
कृषि मंत्रालय पूरे जून महीने में 'खेत बचाओ' अभियान चलाएगा. इससे पहले भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR), ने 'सेहत' अभियान शुरू करने लिए हाथ मिलाया है. लेकिन एक बुनियादी और कड़वा सवाल यह है कि आखिर इस देश के खेतों को 'बंजर' और इंसानों की सेहत को बीमार किसने किया? इतिहास गवाह है कि 60 से 90 के दशक तक की वैज्ञानिकों की उस महान पीढ़ी ने दिन-रात एक करके देश को भुखमरी के दलदल से निकाला और भारत का पेट भरा. लेकिन असली विफलता 90 के बाद की उस वैज्ञानिक खेप और रीढ़विहीन कृषि महकमों की रही, जिन्होंने देश के आत्मनिर्भर होने के बाद भी किसानों को सचेत करने के बजाय केमिकल वाली खेती को बढ़ावा दिया. दशकों तक खुद सरकारी तंत्र, गलत नीतियों और एसी कमरों में बैठे तथाकथित विशेषज्ञों ने किसानों को रिकॉर्ड पैदावार की अंधी होड़ में झोंका. उन्हें यूरिया, डीएपी और कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल और धरती का सीना चीरकर पानी बहाने के लिए मजबूर किया.
इस बंपर उत्पादन की आड़ में वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं ने अपनी पीठ खुद थपथपाई, बड़े-बड़े मेडल बटोरे, विदेशों के दौरे किए और चमचमाते अवॉर्ड्स अपनी अलमारियों में सजाए. लेकिन आज जब उसी रासायनिक जहर के ओवरडोज से देश की उपजाऊ जमीनें ऊसर और बंजर हो रही हैं, जब पंजाब और हरियाणा जैसे समृद्ध राज्यों के गांव 'कैंसर बेल्ट' में तब्दील हुए, तो पूरी चालाकी से सिस्टम ने अपना पल्ला झाड़ लिया है. आज पूरी धूर्तता के साथ इस बर्बादी का ठीकरा कृषि वैज्ञानिकों की बजाय अन्नदाता के सिर फोड़कर उन्हें 'खलनायक' साबित करने की कोशिश की जा रही है. साहब, नीतियां आपकी थीं, खाद और कीटनाशकों के कोटे आपके थे, कंपनियों को सब्सिडी आपकी थी...तो आज जब जमीन और इंसान दोनों आईसीयू (ICU) में पहुंच गए हैं, तो किसान गुनहगार कैसे हो गया? खेत को बचाने का अभियान जरूर चलाइए, लेकिन पहले अपनी ऐतिहासिक गलतियों का पश्चाताप कीजिए.
मिट्टी, प्लांट, एनिमल और इंसान की सेहत को आपस में जोड़ने वाले जिस 'वन हेल्थ' (One Health) का होश आज हुक्मरानों को आया है, वह बहुत पहले आ जाना चाहिए था. लेकिन अफसोस, जब पानी सिर से ऊपर बह गया और बर्बादी घर के अंदर तक घुस गई, तब जाकर कुंभकर्णी नींद टूटी है. असलियत तो यह है कि दशकों तक किसानों को जागरूक करने का ज्यादातर सरकारी बजट सिर्फ कागजों पर खर्च हुआ. इस सोची-समझी लापरवाही से बहुराष्ट्रीय खाद और कीटनाशक कंपनियों की तिजोरियां तो नोटों से लबालब भर गईं, लेकिन बदले में इस देश की करोड़ों साल पुरानी उपजाऊ मिट्टी को दांव पर लगा दिया गया.
अब वक्त आ गया है कि नब्बे के दशक के बाद भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की कुर्सियों पर बैठे रहे महानुभावों का सरकारी महिमामंडन तुरंत बंद किया जाए. एयर कंडीशनर कमरों में बैठकर 'सब ऑल इज वेल' की रिपोर्ट बनाने वाले इन पूर्व प्रमुखों और नीति-निर्माताओं को अब इतिहास के कठघरे में खड़ा करने की जरूरत है. इनसे सीधे, तीखे और कड़े सवाल पूछे जाने चाहिए कि आखिर किसकी शह पर उन्होंने देश के खेतों और लोगों को इस भयानक खतरे में धकेला. सफेद एप्रन और सूट-बूट पहनकर मेडल बटोरने वाले ये लोग अपनी जवाबदेही से भाग नहीं सकते. जब गुनाह सामूहिक था, तो सजा और बदनामी सिर्फ किसानों के हिस्से क्यों आए?
आज सरकार जिस यूरिया और रासायनिक कीटनाशकों के साइड इफेक्ट्स का रोना रो रही है, दशकों तक उसी सरकारी तंत्र ने किसानों को इसे ज्यादा से ज्यादा डालने के लिए मजबूर किया. रिकॉर्ड पैदावार की ऐसी होड़ मची कि खेतों की प्राकृतिक ताकत को पूरी तरह भुला दिया गया. इस पूरी बर्बादी के पीछे सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि खाद, बीज और कीटनाशक कंपनियों का बड़ा गठजोड़ भी काम कर रहा था. भारी सब्सिडी के बल पर रासायनिक खादों को बढ़ावा दिया गया, जिससे कंपनियां मुनाफा कमाती रहीं और देश की मिट्टी धीरे-धीरे अपनी उर्वरक क्षमता खोती चली गई. पानी के अंधाधुंध दोहन के कारण कई राज्यों में भूजल स्तर पाताल में चला गया.
