
जलवायु परिवर्तन, बढ़ती गर्मी, बेमौसम बारिश और अल नीनो का असर अब भारतीय कृषि पर साफ दिखाई देने लगा है. देश के छह राज्यों में सूखे की घोषणा के बीच किसानों की आय, फसल उत्पादन और खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है. इसका असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं है, बल्कि खाद्य बाजार, आपूर्ति व्यवस्था और आम लोगों की जेब पर भी पड़ रहा है. एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, भारत को हर साल करीब 13 अरब अमेरिकी डॉलर यानी लगभग 1.1 लाख करोड़ रुपये का खाद्य नुकसान उठाना पड़ रहा है.
क्लाइमेट ट्रेंड्स की ओर से 4 नवंबर को नई दिल्ली में जारी श्वेत पत्र रिपोर्ट 'फ्रॉम रिस्क टू रेजिलिएंस: क्लाइमेट चेंज, इकोलॉजी एंड द फ्यूचर ऑफ इंडियन एग्रीकल्चर' में भारतीय कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का विश्लेषण किया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, तेज गर्मी, बेमौमस बारिश, सूखा और बाढ़ जैसी घटनाएं फसल उत्पादन के साथ-साथ कटाई के बाद होने वाले नुकसान को भी बढ़ा रही हैं.
रिपोर्ट में दिल्ली की आजादपुर मंडी का उदाहरण दिया गया है. साल 2024 में जो भारत का अब तक का सबसे गर्म साल रहा, एक फल विक्रेता को सिर्फ एक दिन में एक लाख रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ. सामान्य मौसम में दो दिन तक सुरक्षित रहने वाले आम तेज गर्मी के कारण एक ही दिन में खराब हो गए.
क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिसर्च लीड डॉ. पलक बल्यान के मुताबिक, भारत में खाद्य नुकसान केवल खेती से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि पूरी आपूर्ति व्यवस्था इससे प्रभावित हो रही है. उनके अनुसार, करीब एक-तिहाई फल और सब्जियां उपभोक्ताओं तक पहुंचने से पहले ही खराब हो जाती हैं. गर्मी के कारण दूध उत्पादन और मिट्टी की सेहत पर भी असर पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि इस नुकसान को कम करने के लिए बेहतर मौसम पूर्वानुमान के साथ-साथ कोल्ड स्टोरेज, भंडारण सुविधाओं, कृषि सलाह सेवाओं और किसानों की बाजार तक पहुंच को मजबूत करना जरूरी है.
सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के कार्यकारी निदेशक डॉ. जीवी रामंजनयुलु ने बताया कि देश के छह राज्यों ने सूखे की घोषणा की है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि बाकी राज्यों में हालात सामान्य हैं. एक ही राज्य के अलग-अलग जिलों और ब्लॉकों में भी सूखे की स्थिति अलग हो सकती है. उन्होंने कहा कि पिछले 50-60 वर्षों के अनुभव को देखें तो सूखे का संकट आगे भी बना रह सकता है. इस साल सूखे के प्रभाव आने वाले कई वर्षों तक दिखाई दे सकते हैं. उन्होंने फसल बीमा व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि जलवायु जोखिम बढ़ने के बावजूद किसानों को पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिल रही है. केवल बीमा के जरिए नुकसान की भरपाई करने के बजाय खेती में जोखिम कम करने पर ध्यान देना होगा.
रिपोर्ट के मुताबिक, अत्यधिक गर्मी के कारण भारत को हर साल करीब 2,661 करोड़ रुपये का नुकसान दूध उत्पादन में होता है. यह नुकसान लगभग 18 लाख टन दूध के बराबर है, जो देश के कुल दूध उत्पादन का करीब दो प्रतिशत है. इसके अलावा, देश की लगभग 40 प्रतिशत पशुधन आबादी बाढ़, सूखा, लू और दूसरी चरम मौसमी घटनाओं के प्रति संवेदनशील है. इससे पशुपालकों की आमदनी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ रहा है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि कमजोर कोल्ड चेन व्यवस्था के कारण हर साल करीब 13 अरब डॉलर का खाद्य नुकसान होता है. फल और सब्जियों का 40 प्रतिशत तक हिस्सा और अनाज का 5 से 6 प्रतिशत हिस्सा उपभोक्ताओं तक पहुंचने से पहले खराब हो जाता है. देश में केवल चार प्रतिशत ताजा कृषि उपज को ही कोल्ड चेन की सुविधा मिल पाती है. वहीं, 2 करोड़ हेक्टेयर से ज्यादा कृषि भूमि बाढ़, सूखा, चक्रवात, लू और शीतलहर जैसी आपदाओं से प्रभावित हुई है. यह देश के कुल बोए गए क्षेत्र का 14 प्रतिशत से अधिक है. रिपोर्ट के अनुसार, देश की करीब 45 प्रतिशत फसल उत्पादक भूमि बाढ़ के गंभीर जोखिम वाले क्षेत्रों में आती है.
