
इस साल देश में कपास की बुवाई की रफ्तार गंभीर रूप से पिछड़ गई है. केंद्रीय कृषि मंत्रालय के 5 जुलाई 2026 तक के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, इस तारीख तक कपास का बुवाई रकबा पिछले साल के 82 लाख हेक्टेयर के मुकाबले गिरकर महज 63.18 लाख हेक्टेयर ही रह गया है. शुरुआती सीजन में ही करीब 19 लाख हेक्टेयर की यह भारी देरी सिर्फ मॉनसून की बेरुखी की वजह से नहीं है. इसके पीछे असल में वो नीतियां भी जिम्मेदार हैं, जिनमें सरकार ने कपड़ा मिलों के भारी दबाव में आकर विदेशी कपास के आयात को प्राथमिकता दी और इम्पोर्ट ड्यूटी को घटाकर जीरो कर दिया. इसी नीति के कारण बाजार में घरेलू कपास के दाम बुरी तरह गिरा दिए गए, जिससे हताश होकर देश के करोड़ों किसानों ने इस बार कपास की बुवाई से दूरी बना ली है. यह सीधे तौर पर एक नीतिगत ट्रैजडी लगता है, जिसने 'सफेद सोने' की खेती को गहरे संकट में डाल दिया है.
नीति निर्माताओं के लिए 'कमजोर मॉनसून' हमेशा से एक सुरक्षित ढाल रहा है, जिसके पीछे वे बाजार की गंदी चालों को छुपाते आए हैं. इस बार भी जून की सूखी मार को बुवाई पिछड़ने की इकलौती वजह बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश हो रही है. मगर हकीकत यह है कि किसान इस सत्र में खेत में उतरने से पहले ही मानसिक रूप से हार चुका था. जब पिछले पूरे सीजन में किसानों को अपनी खून-पसीने की फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से 500 से 1,000 प्रति क्विंटल नीचे बेचनी पड़ी तो इस बार वे कपास उगाने का भारी जोखिम क्यों उठाते? सरकार द्वारा टेक्सटाइल मिल मालिकों को फायदा पहुंचाने की इस जिद ने देश के सबसे बड़े नकदी फसल क्षेत्र की कमर तोड़कर रख दी है.
घरेलू कपास किसानों की पीठ में छुरा घोंपने का यह खेल नया नहीं है. जब-जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम गिरे या कपड़ा मिलों ने सस्ते कच्चे माल की मांग की, सरकार ने 11 फीसदी की इंपोर्ट ड्यूटी को हटाकर जीरो कर दिया.
इसी जीरो-ड्यूटी नीति का नतीजा है कि रिकॉर्ड कपास आयात हुआ है. जिसकी मार भारतीय किसानों पर पड़ी है. कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CAI) के आंकड़ों के मुताबिक, चालू सीजन के दौरान देश में करीब 43.5 लाख गांठ कपास का रिकॉर्डतोड़ आयात किया गया.
कपड़ा मिल मालिकों ने अपनी तिजोरियां भरने के लिए विदेशों से सस्ते दाम पर कपास मंगाकर स्टॉक कर लिया. नतीजा यह हुआ कि जब देश का किसान सर्दियों में अपनी फसल लेकर मंडियों में पहुंचा, तो खरीदार गायब थे. इस रिकॉर्ड आयात की वजह से देश में पुराना बचा हुआ स्टॉक लगभग 42 फीसदी बढ़कर करीब 85 लाख गांठ तक पहुंचने का अनुमान है व्यापारी इसी भारी स्टॉक का डर दिखाकर नई फसल के दाम भी गिराने की बिसात बिछा चुके हैं, जिससे डरकर किसानों ने कपास की बुवाई से ही दूरी बना ली है.
दामों की इस मार के बीच, रही-सही कसर प्राकृतिक और तकनीकी विफलताओं ने पूरी कर दी. जिस बीटी कॉटन को कभी वरदान बताया गया था, वह पिछले एक दशक में गुलाबी सुंडी (Pink Bollworm) के सामने पूरी तरह सरेंडर कर चुका है. उत्तर भारत के कपास बेल्ट, विशेषकर पंजाब और हरियाणा में इस कीट ने पिछले सालों में ऐसी तबाही मचाई कि किसानों के पास फसल बदलने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा. अकेले पंजाब में कपास का रकबा सिमटकर 1 लाख हेक्टेयर से भी नीचे आ गया है.
दुनिया के बाकी देश जैसे चीन और ऑस्ट्रेलिया जहां प्रति हेक्टेयर 1500 से 2000 किलोग्राम की रिकॉर्ड उत्पादकता हासिल कर रहे हैं, वहीं भारत की औसत उत्पादकता 450 किलोग्राम के आसपास हांफ रही है. महंगे बीज और कीटनाशकों की लगातार बढ़ती लागत ने कपास को घाटे का सौदा बना दिया है.
बाजार के इस अनिश्चित माहौल और घाटे से तंग आकर किसानों ने अब कॉटन को अलविदा कहना शुरू कर दिया है. किसान अब उन फसलों की तरफ भाग रहे हैं जिनकी या तो सरकारी खरीद पक्की है या फिर बाजार की मांग स्थिर है. पंजाब-हरियाणा के किसान कपास छोड़कर पानी के संकट के बावजूद धान की तरफ लौट रहे हैं, क्योंकि वहां एमएसपी की पक्की गारंटी है. वहीं मध्य और पश्चिमी भारत के किसान सोयाबीन और मक्के को अपना रहे हैं. नतीजा यह है कि पिछले पांच साल में कपास की खेती का रकबा लगभग 20 लाख हेक्टेयर कम हो गया है.
जब तक नीति निर्माण के केंद्र में कपड़ा मिल मालिकों के मुनाफे के बजाय किसान की लागत और उसकी खुशहाली को नहीं रखा जाएगा, तब तक 'सफेद सोना' इसी तरह अपनी चमक खोता रहेगा. आयात को प्राथमिकता देना बंद करना और भारतीय कपास निगम (CCI) द्वारा सीजन की शुरुआत में ही जमीनी स्तर पर एमएसपी पर आक्रामक खरीद करना ही इस संकट का समाधान लगता है. अन्यथा, मॉनसून की देरी का बहाना बनाकर देश के कपड़ा उद्योग को तो बचा लिया जाएगा, लेकिन उसे उगाने वाला किसान हमेशा के लिए इस चक्रव्यूह में दफन हो जाएगा.