
अगर किसी का वेतन प्रतिमाह एक लाख रुपये तय किया जाए और महीने के अंत में सैलरी 75,000 दी जाए तो क्या होगा? जाहिर है कि हंगामा होगा. अगर सरकारी कर्मचारी हैं तो हड़ताल होगी. लेकिन, किसान यह पीड़ा वर्षों से सहते आए हैं. जिन फसलों के हम बड़े आयातक हैं, उनका भी सही दाम अपने किसानों को नहीं दे पा रहे हैं. सही दाम से मेरा मतलब एमएसपी से है. एमएसपी मतलब न्यूनतम दाम. उससे कम कीमत मिलने का मतलब नुकसान है. इंडो-यूएस ट्रेड डील से फायदा होगा या नुकसान इस पर अभी अंदाजा लगाईए, लेकिन जो सच सरकारी आंकड़ों में दर्ज हो चुका है उससे पता चलता है कि किसान कितने बड़े संकट से गुजर रहे हैं. उसी से पता चलता है कि आखिर किसान धान, गेहूं की खेती छोड़कर क्यों दलहन-तिलहन की ओर नहीं शिफ्ट होते.
भारत कृषि प्रधान देश है. यहां लगभग 14 करोड़ किसान परिवार हैं. इसके बावजूद हमने 2024-25 में कृषि उपज के आयात पर 3,13,225 करोड़ रुपये खर्च किए. जिसमें सबसे ज्यादा पैसा खाद्य तेलों और दालों के आयात पर लगाया गया. एक साल में ही हमने लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपये के खाद्य तेल और 47 हजार करोड़ की दालें मंगवाई हैं. इसका सीधा मतलब यह है कि भारत खाद्य तेल और दालों की घरेलू जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहा. ऐसे में कायदे से भारत में तिलहन और दलहन फसलों की खेती करने वाले किसानों को उनकी उपज की सही कीमत मिलनी चाहिए. लेकिन ऐसा नहीं हो रहा. इंपोर्ट ड्यूटी कम करके, एक्सपोर्ट ड्यूटी बढ़ाकर और एक्सपोर्ट बैन करके फसलों का दाम गिराया जा रहा है. इस तरह फसलों के सही दाम का संकट महज डिमांड-सप्लाई से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह एक नीतिगत चक्रव्यूह है. फसल उत्पादन के लिए किसानों को उकसाकर सस्ते आयात की अनुमति देना पीठ में छुरा घोंपने जैसा है.
तिलहन फसलों में अहम स्थान रखने वाली सोयाबीन की खेती महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान में प्रमुख तौर पर होती है. सोया ऑयल दूसरे देशों से मंगाया जा रहा है लेकिन अपने किसानों को हम सही दाम नहीं दिला पा रहे हैं. किसान पिछले दो वर्ष से सोयाबीन को एमएसपी से कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर हैं. केंद्रीय कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि जनवरी 2024 में सोयाबीन का एमएसपी 4600 रुपये प्रति क्विंटल था, जबकि बाजार में किसानों को कीमत मिली सिर्फ 4479 रुपये क्विंटल.
जनता में एक धारणा है कि किसानों को सरकार हर साल फसल का दाम बढ़ाकर दे रही है, फिर किसानों में असंतोष क्यों है? दरअसल, यह सच है कि सरकार हर साल एमएसपी बढ़ा रही है. लेकिन उसका मिलना अधूरा सच है. ज्यादातर किसानों को एमएसपी मिलती नहीं. सरकार एमएसपी घोषित करती है लेकिन अपने ही तय किए गए दाम को दिलाने की कोई 'गारंटी' नहीं देती. सोयाबीन इसका बड़ा उदाहरण है. जनवरी 2025 में सोयाबीन की एमएसपी 4892 रुपये थी, लेकिन बाजार भाव पहले से भी कम होकर महज 4070.96 रुपये रह गया.
अक्टूबर 2025 में सोयाबीन का एमएसपी बढ़कर 5328 रुपये हो गया, लेकिन बाजार भाव पहले से भी घटकर महज 3941.56 रुपये प्रति क्विंटल ही रह गया. इसका बाजार भाव जनवरी 2026 में बढ़कर 4976.72 रुपये तक पहुंचा. हालांकि, यह भी एमएसपी से कम ही है. महाराष्ट्र से लेकर मध्य प्रदेश तक में, नेताओं ने सोयाबीन कीमत की दिलाने के लिए जितने भी दावे किए हैं वो सब फ्लॉप साबित हुए हैं.
भारत में तूर सबसे ज्यादा खाई जाने वाली दालों में शामिल है. एक तरफ हम दालों का आयात कर रहे हैं तो दूसरी ओर अपने किसानों को सही कीमत नहीं दे रहे हैं. केंद्रीय कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि जनवरी 2025 में तूर दाल का एमएसपी 7550 रुपये प्रति क्विंटल था, जबकि किसानों को बाजार में भाव मिला 7310.24 रुपये क्विंटल का.
