प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को संसद में कहा कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण भारत को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. उन्होंने खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों पर इसके प्रभाव के साथ-साथ इस संकट के व्यापारिक और आर्थिक परिणामों पर भी प्रकाश डाला. आइए उनके संबोधन की खास बातें पढ़ लेते हैं.
संसद में पीएम मोदी की बड़ी बातें
- भारत के सामने भी इस युद्ध ने अप्रत्याशित चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. ये चुनौतियां आर्थिक भी हैं, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी भी है और मानवीय भी हैं. युद्धरत और युद्ध से प्रभावित देशों के साथ भारत के व्यापक व्यापारिक रिश्ते हैं. जिस क्षेत्र में ये युद्ध हो रहा है, वह दुनिया के दूसरे देशों के साथ हमारे व्यापार का भी एक महत्वपूर्ण रास्ता है. विशेष रूप से कच्चे तेल और गैस की हमारी जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा यही क्षेत्र पूरा करता है.
- हमारे मिशन नियमित रूप से एडवाइजरी जारी कर रहे हैं. यहां भारत में और अन्य प्रभावित देशों में 24x7 कंट्रोल रूप और आपातकालीन हेल्पलाइन स्थापित की गई हैं. इनके माध्यम से सभी प्रभावितों को त्वरित जानकारी दी जा रही है. संकट की इस स्थिति में देश-विदेश में भारतीयों की सुरक्षा हमारी बहुत बड़ी प्राथमिकता रही है. युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक 3 लाख, 75 हजार से अधिक भारतीय सुरक्षित भारत पहुंच चुके हैं.
- सरकार संवेदनशील भी है, सतर्क भी है और हर सहायता के लिए तत्पर भी है. भारत में बड़ी मात्रा में कच्चा तेल, गैस और फर्टिलाइजर जैसी अनेक जरूरी चीजें हॉर्मुज स्ट्रेट के रास्ते से आती हैं. युद्ध के बाद से ही हॉर्मुज स्ट्रेट से जहाजों का आना जाना बहुत चुनौतीपूर्ण हो गया है. इसके बावजूद हमारी सरकार का प्रयास रहा है कि पेट्रोल, डीजल और गैस की सप्लाई बहुत ज्यादा प्रभावित न हो... इस पर हमारा फोकस रहा है.
- बीते दशक में भारत ने संकट के ऐसे ही समय के लिए कच्चे तेल के भंडारण को भी प्राथमिकता दी है. आज भारत के पास 53 लाख मीट्रिक टन से अधिक का स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व है और 65 लाख मीट्रिक टन से अधिक के रिजर्व की व्यवस्था पर देश काम कर रहा है. बीते 11 वर्षों में हमारी रिफाइनरी कैपेसिटी में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. सरकार अलग अलग देशों के सप्लायर्स के साथ भी लगातार संपर्क में है.
- बीते दिनों हॉर्मुज स्ट्रेट में फंसे हमारे कई जहाज भारत आए भी हैं. संकट के इस समय में देश की एक और तैयारी भी है, जो बहुत काम आ रही है. पिछले 11 साल में इथेनॉल के उत्पादन और उसकी ब्रॉन्डिग पर अभूतपूर्व काम हुआ है. एक दशक पहले तक देश में सिर्फ एक से डेढ़ प्रतिशत इथेनॉल बैंडिंग कैपसिटी थी. आज हम पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल बैंडिंग के करीब पहुंच रहे हैं. इसके कारण प्रति वर्ष करीब साढ़े 4 करोड़ बैरल कम ऑयल इम्पोर्ट करना पड़ रहा है.
- एक बड़ा सवाल ये है कि युद्ध का खेती पर क्या प्रभाव होगा. देश के किसानों ने हमारे अन्न के भंडार भर रखे हैं, इसलिए भारत के पास पर्याप्त खाद्यान्न है. हमारा ये भी प्रयास है कि खरीफ सीजन की ठीक से बुआई हो सके. सरकार ने बीते सालों में आपात स्थिति से निपटने के लिए खाद की पर्याप्त व्यवस्था भी की है.
- युद्ध का एक बहुत बड़ा चैलेंज ये भी है कि भारत में गर्मी का मौसम शुरू हो रहा है. आने वाले समय में बढ़ती गर्मी के साथ बिजली की डिमांड बढ़ती जाएगी. फिलहाल देश के सभी पावर प्लांट्स में कोल स्टॉक उपलब्ध है. भारत ने लगातार दूसरे साल 100 करोड़ टन कोयला उत्पादन करने का रिकॉर्ड बनाया है. पावर जेनेरेशन से लेकर पावर सप्लाई तक की हमारे सभी सिस्टम की निरंतर मॉनिटरिंग भी की जा रही है.
- भारत की भूमिका स्पष्ट है. शुरुआत से ही हमने इस संघर्ष को लेकर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की है. मैंने स्वयं भी पश्चिम एशिया के सभी संबंधित नेताओं से बात की है. मैंने सभी से इस तनाव को कम करने और इस संघर्ष को खत्म करने का आग्रह किया है. भारत ने नागरिकों, एनर्जी और ट्रांसपोर्ट से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों का विरोध किया है. भारत हमेशा से मानवता के हित में और शांति के पक्ष में अपनी आवाज उठाता रहा है. बातचीत और कूटनीति ही इस समस्या का समाधान है.
- भारत के सामने भी इस युद्ध ने अप्रत्याशित चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. ये चुनौतियां आर्थिक भी हैं, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी भी हैं और मानवीय भी हैं. युद्धरत और युद्ध से प्रभावित देशों के साथ भारत के व्यापक व्यापारिक रिश्ते हैं. जिस क्षेत्र में ये युद्ध हो रहा है, वह दुनिया के दूसरे देशों के साथ, हमारे व्यापार का भी एक महत्वपूर्ण रास्ता है. विशेष रूप से कच्चे तेल और गैस की हमारी जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा यही क्षेत्र पूरा करता है. इसलिए आवश्यक है भारत की संसद से इस संकट को लेकर एकमत और एकजुट आवाज दुनिया में जाए.