
देश की खेती अब एक नए मोड़ पर खड़ी है, जहां रासायनिक खादों से हो रहे नुकसान के बीच किसान प्राकृतिक विकल्पों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं. इसी बदलाव के बीच एक छोटा सा जीव, 'ब्लू-ग्रीन एल्गी' खेती से लेकर थाली तक अपनी खास पहचान बना रहा है. जहां एक तरफ यह मिट्टी की सेहत सुधार कर फसलों को ताकत दे रहा है, वहीं दूसरी तरफ इसकी खास किस्म स्पिरुलिना सुपरफूड बनकर बिस्किट, चॉकलेट और पास्ता जैसे खाद्य उत्पादों में शामिल हो रही है. पोषण से भरपूर यह विकल्प अब कुपोषण से लड़ाई में भी अहम भूमिका निभाने लगा है. भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पुसा) के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. सुनील पब्बी ने इसके बारे में यह दिलचस्प जानकारी 'किसान तक' के पॉडकास्ट अन्नगाथा (Annagatha) में दी.
पूर्व वैज्ञानिक डॉ. सुनील पब्बी के मुताबिक, यह एक तरह का सूक्ष्म जीव है जो खेती में काफी फायदेमंद साबित हो सकता है. डॉ. पब्बी ने बताया कि ब्लू-ग्रीन एल्गी हवा में मौजूद नाइट्रोजन को पौधों के लिए उपयोगी बना देता है. यह “प्राकृतिक खाद” की तरह काम करता है. इससे किसानों को यूरिया जैसी रासायनिक खाद पर कम निर्भर रहना पड़ता है. उन्होंने बताया कि धान की खेती में इसका इस्तेमाल सबसे ज्यादा फायदेमंद होता है. अगर किसान इसे एक बार खेत में डाल दें, तो यह पूरी फसल के दौरान काम करता रहता है और करीब 25–30 किलो तक नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर दे सकता है. इससे एक बोरी तक यूरिया की बचत हो सकती है.
खेती के अलावा इसका इस्तेमाल खाने-पीने की चीजों में भी हो रहा है. इसकी एक खास किस्म Spirulina को “सुपरफूड” माना जाता है. इसमें 60 से 70 प्रतिशत तक प्रोटीन होता है और यह शरीर के लिए जरूरी सभी अमीनो एसिड, विटामिन और आयरन देता है. पूसा के वैज्ञानिकों ने स्पिरुलिना से बिस्किट, चॉकलेट और पास्ता जैसे उत्पाद भी तैयार किए हैं, जो खासकर बच्चों में कुपोषण दूर करने में मदद कर सकते हैं.
डॉ. पब्बी के अनुसार, यह सिर्फ पौधों को पोषण ही नहीं देता, बल्कि मिट्टी की सेहत भी सुधारता है. यह मिट्टी में कार्बनिक तत्व बढ़ाता है, जिससे जमीन की उर्वरता और पानी रोकने की क्षमता काफी बेहतर होती है. यही वजह है कि अब इसे जैव उर्वरक यानी बायो-फर्टिलाइजर के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है. उन्होंने यह भी बताया कि खेती में पहले से ही कुछ अच्छे जीवाणु इस्तेमाल होते रहे हैं, जैसे राइजोबियम और एजोटोबैक्टर, जो अलग-अलग फसलों में नाइट्रोजन उपलब्ध कराते हैं. ब्लू-ग्रीन एल्गी भी इसी तरह काम करता है, खासकर धान के खेतों में.
डॉ. पब्बी ने यह भी बताया कि ब्लू-ग्रीन एल्गी से प्राकृतिक रंग भी निकाले जा रहे हैं, जिनका इस्तेमाल खाने-पीने की चीजों और कॉस्मेटिक उत्पादों में किया जा सकता है. इससे हानिकारक केमिकल रंगों की जरूरत कम होगी. हालांकि, उन्होंने सावधान करते हुए कहा कि हर तरह की काई (एल्गी) फायदेमंद नहीं होती. कुछ प्रजातियां जैसे Microcystis जहरीली भी होती हैं, इसलिए सही पहचान और वैज्ञानिक सलाह जरूरी है. उन्होंने कहा कि ऐसे में ब्लू-ग्रीन एल्गी किसानों के लिए एक सस्ता, प्राकृतिक और असरदार विकल्प बनकर उभर रहा है. अगर इसका सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए, तो यह खेती की लागत कम करने के साथ-साथ मिट्टी और इंसानों दोनों की सेहत सुधारने में अहम भूमिका निभा सकता है.