इस पूरे घटनाक्रम में एक बड़ा राजनीतिक सवाल भी खड़ा होता है. वर्तमान कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कार्यभार संभालते ही मिट्टी की इस मूक चीख को समझा और 'खेत बचाओ' जैसे राष्ट्रव्यापी जन-जागरण अभियान की रूपरेखा तैयार की, लेकिन सवाल यह है कि जो बात आज सोची गई, वह पिछले तीन दशकों में कृषि मंत्रालय की कुर्सी पर बैठे बाकी मंत्रियों को क्यों नहीं सूझी? आखिर क्यों पूर्ववर्ती मंत्रियों का पूरा कार्यकाल केवल रासायनिक खादों की सब्सिडी मंजूर करने, खाद कंपनियों के मुनाफे की नीतियां बनाने और कागजी योजनाओं के फीते काटने में बीत गया? अगर कप्तानी संभाल रहे पुराने मंत्रियों ने समय रहते अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई होती और केवल तात्कालिक वाहवाही लूटने के बजाय देश की मिट्टी के भविष्य की चिंता की होती, तो आज भारत के खेत इस कदर जहर की कगार पर न पहुंचे होते.
जब देश में अनाज का संकट खत्म हो चुका था, तब आईसीएआर (ICAR) और कृषि विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों का यह कर्तव्य था कि वे किसानों को केमिकल के अंधाधुंध इस्तेमाल को रोकने की ट्रेनिंग देते. उन्हें ज्यादा रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के दुष्प्रभाव बताते, लेकिन तीन दशकों तक वैज्ञानिकों की प्रयोगशालाओं से यह चेतावनी बाहर ही नहीं निकली कि यूरिया का यह अंतहीन प्रयोग जमीन को बंजर और मृत बना देगा. किसानों को यह समझाने वाला कोई नहीं था कि 'धरती की सेहत और इंसान की सेहत' एक-दूसरे से जुड़ी है. कृषि मंत्रालय, ICAR और राज्यों का कृषि विस्तार तंत्र पूरी तरह ध्वस्त रहा, जिससे फसल में खाद की सही मात्रा बताने के बजाय कंपनियों के एजेंटों को किसानों को गुमराह करने की खुली छूट मिल गई.
हर साल केंद्र और राज्य सरकारों के कृषि विभागों को 'किसान जागरूकता' और 'कृषि विस्तार' के नाम पर अरबों रुपए का बजट आवंटित किया जाता है. सवाल उठता है कि अगर यह बजट जमीन पर खर्च हो रहा था, तो किसान आज भी यूरिया के साइड इफेक्ट्स से अनजान क्यों रह गए हैं? असलियत यह है कि जागरूकता का यह भारी-भरकम बजट का ज्यादातर हिस्सा सिर्फ कागजों पर खर्च हुआ.भारी सब्सिडी के बल पर रासायनिक खाद कंपनियों की तिजोरियां तो भरी गईं, लेकिन मिट्टी की सेहत सुधारने वाली योजनाएं महज फाइलों और डेटा एंट्री तक ही सिमटकर रह गईं.
मिट्टी, पशु और इंसानी स्वास्थ्य को एक धागे में पिरोने वाले 'वन हेल्थ' (One Health) के कॉन्सेप्ट पर आईसीएआर और आईसीएमआर ने अब जाकर हाथ मिलाया है. यह वैज्ञानिक गठजोड़ दशकों पहले हो जाना चाहिए था. कृषि महकमा आंखें मूंदकर रसायनों की सिफारिशें बांटता रहा और चिकित्सा अनुसंधान संस्थान अस्पतालों में बढ़ती मरीजों की भीड़ देखता रहा. इन दोनों बड़े संस्थानों के बीच समय पर पुल न बनने की कीमत देश की तीन पीढ़ियों ने चुकाई है.
आज केमिकल के अत्यधिक इस्तेमाल और गिरते भूजल स्तर के लिए बहुत ही चालाकी से किसान को विलेन बनाकर पेश किया जा रहा है. जबकि सच यह है कि किसान ने वही किया जो सरकारी तंत्र ने उसे एमएसपी और सब्सिडी का लालच देकर सिखाया था. बहरहाल, जून 2026 का 'खेत बचाओ अभियान' तब तक केवल एक और 'सरकारी इवेंट' बना रहेगा, जब तक 90 के दशक के बाद की नीतियां बनाने वाले अपनी जवाबदेही तय नहीं करते. देश के किसान को अब केवल उपदेशों वाले अभियानों की नहीं, बल्कि अपनी बीमार हो चुकी मिट्टी को जिंदा करने के लिए खाद सब्सिडी को प्राकृतिक खेती की तरफ मोड़ने और एक ईमानदार सरकारी नीति की जरूरत है.