
महाराष्ट्र के अकोला जिले में पांच दिवसीय दीपावली उत्सव की शुरुआत वसुबारस के साथ हो गई है. इस मौके पर घुसर गांव के एक किसान परिवार ने गौ माता और बछड़े की पारंपरिक रीति-रिवाज से पूजा-अर्चना की. किसान परिवार ने इस परंपरा के जरिए बताया कि खेती-किसानी में गाय और बैलों का कितना महत्वपूर्ण योगदान है. अकोला जिले के घुसर गांव में किसान राजेंद्र पागरुत के परिवार ने वसुबारस का पर्व पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया. इस दौरान परिवार के सदस्यों ने गाय और बछड़े को हल्दी-कुमकुम लगाया, उनकी आरती उतारी और सुख-समृद्धि की कामना की. परिवार ने गौ माता के प्रति आभार जताते हुए दीपावली के पर्व की शुरुआत की.
वसुबारस को गोवत्स द्वादशी के नाम से भी जाना जाता है. दीपावली के पांच दिवसीय त्योहार में इस पर्व का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है. इस दिन गाय और उसके बछड़े की पूजा की जाती है. खासकर ग्रामीण इलाकों में किसान परिवार इस पर्व को अपनी खेती और पशुधन से जोड़कर देखते हैं. किसानों के लिए गाय केवल दूध देने वाला पशु नहीं है, बल्कि वह उनकी खेती-किसानी और ग्रामीण जीवन का भी अहम हिस्सा है. गाय का बछड़ा आगे चलकर बैल बनता है, जो खेतों की जुताई और दूसरे कृषि कार्यों में किसान की मदद करता है.
किसान राजेंद्र पागरुत के परिवार का कहना है कि वसुबारस के साथ ही दिवाली की वास्तविक शुरुआत होती है. भारत कृषि प्रधान देश है और यहां पशुधन का हमेशा से खेती में बड़ा योगदान रहा है. पहले के समय में बैल खेती का सबसे बड़ा सहारा हुआ करते थे. आज भले ही खेती में मशीनों का इस्तेमाल बढ़ गया है, लेकिन गाय और बैलों का महत्व आज भी बना हुआ है. परिवार का मानना है कि गौ माता और बैलों के बिना पारंपरिक खेती की कल्पना अधूरी है. इसलिए वसुबारस पर उनकी पूजा करना सिर्फ धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि उनके योगदान के प्रति सम्मान और कृतज्ञता जताने का भी अवसर है.
वसुबारस के साथ ही अकोला और आसपास के ग्रामीण इलाकों में दीपावली की तैयारियां तेज हो गई हैं. घरों में साफ-सफाई और पूजा की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं. बाजारों में भी त्योहार की रौनक दिखाई देने लगी है. इस दौरान पारंपरिक लोकगीत 'दिन-दिन दिवाली, गाय-म्हैस ओवाली' के जरिए भी ग्रामीण संस्कृति और पशुधन के प्रति सम्मान की झलक देखने को मिल रही है. दीपावली के पांच दिवसीय उत्सव में वसुबारस के बाद धनतेरस, नरक चतुर्दशी, लक्ष्मी पूजन और भाई दूज जैसे पर्व मनाए जाते हैं. इस तरह वसुबारस के मौके पर किसान परिवार ने गाय और बछड़े की पूजा कर नई पीढ़ी को भी अपनी कृषि संस्कृति और परंपराओं से जुड़े रहने का संदेश दिया.