Glyphosate Files: ग्लाइफोसेट वाली व‍िदेशी दाल और न‍ियमों की देसी ढाल, क्या सेहत से हुआ सौदा?

Glyphosate Files: ग्लाइफोसेट वाली व‍िदेशी दाल और न‍ियमों की देसी ढाल, क्या सेहत से हुआ सौदा?

क्या देश का क‍िसान और कंज्यूमर अनजाने में एक ऐसे जानलेवा चक्रव्यूह में फंस चुका है, जिससे निकलना उसके बस में नहीं है? जिस केम‍िकल को खरपतवार का काल माना गया, वह आज किसानों की सेहत का दुश्मन बनता जा रहा है. पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ जागरूकता की कमी है, या फिर एग्रो केम‍िकल कंपन‍ियों के मुनाफे के आगे इंसानी जिंदगी को बौना समझने की सोची-समझी खामोशी?

Glyphosate Residue IndiaGlyphosate Residue India
ओम प्रकाश
  • New Delhi,
  • Jun 11, 2026,
  • Updated Jun 11, 2026, 3:18 PM IST

क्या भारत के आम नागरिकों की सेहत का मोल अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक समझौतों और कंपनियों के मुनाफे से कम है? यह एक ऐसा गंभीर सवाल है जो भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) के अपने ही सरकारी दस्तावेज़ों को देखकर खड़ा होता है. अंतरराष्ट्रीय खाद्य व्यापार में एक ऐसा दोहरा मापदंड चल रहा है, जहां दुनिया के अमीर देश भारत के सामान पर 'जीरो टॉलरेंस' की कड़ाई दिखाते हैं, वहीं भारत में विदेशी दालों और सोयाबीन में कैंसरकारी केमिकल 'ग्लाइफोसेट' को खपाने के लिए नियम ढीले किए जाते रहे हैं. मैं उसी ग्लाइफोसेट की बात कर रहा ज‍िसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) ने "संभावित कैंसरकारी" घोषित क‍िया हुआ है.

सरकारी फाइलें खुद गवाही दे रही हैं कि हमारी नियामक संस्था इस बड़े खतरे से अनजान नहीं थी. FSSAI के इम्पोर्ट डिवीजन के आधिकारिक कागजों में साफ लिखा है-"आयातित दालों में खरपतवारनाशी 'ग्लाइफोसेट' की मात्रा बहुत ज्यादा होने की आशंका है, जिससे भारतीय उपभोक्ताओं की सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है." इस साफ चेतावनी के बावजूद देश के लोगों को सुरक्षा देने के बजाय नियमों को ढीला करने का ढर्रा अपनाया गया. 

ग्लाइफोसेट के ल‍िए इतनी उदारता क्यों? 

भारत का अपना बुनियादी नियम कहता है कि जिस केमिकल की सीमा तय न हो, उस पर 0.01 mg/kg की सख्त लिमिट (यानी लगभग शून्य) लागू होगी. इसका मतलब यह हुआ कि एक टन दाल में 1 ग्राम केमिकल का पाया जाना भी कानूनन अपराध है, लेकिन न जाने किस वजह से इस कड़े रुख को ताक पर रख दिया गया. उसने अंतरराष्ट्रीय मानक संस्था 'कोडेक्स' (Codex) द्वारा सुझाई बेहद उदार अधिकतम अवशेष सीमा यानी एमआरएल (MRL) को अपना लिया, जिसके तहत मसूर और मटर के लिए 5 mg/kg और सोयाबीन के लिए तो हद पार करते हुए 20 mg/kg (20 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम) का अत्यधिक खतरनाक स्तर कानूनी रूप से तय कर दिया गया. 

विशेषज्ञों की चेतावनी: यह धीमा जहर है

विशेषज्ञों का कहना है कि चूंकि भारत में दालें रोज खाई जाती हैं, इसलिए इस ढीली नीति के कारण यह केमिकल धीरे-धीरे हमारे शरीर में जा रहा है. एक सीधा सवाल है. जब भारत सरकार ने देश के किसानों के लिए ग्लाइफोसेट के उपयोग पर इसके खतरों की वजह से कड़े प्रतिबंध लगा रखे हैं, तो वही कड़ाई विदेशों से आने वाली दालों पर क्यों लागू नहीं की जाती? यह हमारे अपने किसानों के साथ भी सरासर नाइंसाफी नहीं है क्या? 

भारत में सरकारी नियमों (CIB&RC) के अनुसार, ग्लाइफोसेट का इस्तेमाल किसी भी खाद्य फसल (जैसे धान, गेहूं या दालों) पर करने की कानूनी रूप से बिल्कुल अनुमति नहीं है. इसे केवल चाय के बागानों और गैर-फसली क्षेत्रों (जैसे खाली पड़े मैदानों या मेड़ों) में उगी जंगली घास को साफ करने के लिए ही मंजूर किया गया है. हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि नियमों को ताक पर रखकर देश के कई राज्यों में कपास (HTBT कॉटन), गन्ने, मक्के और फलों के बागानों में इसका अवैध रूप से धड़ल्ले से छिड़काव किया जाता रहा है.

अमीर देशों का दोहरा खेल

यह पूरा खेल अंतरराष्ट्रीय व्यापार के उस चेहरे को बेनकाब करता है जहां ताकतवर देश अपने फायदे के हिसाब से नियम बदलते हैं. यूरोपीय संघ (EU) और कनाडा जैसे देश जब भारत से चाय या चावल खरीदते हैं, तो  0.01 mg/kg की 'जीरो टॉलरेंस' नीति पर अड़ जाते हैं. अगर जरा सा भी अंश मिला, तो भारत का पूरा कंसाइनमेंट रिजेक्ट कर दिया जाता है.

