
उत्तराखंड में लंबे समय से सख्त भू-कानूनों की जरूरत पर बहस होती रही है. राज्य सरकार लगातार यह तर्क देती रही हैं कि राज्य की संवेदनशील भौगोलिक स्थिति और स्थानीय लोगों के हितों की रक्षा के लिए भूमि संबंधी नियम मजबूत होना जरूरी है. इसी बीच हरिद्वार नगर निगम भूमि खरीद मामला एक बड़े प्रशासनिक विवाद के रूप में सामने आया है, जिसने सरकारी प्रक्रियाओं और भूमि खरीद व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. पूरा मामला हरिद्वार के सराय गांव की 2.307 हेक्टेयर जमीन से जुड़ा है.
यह भूमि नगर निगम के सॉलिड वेस्ट डंपिंग यार्ड के बिल्कुल पास स्थित है. स्थानीय लोगों के मुताबिक, यहां दुर्गंध, प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं लंबे समय से बनी हुई हैं. जांच के अनुसार, यह मूल रूप से कृषि भूमि थी और इसकी अनुमानित कीमत करीब 14 करोड़ रुपये आंकी गई थी. लेकिन कुछ ही दिनों में यही जमीन 54 करोड़ रुपये की सरकारी खरीद का हिस्सा बन गई.
बताया जा रहा है कि सितंबर 2024 में सराय गांव के सिंह परिवार ने नगर निगम को अपनी जमीन खरीदने का प्रस्ताव दिया. उन्होंने कहा था कि डंपिंग यार्ड के कारण जमीन खेती के इस्तेमाल के लायक नहीं बची है. यह प्रस्ताव तत्कालीन नगर आयुक्त वरुण चौधरी को दिया गया. इसके बाद तत्कालीन एसडीएम ज्वालापुर अजयवीर सिंह द्वारा कथित तौर पर धारा 143 के तहत जमीन का उपयोग कृषि से व्यावसायिक श्रेणी में बदला गया. जांच में सामने आया कि यह पूरी प्रक्रिया असामान्य रूप से तेज गति से पूरी हुई.
जमीन उपयोग परिवर्तन के लिए सभी पक्षों को कम से कम 22 दिन का नोटिस देना जरूरी था, लेकिन प्रक्रिया तय समय से पहले पूरी कर ली गई. साथ ही भूमि आवश्यकता और व्यवहार्यता की जांच के लिए पूल समिति का गठन भी नहीं किया गया. जांच में सामने आया कि भूमि उपयोग बदलने के बाद जमीन की कीमत करीब 6 हजार रुपये प्रति वर्गमीटर से बढ़कर लगभग 25 हजार रुपये प्रति वर्गमीटर तक पहुंच गई. इसके बाद दिसंबर 2024 में हरिद्वार नगर निगम ने इस जमीन की खरीद पूरी कर ली.
इस खरीद पर सबसे पहले हरिद्वार की मेयर किरण जैसल ने सवाल उठाए. उन्होंने मामले को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने रखा. मामले की जांच का जिम्मा सचिव रणवीर सिंह चौहान को दिया गया. उन्होंने खरीद प्रक्रिया और मंजूरियों की जांच के बाद विस्तृत रिपोर्ट सरकार को सौंपी.
जून 2025 में राज्य सरकार ने हरिद्वार के तत्कालीन जिलाधिकारी कर्मेंद्र सिंह, तत्कालीन नगर आयुक्त वरुण चौधरी, एसडीएम अजयवीर सिंह समेत कई अधिकारियों को निलंबित कर दिया. उत्तराखंड में यह पहली बार माना गया जब एक ही मामले में कार्यरत डीएम, नगर आयुक्त और एसडीएम के खिलाफ एक साथ कार्रवाई हुई.
