इथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ाने की तैयारी में सरकार, चीनी निर्यात पर लग सकती है पाबंदी

इथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ाने की तैयारी में सरकार, चीनी निर्यात पर लग सकती है पाबंदी

भारत ने पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल मिलाने (E20) का लक्ष्य हासिल कर लिया है और अब सरकार इसे और बढ़ाने की दिशा में तेजी से काम कर रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के पास इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने की क्षमता तो है, लेकिन इसके लिए उसे चीनी के निर्यात को और कम करना पड़ेगा.

क‍िसान तक
  • Noida,
  • Apr 06, 2026,
  • Updated Apr 06, 2026, 11:50 AM IST

भारत में इथेनॉल उद्योग चाहता है कि पेट्रोल में इथेनॉल की मिलावट 20 फीसदी (E20) से भी ज्यादा की जाए. लेकिन एक वैश्विक एजेंसी का कहना है कि अगर भारत E20 से ऊपर जाता है, तो उसे चीनी के निर्यात पर रोक लगानी पड़ सकती है. ऐसा इसलिए क्योंकि इथेनॉल बनाने में गन्ना इस्तेमाल होता है. अगर ज्यादा इथेनॉल बनाया जाएगा, तो देश में चीनी की कमी हो सकती है. चीनी का निर्यात रोकने से देश में चीनी की सप्लाई बनी रहेगी और कीमतें कंट्रोल में रहेंगी, खासकर अप्रैल से जून के बीच जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने की उम्मीद है.

पेट्रोल में इथेनॉल की मिलावट बढ़ाने की मांग

भारत ने पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल मिलाने (E20) का लक्ष्य हासिल कर लिया है और अब सरकार इसे और बढ़ाने की दिशा में तेजी से काम कर रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के पास इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने की क्षमता तो है, लेकिन इसके लिए उसे चीनी के निर्यात को और कम करना पड़ेगा. ऐसे में अगर भारत चीनी का निर्यात कम करेगा, तो दुनिया के बाजार में चीनी की सप्लाई घटेगी. इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीनी की कीमतों में थोड़ी बढ़ोतरी हो सकती है.

चीनी के निर्यात पर सरकार लगाएगी रोक

भारत को 2022-23 के सीजन में चीनी की कमी का सामना करना पड़ा था. इसी वजह से सरकार ने चीनी के निर्यात पर रोक लगा दी थी. इसके बाद 2023-24 में भले ही उत्पादन ज्यादा हुआ, लेकिन फिर भी सरकार ने चीनी को बाहर भेजने की अनुमति नहीं दी, ताकि देश में पर्याप्त स्टॉक बना रहे. 2024-25 में सरकार ने सीमित मात्रा में चीनी निर्यात की अनुमति दी. तय सीमा में से करीब 9 लाख टन चीनी विदेश भेजी गई. वहीं, चालू सीजन (अक्टूबर से सितंबर) में सरकार ने अब तक 15.9 लाख टन निर्यात की अनुमति दी है, जिसमें से मार्च के अंत तक करीब 3.6 लाख टन चीनी का निर्यात हो चुका है.

गन्ना का भुगतान जल्द चुकाएगी सरकार

उद्योग से जुड़े लोगों के मुताबिक, सरकार गन्ना किसानों के बकाया भुगतान को लेकर चिंतित है. मार्च के अंत तक मौजूदा पेराई सीजन में मिलों को किसानों को करीब 16,918 करोड़ रुपये देना बाकी है. यह पेराई सीजन 1 अक्टूबर 2025 से शुरू हुआ था. हालांकि, मिलों ने कुल बकाया 1.07 लाख करोड़ रुपये में से लगभग 84 फीसदी भुगतान कर दिया है, लेकिन फिर भी जो रकम बची है, वह काफी बड़ी है और चिंता का कारण बनी हुई है. एक अधिकारी के अनुसार, अगर चीनी मिलें इथेनॉल का उत्पादन और बढ़ाती हैं, तो उनकी कमाई बढ़ सकती है और वे किसानों का बकाया जल्दी चुका सकती हैं.

तेल कंपनियों (OMCs) ने इथेनॉल खरीद के पहले चरण में चीनी मिलों से सिर्फ 288.51 करोड़ लीटर इथेनॉल का ऑर्डर दिया है, जबकि उनकी कुल उत्पादन क्षमता करीब 1000 करोड़ लीटर है. यानी मिलों के पास ज्यादा उत्पादन करने की क्षमता है, लेकिन ऑर्डर कम मिला है. अब तक 15 मार्च तक मिलों ने मिले ऑर्डर का करीब 46 फीसदी इथेनॉल सप्लाई कर दिया है. वहीं दूसरी तरफ, अनाज (ग्रेन) से इथेनॉल बनाने वाली यूनिट्स को ज्यादा ऑर्डर मिला है. करीब 759.75 करोड़ लीटर का, लेकिन उन्होंने अब तक इसका सिर्फ 31 फीसदी ही सप्लाई किया है.

इस साल इतनी रह सकती है चीनी की कीमत

बीएमआई की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2026 की शुरुआत (जनवरी से मार्च) में दुनिया भर में चीनी की औसत कीमत करीब 14.6 सेंट प्रति पाउंड रही. अब आगे के महीनों में चीनी के दाम धीरे-धीरे बढ़ने की उम्मीद है, जिसमें अप्रैल से जून तक करीब 16.2 सेंट प्रति पाउंड, जुलाई से सितंबर तक करीब 16.6 सेंट प्रति पाउंड और अक्टूबर से दिसंबर तक करीब 17.2 सेंट प्रति पाउंड रहेगा. पूरे साल 2026 में औसतन चीनी की कीमत 16.2 सेंट प्रति पाउंड रहने का अनुमान है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि अल नीनो का असर भारत में चीनी उत्पादन पर पड़ सकता है. पहले भी ऐसा हो चुका है. साल 2023 में मॉनसून की बारिश करीब 6 फीसदी कम रही थी, जिसका असर अगले सीजन (2024-25) में दिखा. इसी वजह से भारत में चीनी उत्पादन घटकर लगभग 261 लाख टन रह गया, जबकि 2023-24 में यह करीब 320 लाख टन था. रिपोर्ट के अनुसार, अल नीनो के दौरान गन्ने की फसल पर बुरा असर पड़ता है. अनुमान है कि इससे भारत में गन्ने का उत्पादन करीब 9 फीसदी तक घट सकता है, वहीं थाईलैंड में भी करीब 15 फीसदी की कमी आ सकती है. जब बड़े देशों में उत्पादन घटता है, तो दुनिया भर में चीनी की सप्लाई कम हो जाती है, जिससे कीमतें बढ़ जाती हैं. इसी कारण हाल के सालों में चीनी के दाम 2011 के बाद सबसे ऊंचे स्तर तक पहुंच गए. 

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