
जब भी हम खेती-किसानी के बारे में सोचते हैं, तो हमारे दिमाग में अक्सर सूखा, बाढ़, कर्ज या घाटे की ही तस्वीर उभरती है. लेकिन देश के बड़े कृषि विशेषज्ञों की एक नई रिपोर्ट इस बार एक ऐसी खबर लेकर आई है, जिसे सुनकर हर भारतीय का सिर गर्व से ऊंचा हो जाएगा. आज हमारे खेत सिर्फ देश का पेट नहीं भर रहे, बल्कि तरक्की की रफ्तार में हमारी खेती ने चीन और अमेरिका जैसे बड़े और ताकतवर देशों को भी पीछे छोड़ दिया है. सच कहें तो भारतीय खेती आज अपने इतिहास के सबसे सुनहरे और मजबूत दौर में है.
देश के जाने-माने कृषि विशेषज्ञ रमेश चंद और जसपाल सिंह ने अपनी इस रिपोर्ट में खेती की इसी रफ्तार पर खुलकर बात की है. उन्होंने आंकड़ों के साथ बताया है कि साल 1950-51 के बाद से, यानी आजादी के बाद के पिछले 75 सालों में कभी भी ऐसा नहीं हुआ जब भारत में खेती लगातार 10 सालों तक 4.45 फीसदी की इतनी शानदार रफ्तार से बढ़ी हो. यह अपने आप में एक नया रिकॉर्ड है.
यह कोई एक साल का अचानक हुआ चमत्कार नहीं है, बल्कि आजादी के बाद का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है. साल 2015-16 से लेकर 2024-25 के इस पूरे दशक में भारत में खेती हर साल औसतन 4.45 फीसदी की रफ्तार से बढ़ी है. दावा है कि भारत के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ जब लगातार 10 सालों तक खेती की औसत रफ्तार ऐसी रही हो. यहां तक कि जब 1970 और 80 के दशक में देश में हरित क्रांति (Green Revolution) आई थी, तब भी खेती के बढ़ने की यह रफ्तार सिर्फ 3.56 फीसदी ही थी. यानी आज के दौर में हमारी खेती इतिहास में सबसे तेज दौड़ रही है.
इस रिपोर्ट में सबसे अच्छी और सुकून देने वाली बात यह है कि हमारी खेती अब पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो चुकी है. अब मौसम की मार या बाजारों की मंदी इसे आसानी से हिला नहीं पाती. पिछले पूरे 10 सालों में एक भी साल ऐसा नहीं आया जब खेती घाटे (यानी माइनस) में गई हो. इसे हम कोरोना काल के उदाहरण से भी समझ सकते हैं. जब उस महामारी के दौरान देश के सारे कल-कारखाने, दुकानें और दफ्तर पूरी तरह बंद थे, तब भी हमारे खेतों में किसान डटे हुए थे और काम चल रहा था. उस बेहद मुश्किल वक्त में खेती से मिली इसी मजबूती ने देश की पूरी अर्थव्यवस्था को डूबने से बचा लिया था.
सवाल यह है कि पिछले 10 सालों (2015-2024) में भारत में खेती के बढ़ने की जो 4.42 फीसदी दर रही है, वह दूसरे देशों के मुकाबले कहां ठहरती है?
साल 2015-16 से 2024-25 के पिछले पूरे दशक में भारत की कृषि विकास दर कभी भी नेगेटिव नहीं रही है तो इसकी कुछ वजहें भी है. किसान अब सिर्फ पारंपरिक फसलों यानी गेहूं और धान पर निर्भर नहीं हैं. वे समझदारी से अपनी आय के स्रोत बदल रहे हैं. पशुधन की विकास दर 7.1 और मत्स्य पालन की 8.8 फीसदी है.
इन दोनों गतिविधियों ने खेती को एक मजबूत सुरक्षा कवच दे दिया है. यदि किसी वर्ष सूखा पड़ने से फसलें खराब भी हो जाएं, तो भी डेयरी और मत्स्य पालन जैसे क्षेत्र पूरी कृषि विकास दर को शून्य से नीचे गिरने से बचा लेते हैं. सरकार ने डेयरी और मछली पालन से जुड़ी कई योजनाएं चलाई हैं जिससे इस क्षेत्र की तरफ लोगों का रुझान बढ़ रहा है.
अब हमारे किसानों की सोच में एक बड़ा बदलाव आ रहा है. वे अब सिर्फ गेहूं-चावल उगाने के बजाय ज्यादा मुनाफा देने वाली चीजों की तरफ बढ़ रहे हैं. आंकड़ों में यह साफ दिख रहा है.
सबसे तेज ग्रोथ हरे चारे, घास (7.39%) और मसालों (6.72%) की खेती में देखी गई है. चारे में आई यह तेजी साफ दिखाती है कि देश में डेयरी और दूध उत्पादन का कारोबार कितनी तेजी से बढ़ रहा है. इसके बाद फल (3.68%) और दालों (3.55%) का नंबर आता है, जिन्होंने बाजार में अच्छी मांग होने की वजह से बेहतरीन प्रदर्शन किया है.
दूसरी ओर, जो हमारी मुख्य फसलें हैं यानी अनाज जैसे-गेहूं-चावल, उनके बढ़ने की रफ्तार बहुत धीमी (2.36%) रही है. यह रफ्तार खेती की कुल औसत बढ़त (2.46%) से भी कम है. इसके अलावा कपड़ा मिलों के लिए जरूरी कपास और जूट जैसी फसलों में तो गिरावट (-0.28%) दर्ज की गई है, यानी इनका उत्पादन बढ़ने के बजाय पहले से और कम हुआ है.
कुल मिलाकर, यह आंकड़ा साबित करता है कि भारतीय खेती अब सिर्फ अनाज तक सीमित नहीं रही है, बल्कि किसान अब बाजार की जरूरत के हिसाब से बागवानी, मसाले और पशुपालन से जुड़ी फसलों को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं.