
नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कपास की खेती आज एक बहुत ही मुश्किल दौर से गुजर रही है. अगर हम दुनिया के बाकी बड़े देशों से तुलना करें, तो हमारे देश में कपास की पैदावार काफी कम है. इसकी सबसे बड़ी और अहम वजह यह है कि हमारे किसान आज भी बहुत पुरानी किस्म के बीजों का इस्तेमाल कर रहे हैं. भारत में कपास यानी रुई की पैदावार दुनिया के औसत और दूसरे बड़े देशों के मुकाबले काफी कम है. अगर आंकड़ों पर नजर डालें, तो भारत में प्रति हेक्टेयर कपास का उत्पादन करीब 450 किलोग्राम के आसपास ही सिमटा हुआ है.
वहीं दूसरी तरफ, दुनिया का औसत उत्पादन लगभग 800 से 850 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है. इतना ही नहीं, चीन, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया जैसे प्रमुख देशों में तो यह पैदावार 1,500 से लेकर 2,000 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से भी ज्यादा है. यानी वे हमारे मुकाबले तीन से चार गुना ज्यादा उपज ले रहे हैं. इन कमजोर बीजों की फसल पर 'पिंक बॉलवर्म' नाम का एक खतरनाक कीड़ा बहुत आसानी से हमला कर देता है, जिससे किसानों की महीनों की कड़ी मेहनत पूरी तरह बर्बाद हो जाती है.
नीति आयोग का साफ तौर पर कहना है कि सिर्फ विदेशी कॉटन पर टैक्स लगाने या इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाने से किसानों का असली भला कभी नहीं होगा. असली तरक्की तब मुमकिन होगी जब हम किसानों को खेती की नई और सही तकनीक देंगे. मौसम का अचानक बदलना, बीजों की लगातार बढ़ती कीमतें और सही जानकारी की कमी भी एक बहुत बड़ी परेशानी है. किसानों के पास खेती की जमीन काफी छोटी है, इसलिए वे बड़ी और आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल नहीं कर पाते. इन तमाम परेशानियों को जड़ से खत्म करने के लिए सरकार ने 2026 के नए बजट में 2,500 करोड़ रुपये का एक खास 'कॉटन मिशन' शुरू किया है, जिसकी तारीफ नीति आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में की है.
साल 2002 में हमारे देश में 'बीटी कॉटन' नाम का एक नया और खास बीज लाया गया था, जिसे 'बोलगार्ड' का नाम दिया गया. इसे खास तौर पर अमेरिकन कीड़ों से फसल को बचाने के लिए तैयार किया गया था. इसके बाद साल 2006 में इसका और भी बेहतर रूप 'बोलगार्ड 2' बाजार में आया. शुरुआत में तो इन बीजों ने कमाल का असर दिखाया और किसानों को काफी अच्छा मुनाफा भी हुआ. लेकिन नीति आयोग का मानना है कि अब वक्त काफी बदल गया है और ये पुराने बीज पूरी तरह से बेअसर हो चुके हैं. खतरनाक कीड़ों के खिलाफ लड़ने की इनकी ताकत अब खत्म हो गई है, और अब सफेद मक्खी जैसे नए कीड़ों का हमला भी एक बड़ी मुसीबत बन गया है.
छोटे और गरीब किसानों के लिए बार-बार ये महंगे बीज खरीदना बहुत भारी पड़ता है, जिससे उनका फायदा कम हो रहा है. इसलिए नीति आयोग ने जोर देकर कहा है कि हमें अपने देश के मौसम के हिसाब से बिल्कुल नए, देसी और ताकतवर बीज जल्द से जल्द बनाने होंगे. इसके साथ ही, किसानों को नई चीजों की सही ट्रेनिंग देना भी बेहद लाजमी है. मोबाइल फोन और गांव के समझदार किसानों की मदद से नई तकनीक की जानकारी हर किसान के घर तक आसानी से पहुंचाई जा सकती है.
आज के दौर में मौसम का मिजाज बहुत तेजी से बदल रहा है, जो खेती के लिए चिंता की बात है. कभी अचानक तेज चिलचिलाती धूप, तो कभी बेमौसम की भारी बारिश; यह सब कपास की खेती के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बन गया है. नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में साफ तौर पर बताया है कि इस बड़ी परेशानी से बचने के लिए हमें 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' यानी एआई और आधुनिक मशीन लर्निंग जैसी नई तकनीक का पूरा इस्तेमाल करना होगा.
