंतर होने के कारण सरसों के तेल में अन्य तेलों के मिलावट होने की संभावना रहती है. खाद्यान्न तेल के मिलावट पर सरकार की भी कोई रोक नहीं है इसलिए बाजार में वह आसानी से बिक जाता है. लेकिन बाहर से तेल नहीं आने से इस बार भारत में सरसों के तेल की जबरदस्त मांग बनी हुई है. किसान भी इसी कारण अपनी सरसों को लगातार बेच रहे हैं क्योंकि भाव 6800 रुपये तक पहुंच गए हैं. किसानों का यह मानना है कि अगर खाड़ी देशों से तेल आयात हो गया तो निश्चित रूप से तेल की सरसों की डिमांड इतनी नहीं रहेगी और भाव कम जा सकते हैं.

उत्पादन में कमी, लेकिन तेल की मात्रा बढ़ी

बीते साल देश में सरसों का उत्पादन 117 लाख टन था. इस बार 111 लाख टन होने की उम्मीद है, लेकिन इस बार सरसों में दो फीसदी अधिक तेल निकलने का अनुमान है जिससे उत्पादन में कमी की भरपाई हो सकेगी. सुरेश चंद्र अग्रवाल ने कहा कि अगर खाड़ी देशों का युद्ध थोड़ा लंबा चला तो भारत में सरसों के भाव बढ़ सकते हैं. अभी तो जमाखोरी के कोई उम्मीद नहीं है क्योंकि सरकार की ओर से काफी पाबंदी है. वायदा व्यापार पर 2 साल से रोक है जिससे सरसों के कारोबार में सटोरियों का सिस्टम बंद है. उन्होंने बताया कि विदेशी तेल भारत में आने से हमेशा 10 लाख टन सरसों का स्टॉक रहता था, लेकिन युद्ध के चलते 10 लाख टन का स्टॉक खत्म होने की भी आसार हैं. उन्होंने बताया कि डॉलर में तेजी होने के कारण भी विदेशी तेल इस वक्त महंगा आ रहा है. युद्ध लंबा खींचने से आम जनता को इसका नुकसान हो सकता है.

सरकार लगातार सरसों पर एमएसपी बढ़ाती जा रही है. इसके पीछे सबसे मुख्य कारण यह है कि किसानों को प्रोत्साहन मिले और वे तिलहन का रकबा बढ़ाएं. अलवर से सरसों के तेल की सबसे ज्यादा खपत बंगाल, असम और बिहार में होती है. अलवर अभी सरसों तेल उत्पादन का सबसे बड़ा हब बना हुआ है. अलवर में 7 बड़े सॉल्वेंट प्लांट लगे हुए हैं, जबकि करीब 80 मिलें लगी हुई हैं जो सरसों तेल के लिए काम कर रही हैं.

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