जांच में यह भी सामने आया कि भूमि का मूल्यांकन कृषि श्रेणी के आधार पर शुरू हुआ लेकिन अंतिम खरीद व्यावसायिक दरों पर की गई. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कई प्रशासनिक सुरक्षा प्रक्रियाओं को नजरअंदाज किया गया.
विजिलेंस जांच में भूमि चयन, मूल्यांकन, भूमि उपयोग परिवर्तन और प्रशासनिक प्रक्रिया की जांच की गई. अधिकारियों ने सवाल उठाया कि डंपिंग यार्ड के पास स्थित जमीन को ऐसी स्थिति में क्यों खरीदा गया जबकि तत्काल कोई स्पष्ट जरूरत नहीं थी.
इसके बाद जून 2026 में धामी सरकार ने कार्रवाई और तेज करते हुए पूर्व नगर आयुक्त और आईएएस अधिकारी वरुण चौधरी की सेवा समाप्त करने की सिफारिश की. पूर्व डीएम कर्मेंद्र सिंह पर बड़ी दंडात्मक कार्रवाई की अनुशंसा की गई. पूर्व एसडीएम अजयवीर सिंह के खिलाफ भी कार्रवाई शुरू की गई.
कई अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई को मंजूरी दी गई और प्रस्ताव केंद्र के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को भेजा गया. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का हिस्सा बताया.
सराय गांव के ग्राम प्रधान मनीष कुमार ने कहा कि डंपिंग यार्ड की वजह से गांव में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ी हैं, खेती प्रभावित हुई है और लोगों को जमीन बेचने में मुश्किल हो रही है. घोटाला सामने आने के बाद जमीन उपयोग परिवर्तन से जुड़े वैध काम भी धीमे पड़ गए हैं, क्योंकि अधिकारी अब अतिरिक्त सतर्कता बरत रहे हैं.
स्थानीय दुकानदारों और ग्रामीण अब्दुल मजीद ने भी डंपिंग यार्ड हटाने की मांग उठाई. उन्हाेंने कहा कि मॉनसून के दौरान हालात और खराब हो जाते हैं. गांव के निवासी राजवीर सिंह ने बताया कि उनके पास लगभग 12 बीघा जमीन है, लेकिन डंपिंग साइट के कारण खरीदार नहीं मिल रहे हैं. उन्होंने कहा कि कई परिवार अब बेहतर अवसरों के लिए गांव छोड़ने पर विचार कर रहे हैं.
सामाजिक कार्यकर्ता जे.पी. बडोनी ने आरोप लगाया कि पहली बड़ी अनियमितता धारा 143 के तहत जमीन परिवर्तन प्रक्रिया में हुई, जो केवल 18 दिनों में पूरी कर दी गई. उन्होंने सवाल उठाया कि इस प्रक्रिया का आधार बनने वाली रिपोर्ट तैयार करने वाले तहसीलदार और पटवारी के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई? बडोनी ने आरोप लगाया कि कार्रवाई का फोकस निचले स्तर के अधिकारियों पर रहा, जबकि बड़े जिम्मेदार लोगों पर पर्याप्त जांच नहीं हुई.
हरिद्वार की मेयर किरण जैसल ने कहा कि बोर्ड बैठक में शामिल होने के बाद उन्हें इस बड़े खर्च और अनियमितताओं की जानकारी मिली. उन्होंने आरोप लगाया कि तत्कालीन नगर आयुक्त और जिलाधिकारी का रवैया अहंकारी था. उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा कार्रवाई किए जाने पर उनका आभार जताया. वहीं, उत्तराखंड कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने कहा कि ऐसे कई मामलों की जांच होनी चाहिए. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार पहले निलंबन को नियमित करने की कोशिश कर रही थी, लेकिन विपक्ष के मुद्दा उठाने के बाद अब कार्रवाई की जा रही है. उन्होंने कहा कि चुनाव नजदीक आने के साथ सरकार ऐसे मामलों को राजनीतिक तौर पर भी इस्तेमाल कर सकती है.