ईरान युद्ध का असर: काबुली चना एक्सपोर्ट पर संकट, खाड़ी देशों में भारत का व्यापार खतरे में

ईरान युद्ध का असर: काबुली चना एक्सपोर्ट पर संकट, खाड़ी देशों में भारत का व्यापार खतरे में

ईरान और खाड़ी क्षेत्र में युद्ध का असर भारत के काबुली चना एक्सपोर्ट पर पड़ सकता है. ईरान, अरब और तुर्किए भारत के बड़े खरीदार हैं और लंबे संघर्ष से व्यापारियों और किसानों को नुकसान होने की आशंका है.

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रवि कांत सिंह
  • New Delhi ,
  • Mar 09, 2026,
  • Updated Mar 09, 2026, 4:06 PM IST

भारत का काबुली चना खाड़ी देशों में सबसे अधिक एक्सपोर्ट होता है. पिछले दो साल में इसका एक्सपोर्ट दोगुना हुआ है जिसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी ईरान, अरब और तुर्किए की है. भारत के इस एक्सपोर्ट पर अभी ग्रहण लग गया है क्योंकि सभी बड़े खरीदार जंग के मैदान में हैं. प्याज, बासमती चावल, अंगूर और केले से भी बड़ा खतरा काबुली चना झेल रहा है. देसी चना का भी यही हाल है. रमजान के महीने में ईरानी थाली की शोभा बढ़ाने वाला काबुली चना आज पूरे खाड़ी क्षेत्र में अमन चैन की दुआ मांग रहा है. जानकारों की मानें तो खाड़ी की लड़ाई जल्द नहीं रुकी तो व्यापारियों के साथ किसान भी प्रभावित होंगे.

काबुली चना जिसे आम बोलचाल में सफेद छोले कहते हैं, वैसे तो पूरी दुनिया के किचन में स्थान रखता है, लेकिन खाड़ी देशों की दिलचस्पी कुछ ज्यादा है. खाड़ी देशों के वेज या नॉन वेज, हर तरह की डिश में छोले का इस्तेमाल होता है. उसमें भी भारत का काबुली चना सबसे अधिक मांग रखता है क्योंकि इसका साइज खाने के स्वाद को और बढ़ा देता है. छोले भटूरे और छोले कुल्चे भले ही भारत में मशहूर हैं, लेकिन इससे मिलते जुलते कई व्यंजन खाड़ी देशों, खासकर ईरान में बनाए और सर्व किए जाते हैं. भारत इस जरूरत को पिछले कई साल से पूरा करता आ रहा है.

लड़ाई में पिसा काबुली चना

यही वजह है कि भारत ईरान में काबुली चना का सबसे बड़ा एक्सपोर्टर है, जो तुर्की और यूएई के साथ इस कमोडिटी के लिए पसंदीदा देशों में से एक बना हुआ है. इसका एक्सपोर्ट ज्यादातर कांडला, जेएनपीटी और मुंद्रा जैसे पोर्ट से होता है. इसमें सबसे अधिक मांग HS कोड 07132000 की है जो अपने आकार और चमक के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है. काबुली चना के बड़े सप्लायरों की बात करें तो इसमें मध्य प्रदेश अव्वल है, जहां के 7-8 एमएम और 8-9 एमएम साइज वाले चने की डिमांड अधिक है. वैसे तो एक्सपोर्ट पूरे साल होता है, लेकिन पीक एक्टिविटी अक्सर नई फसल आने के साथ होती है.

यह समस्या केवल हालिया युद्ध की वजह से नहीं है बल्कि इजरायल और हमास की पुरानी लड़ाई ने भी भारत के निर्यात को प्रभावित किया है. ईरान में मौजूदा हालात भयावह इसलिए बने हैं क्योंकि खाड़ी का लगभग हर देश किसी न किसी लड़ाई से जूझ रहा है. अमेरिका और इजरायल के ताजा हमले से हालात और बिगड़ गए हैं. यही वजह है कि ईरान को अलग-अलग खेती और खाने की चीजों के भारतीय एक्सपोर्ट में रुकावट आ रही है, पेमेंट की भी दिक्कतें बढ़ने लगी हैं. 

ईरान सबसे बड़ा खरीदार

ईरान भारत के सफेद छोले के अलावा बासमती चावल के बड़े खरीदारों में से एक है. भारतीय एक्सपोर्टर्स को चिंता है कि अगर यह लड़ाई लंबे समय तक जारी रही, तो इससे चावल के निर्यात की रफ्तार धीमी हो सकती है और पेमेंट में देरी हो सकती है. इसका असर दिखना शुरू हो गया है. विशेषज्ञ बताते हैं कि ईरान के साथ व्यापार में कोई भी रुकावट गंभीर चुनौतियां खड़ी कर सकती है. ईरान लंबे समय से सऊदी अरब, इराक और संयुक्त अरब अमीरात के साथ भारतीय बासमती चावल का एक बड़ा बाजार रहा है. एक्सपोर्टर्स ने चेतावनी दी है कि अगर लड़ाई लंबी या तेज होती है, तो ईरान को चावल और छोले जैसे कृषि प्रोडक्ट भेजने और पेमेंट लेने में मुश्किलें हो सकती हैं.

एक डेटा के मुताबिक, ईरान में भारत का निर्यात तकरीबन 1.07 लाख करोड़ रुपये का है जबकि ईरान से भारत का आयात 38 लाख करोड़ रुपये से अधिक है. यह राशि इसलिए बड़ी है क्योंकि ईरान से भारत बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है. और भी कई चीजें हैं जो भारत आती हैं. ईरान को होने वाले भारतीय निर्यात में सबसे बड़ी हिस्सेदारी बासमती चावल की है जिसकी राशि लगभग 6.52 हजार करोड़ रुपये है. इसके बाद केला, सोयामील, काबुली चना और चायपत्ती का स्थान है. भारत 241 करोड़ रुपये का काबुली चना ईरान को बेचता है जिस पर अभी संकट मंडरा रहा है.

व्यापारी और किसान संकट में

मामला केवल ईरान तक सीमित नहीं है बल्कि इजरायल से आयात-निर्यात भी प्रभावित हो रहा है. भारत हर साल इजरायल को लगभग 1.82 लाख करोड़ रुपये के प्रोडक्ट का निर्यात करता है. दूसरी ओर, लगभग 1.39 लाख करोड़ रुपये का आयात इजरायल से होता है. इजरायल और हमास की जंग ने आयात और निर्यात की इस पूरी चेन को हिला दिया है. जो थोड़ी कसर बची थी ईरान की लड़ाई ने उसे पूरी कर दी. यह संकट केवल व्यापारियों का नहीं बल्कि किसान भी खतरे में हैं क्योंकि उनकी उपज कौन खरीदेगा, जब खरीदार खुद जंग की मैदान में हो.

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