पुराने मौसम के आंकड़ों और आसमान में मौजूद सैटेलाइट की तस्वीरों की मदद से, ये स्मार्ट कंप्यूटर किसानों को मौसम का बिल्कुल सही और सटीक हाल पहले ही बता सकते हैं. इससे हमारे किसानों को यह तय करने में बहुत आसानी होगी कि सही बीज कब बोना है और खेतों में पानी किस वक्त देना है. नीति आयोग के मुताबिक, एआई की मदद से खेतों में कीड़ों की निगरानी भी उसी वक्त की जा सकती है. जैसे ही कोई कीड़ा फसल पर हमला करेगा, किसानों को फौरन अपने मोबाइल फोन पर खबर मिल जाएगी, जिससे वे वक्त रहते सही दवा डालकर अपनी कीमती फसल को आसानी से बचा सकेंगे.
फरवरी 2021 में, भारत सरकार ने बाहर के देशों से आने वाली विदेशी रुई यानी इंपोर्टेड कपास पर 11 प्रतिशत का आयात शुल्क लगा दिया था. हालांकि, फिलहाल 1 जून 2026 से 31 अक्टूबर 2026 तक के लिए सरकार ने इस टैक्स से थोड़ी सी छूट दी है. लेकिन नीति आयोग की सलाह है कि विदेशी रुई पर ज्यादा टैक्स लगाने से हमारे किसानों को कोई खास फायदा नहीं हो रहा है, बल्कि उल्टा हमारे कपड़ा उद्योग को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है. जब पूरी दुनिया में रुई सस्ती होती है और हमारे देश में इसका भाव बहुत ज्यादा होता है, तो इस भारी टैक्स की वजह से कपड़ा बनाने वाली फैक्ट्रियों का मुनाफा बिल्कुल खत्म हो जाता है.
दूसरी तरफ, बांग्लादेश और वियतनाम जैसे हमारे पड़ोसी देश बिना किसी टैक्स के बाहर से सस्ती रुई मंगाते हैं और दुनिया के बाजार में हमसे बहुत आगे निकल जाते हैं. इसलिए, नीति आयोग का यह पुख्ता सुझाव है कि सरकार को इस इंपोर्ट ड्यूटी को पूरी तरह से हटा देना चाहिए. इससे हमारी फैक्ट्रियां दुनिया भर के बाजार में डटकर मुकाबला कर सकेंगी और जब कारखाने चलेंगे, तो किसानों की रुई भी अच्छे दाम पर बिकेगी.
हमारे देश में रुई को साफ करने वाली फैक्ट्रियों में सरकार की मदद से काफी नई मशीनें लगाई गई हैं. लेकिन नीति आयोग ने इस बात पर बहुत जोर दिया है कि आज भी बहुत सी फैक्ट्रियां अपना काम पूरी ईमानदारी से नहीं कर रही हैं. सिर्फ थोड़े से पैसे बचाने के चक्कर में, कई कारखाने रुई को मशीन में डालने से पहले उसे बिल्कुल साफ नहीं करते हैं. हाल ही की एक रिसर्च के मुताबिक, करीब 64 प्रतिशत फैक्ट्रियां रुई को साफ ही नहीं करतीं, और 23 प्रतिशत फैक्ट्रियां आज भी पुराने तरीके से हाथों से सफाई करवा रही हैं.
अगर शुरुआत में ही रुई में कचरा रह जाए, तो उससे बनने वाले धागे और कपड़े की क्वालिटी हमेशा के लिए खराब हो जाती है. नीति आयोग का कहना है कि जिन फैक्ट्रियों ने आधुनिकीकरण के लिए सरकार से आर्थिक मदद ली है, उनके लिए सफाई वाली मशीनें लगाना एकदम अनिवार्य कर देना चाहिए. इसके साथ ही, रुई की क्वालिटी चेक करने का एक पक्का डिजिटल सिस्टम भी होना चाहिए, ताकि बाजार में एकदम साफ और बढ़िया रुई पहुंचे, जिससे दुनिया में बेहतर साख बन सकें.