इसी तरह नवंबर 2025 में तूर यानी अरहर दाल का एमएसपी तो बढ़कर 8000 रुपये प्रति क्विंटल हो गया, लेकिन बाजार भाव घटकर 6209.83 रुपये ही रह गया. जनवरी 2026 में बाजार भाव बढ़कर 7376.42 रुपये प्रति क्विंटल हुआ, हालांकि यह भी एमएसपी से करीब छह सौ रुपये कम है.
किसान संगठन इसीलिए एमएसपी को कानूनी गारंटी देने की वकालत कर रहे हैं ताकि सरकार खरीद करे या न करे लेकिन निजी क्षेत्र एमएसपी जितनी कीमत देने को बाध्य हो. जिन लोगों को ऐसा लगता है कि एमएसपी गारंटी मिलने के बाद महंगाई बढ़ जाएगी उन्हें यह अच्छे से समझ लेना चाहिए कि सरकार इन सब फैक्टर को देखते हुए एमएसपी घोषित करती है.
मक्का वह फसल है जिसकी खेती के जरिए अन्नदाता को ऊर्जादाता बनने का ख्वाब दिखाया गया. किसानों ने मक्के की खेती का विस्तार करके भारत को इस मामले में आत्मनिर्भर बना दिया. लेकिन, उन्हें उसकी कीमत नहीं मिली. कागजों में एमएसपी बढ़ती रही लेकिन बाजार में दाम नहीं बढ़ा. क्योंकि सरकार ने 2024-25 में करीब 9.7 लाख मीट्रिक टन मक्का आयात कर लिया. मार्च 2025 में मक्के का एमएसपी 2225 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया, लेकिन किसानों को बाजार में दाम मिला 2176.61 रुपये. जनवरी 2026 में मक्के का एमएसपी बढ़कर 2400 रुपये क्विंटल हो गया, लेकिन, असल में किसानों को कीमत मिली सिर्फ 1664.59 रुपये प्रति क्विंटल.
कॉटन एक कॅमर्शियल क्रॉप है. गिरते दाम, गुलाबी सुंडी की समस्या, अच्छे बीजों का अभाव और सस्ते आयात ने इसकी खेती करने वाले किसानों का हौसला तोड़ दिया है. अगस्त 2024 में कॉटन का एमएसपी 6620 रुपये प्रति क्विंटल था, जबकि किसानों को बाजार में दाम मिला 6046.01 रुपये प्रति क्विंटल का. जनवरी 2026 में कॉटन का एमएसपी बढ़ाकर 7710 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया, लेकिन किसानों को बाजार में कीमत मिली एमएसपी से कम महज 7359.72 रुपये की. नतीजा यह है कि कॉटन की खेती का एरिया घट रहा है.
बाजरा एक प्रमुख श्रीअन्न यानी मोटा अनाज है. मोटे अनाजों को लेकर 2023 में हमने मिलेट ईयर का जश्न मनाया था. इस दौरान बड़ी-बड़ी बातें हुई थीं, लेकिन, दाम के मामले में इसकी बड़ी दुर्गति हो रही है. जनवरी 2025 में बाजरा का एमएसपी 2625 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया था, जबकि बाजार भाव महज 2344.03 रुपये रहा. जनवरी 2026 में बाजरा का एमएसपी बढ़कर 2775 रुपये प्रति क्विंटल हो चुका है, लेकिन असल में किसानों को बाजार में भाव मिला महज 2365.65 रुपये प्रति क्विंटल का. राजस्थान जैसे सबसे बड़े बाजरा उत्पादक सूबे में एक दाने बाजरे की भी सरकारी खरीद नहीं हुई है.
हमने जिनके दाम की दुर्दशा पर बात की है वो सब ऐसी फसलें हैं जिन पर दिल्ली दरबार वाले अर्थशास्त्री अक्सर ज्ञान देते रहते हैं कि किसानों को धान-गेहूं छोड़कर दलहन, तिलहन और मोटे अनाजों की खेती करनी चाहिए. सच तो यह है कि किसान गेहूं-धान छोड़ने को तैयार हैं, लेकिन सरकारी तंत्र उसे वह कीमत भी दिलाने को तैयार नहीं है, जिसे वो खुद तय करता है, जिसे कैबिनेट पास करती है. अगर दलहन, तिलहन और मक्के की सही कीमत नहीं मिलेगी तो यकीन मानिए कि इनकी आयात निर्भरता बढ़ेगी. आज उसकी कीमत किसान चुका रहा है, कुछ समय बाद कंज्यूमर भी चुकाएगा.
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