
भारत में चीनी उद्योग पर गहराते संकट के संकेत मिल रहे हैं. कभी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी निर्यातक रहा भारत अब अगले कम से कम तीन सीजन तक वैश्विक बाजार से दूर रह सकता है. इसकी मुख्य वजह अल नीनो के कारण घटती बारिश और इथेनॉल की बढ़ती मांग को माना जा रहा है. विशेषज्ञों के मुताबिक, इन दोनों फैक्टर ने मिलकर देश में चीनी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ा दिया है, जिससे निर्यात के लिए अतिरिक्त स्टॉक बचना मुश्किल हो रहा है.
चीनी के क्षेत्र में भारत की गैर-मौजूदगी से अंतरराष्ट्रीय चीनी बाजार पर बड़ा असर पड़ सकता है. भारत का वैश्विक निर्यात में करीब 10% हिस्सा रहा है, लेकिन अब लाखों टन चीनी बाजार से बाहर हो सकती है क्योंकि भारत का निर्यात रुकने की आशंका है. अगर ऐसा होता है तो एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व के देशों को चीनी की सप्लाई कम मिलेगी और लंदन और न्यूयॉर्क में चीनी की कीमतों में तेजी दिखेगी.
सूत्रों ने 'रॉयटर्स' को बताया कि, सरकार एकमुश्त रोक लगाने के बजाय हर सीजन में निर्यात की अनुमति रोकने की रणनीति अपना सकती है. भारत में चीनी एक गंभीर मुद्दा है और राजनीति से जुड़ा भी है क्योंकि यह आम लोगों के भोजन का अहम हिस्सा है. साथ ही, गरीब परिवारों के लिए सस्ता कैलोरी का सोर्स है. इसलिए सरकार घरेलू उपलब्धता को तरजीह दे रही है.
इस साल अल नीनो के कारण मॉनसून कमजोर रहने का अनुमान है, जिससे बारिश सामान्य से काफी कम हो सकती है. जून में ही 40% से ज्यादा कमी दर्ज की जा चुकी है और किसानों ने गन्ने की बुवाई टालनी शुरू कर दी है. महाराष्ट्र के एक किसान ने बताया कि कम बारिश की आशंका के चलते उसने गन्ने की जगह सोयाबीन जैसी कम पानी वाली फसल को प्राथमिकता दी है.
विशेषज्ञों का मानना है कि किसान पानी की कमी के कारण गन्ने से दूरी बना सकते हैं. इससे 2027-28 तक गन्ने का रकबा और घट सकता है. सरकार भी कई क्षेत्रों में सोयाबीन, दालें जैसी वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा दे रही है क्योंकि इन फसलों में देश को आत्मनिर्भर बनाने का अभियान चलाया जा रहा है.
पहले अनुमान था कि इस सीजन में भारत 30.95 मिलियन टन चीनी उत्पादन करेगा, लेकिन अब संशोधित अनुमान घटकर 27.9 मिलियन टन रह गया है. यह देश की वार्षिक खपत (करीब 28.5 मिलियन टन) से कम है. इसके चलते अगले सीजन की शुरुआत में स्टॉक घटकर 3.5 मिलियन टन रह सकता है. अगर ऐसा होता है तो यह तीन दशकों में सबसे कम स्तर होगा.
कच्चे तेल का आयात कम रखने के लिए सरकार पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ाने पर जोर दे रही है, जिससे गन्ने का बड़ा हिस्सा चीनी के बजाय इथेनॉल बनाने में जा रहा है. इथेनॉल की मांग 2039-40 तक 30 बिलियन लीटर तक पहुंच सकती है. इस नीति से चीनी उत्पादन और कम हो सकता है क्योंकि चीनी का बड़ा हिस्सा इथेनॉल बनाने में खर्च होगा.
केवल भारत ही गन्ने से इथेनॉल नहीं बना रहा है, कई देश इस काम में तेजी से लगे हैं. ब्राजील भी गन्ने को इथेनॉल में डायवर्ट कर रहा है. थाइलैंड में भी अल नीनो के कारण उत्पादन प्रभावित हो सकता है जिससे चीनी की वैश्विक सप्लाई और सख्त हो सकती है. ये सभी फैक्टर चीनी के दाम बढ़ने की ओर इशारा कर रहे हैं.
'रॉयटर्स' की रिपोर्ट बताती है कि यदि चीनी का उत्पादन और गिरता है, तो भारत को एक दशक बाद चीनी आयात करनी पड़ सकती है. पिछली बार 2016-18 में ऐसा हुआ था. इतिहास बताता है कि जब भारत ने बड़े पैमाने पर आयात किया था, तब वैश्विक कीमतें काफी बढ़ गई थीं क्योंकि भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में चीनी की जरूरत बहुत अधिक होगी.