वही कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जब अपनी दालें भारत को बेचते हैं, तो वे 5.0 mg/kg जैसी ऊंची छूट का फायदा उठाते रहे हैं. सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों ने अपने नागरिकों को बचाने के लिए ग्लाइफोसेट वाली दालों पर बैन लगा रखा है, लेकिन भारत का बाजार इनके लिए खुला रहा है.

अमेरिका में हड़कंप, कंपनियों पर सख्ती 

जहां भारत में ग्लाइफोसेट के मुद्दे पर नीतिगत नरमी का रुख रहा है, वहीं वैश्विक स्तर पर इस केमिकल को लेकर बड़ी कानूनी लड़ाई शुरू हो चुकी है. अमेरिका के टेक्सास राज्य के अटॉर्नी जनरल केन पैक्सटन ने भोजन में ग्लाइफोसेट मिलाकर लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने के आरोप में दिग्गज कंपनियों पर सीधे केस ठोक दिया है.

अमेरिकी जांच रिपोर्ट बताती है कि विदेशी कंपनियां फसल की कटाई से ठीक पहले उसे जल्दी सुखाने के लिए सीधे फसलों पर इस केमिकल का हैवी स्प्रे करती हैं. इसी वजह से वहां की दालों में यह खतरनाक स्तर पर पाया जाता है. दावा है कि ग्लाइफोसेट न केवल कैंसर का कारण बन सकता है, बल्कि यह हॉर्मोन असंतुलन, बांझपन, किडनी की बीमारियां और ऑटोइम्यून विकारों के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार रहा है.

व्यापार बड़ा या देश के लोगों की जान?

सरकारी अफसरों का अक्सर यह तर्क होता है कि भारत में दालों की कमी को पूरा करने के लिए आयात जरूरी है. विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के चलते अंतरराष्ट्रीय मानकों को मानना हमारी मजबूरी बन जाता है. लेकिन सबसे बड़ा और सीधा सवाल यही है कि क्या कोई भी व्यापारिक मजबूरी या अंतरराष्ट्रीय संधि देश के करोड़ों नागरिकों और बच्चों की जिंदगी से बढ़कर हो सकती है? जब दुनिया के दूसरे देश अपने नागरिकों की थाली सुरक्षित रखने के लिए कड़े से कड़े कानून बना रहे हैं, तब भारत में ऐसी ढीली व्यवस्थाओं का चलते रहना बेहद चिंताजनक है.

क्यों हो रहे ग्लाइफोसेट के शिकार?

भारत में आम लोग और किसान अनजाने में ग्लाइफोसेट के शिकार हो रहे हैं, क्योंकि इससे लाभ कमाने वाली कंपनियां किसानों की जागरूकता और ट्रेनिंग के लिए पैसा नहीं खर्च कर रही हैं. केंद्रीय पंजीकरण समिति (RC) ने ग्लाइफोसेट को केवल चाय के बागानों और गैर-फसल क्षेत्रों (बंजर जमीन) में छिड़काव के लिए मंजूरी दी हुई है, लेकिन जागरूकता की कमी के कारण किसान इसका धड़ल्ले से उपयोग कपास, मक्का, अरहर और धान के खेतों में कतारों के बीच उगे खरपतवार को साफ करने के लिए कर रहे हैं.

भारतीय खेतों में दवा छिड़कने वाले किसान या मजदूर चप्पल, बनियान या बिना किसी मास्क और चश्मे के पीठ पर टैंक लादकर ग्लाइफोसेट स्प्रे करते हैं. हवा के जरिए यह सीधे उनकी त्वचा और फेफड़ों तक पहुंचता है, जो 'नॉन-हॉजकिन लिंफोमा' (कैंसर) जैसी बीमारियों की सीधी वजह बन सकता है. फसलों पर गैर-कानूनी छिड़काव के कारण ग्लाइफोसेट पौधों की जड़ों और पत्तों द्वारा सोख लिया जाता है. इसके अवशेष (Residues) गेहूं, दालों, मक्का और सब्जियों के जरिए सीधे आम उपभोक्ताओं के पेट में पहुंच रहा है.

लैब की कमी 

कुल म‍िलाकर ग्लाइफोसेट आज खेती की जरूरत कम और एग्रोकेमिकल कंपनियों की तिजोरियां भरने का जरिया ज्यादा बन चुका है, जिसके चलते खेतों में फसलों के बजाय बीमारियां उग रही हैं, मिट्टी बंजर हो रही है, पानी जहरीला हो रहा है और हमारा अन्नदाता घुटने टेकने पर मजबूर है. इस विनाशकारी जहर पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय हमारा तंत्र आंखें मूंदे बैठा है, जहां 'राष्ट्रीय कीटनाशक अवशेष निगरानी योजना' (MPRNL) जैसी नीतियां कागजों पर तो रेंगती हैं, लेकिन आम मंडियों में बिकने वाले अनाज और सब्जियों की दैनिक जांच करने की कोई अनिवार्य व्यवस्था तक नहीं है. 

विडंबना देखिए कि जो कड़ा पहरा और जांच निर्यात होने वाले माल की सेहत बचाने के लिए लगाई जाती है, वही चौकसी देश के आम उपभोक्ताओं की थाली को इस धीमे जहर से बचाने के लिए पूरी तरह नदारद है. जब तक देश में ग्लाइफोसेट के इस अंधाधुंध दुरुपयोग को रोकने और आम नागरिकों को उनके भोजन की शुद्धता बताने वाला कोई पारदर्शी व सख्त जांच तंत्र खड़ा नहीं होता, तब तक कंपन‍ियों के मुनाफे की इस मलाई के बदले आम जनता सिर्फ अपनी सेहत की कीमत चुकाती रहेगी.

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