रिपोर्ट में खेती में रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते इस्तेमाल पर भी चिंता जताई गई है. पिछले तीन दशकों में प्रति हेक्टेयर रासायनिक खाद की खपत दोगुने से ज्यादा हो गई है. साल 1990 में यह खपत 73.5 किलोग्राम थी, जो 2023 में बढ़कर 199 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई. रिपोर्ट के मुताबिक, वायु प्रदूषण के कारण फसलों को होने वाला नुकसान इतना अधिक है कि उससे करीब 9.4 करोड़ लोगों का पेट भरा जा सकता था. कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियां भारत के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 13.7 प्रतिशत योगदान देती हैं. इसमें पशुधन, धान की खेती और रासायनिक खाद का इस्तेमाल प्रमुख कारण हैं.
क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला ने कहा कि भारतीय कृषि पर एक साथ कई तरह के दबाव हैं. अल नीनो, कमजोर मिट्टी, गिरता भूजल स्तर और खेती में बढ़ते खर्च की वजह से किसानों की मुश्किलें बढ़ रही हैं. इसका असर आगे चलकर बाजार, खाद्य कीमतों और महंगाई पर भी पड़ सकता है.
रिपोर्ट में कृषि को जलवायु परिवर्तन के असर से बचाने के लिए कई सुझाव दिए गए हैं. इनमें टिकाऊ और जैविक खेती को बढ़ावा देना, किसानों को बेहतर प्रशिक्षण देना, मौसम आधारित फसल बीमा का विस्तार करना और सूखा-बाढ़ जैसी घटनाओं के लिए मजबूत चेतावनी व्यवस्था तैयार करना शामिल है. पूर्व कृषि सचिव टी. नंदकुमार ने कहा कि किसानों को सिर्फ मौसम और उत्पादन से जुड़े जोखिम ही नहीं, बल्कि सरकारी नीतियों के कारण होने वाले नुकसान से भी सुरक्षा मिलनी चाहिए. उन्होंने कृषि से जुड़े फैसले स्थानीय जरूरतों के हिसाब से लेने और राज्यों को अधिक अधिकार देने की जरूरत बताई.
वहीं, पूर्व मौसम वैज्ञानिक डॉ. आनंद शर्मा ने कहा कि किसानों को केवल मौसम की चेतावनी देना काफी नहीं है. उनके पास सिंचाई के साधन और जरूरी संसाधन भी होने चाहिए. अल नीनो वाले वर्षों में ज्यादा पानी मांगने वाली फसलों के बजाय सूखा सहन करने वाली फसलों को अपनाना उपयोगी हो सकता है. विशेषज्ञों ने खेती में रिमोट सेंसिंग, उपग्रह से मिलने वाले आंकड़ों और स्थानीय मौसम की सटीक जानकारी के इस्तेमाल पर भी जोर दिया है. इसके साथ ही जैव उर्वरकों और टिकाऊ कृषि पद्धतियों के लिए बजट बढ़ाने तथा किसानों की अतिरिक्त आय के नए रास्ते तैयार करने की सिफारिश की गई है.
रिपोर्ट का मुख्य संदेश है कि जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान के बाद मुआवजा देने के बजाय पहले से ऐसी व्यवस्था तैयार करनी होगी, जिससे नुकसान को कम किया जा सके। इसके लिए मिट्टी और पानी का संरक्षण, फसल विविधीकरण, बेहतर भंडारण, मजबूत आपूर्ति श्रृंखला और किसानों को समय पर आर्थिक मदद देना जरूरी है.