
उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा है कि भारत में मछली पालन और मछली पकड़ने का काम तेजी से आगे बढ़ सकता है. इससे मछुआरों की कमाई बढ़ेगी और देश की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी. उन्होंने कहा कि इसके लिए समुद्र से मछली पकड़ते समय प्रकृति और समुद्री जीवों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है. अगत्ती में केंद्रीय मत्स्य मंत्रालय की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में उपराष्ट्रपति ने कहा कि समुद्र हजारों साल से लोगों को खाना और रोजगार देता आया है. इसलिए समुद्र को साफ और सुरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी है.
उन्होंने कहा कि मछली पकड़ते समय ऐसे तरीके अपनाने चाहिए, जिससे समुद्र और मछलियों को नुकसान न हो. उन्होंने मछुआरों से सरकार के नियमों का पालन करने की अपील की.
उपराष्ट्रपति ने कहा कि ब्लू रिवोल्यूशन यानी नीली क्रांति देश के विकास में बड़ा बदलाव ला सकती है. इसका मतलब है समुद्र और मछली पालन से जुड़े काम को बेहतर तरीके से आगे बढ़ाना. उन्होंने कहा कि इस काम से मछुआरों, मछली पालकों और समुद्र के पास रहने वाले लोगों को फायदा मिल सकता है. सरकार भी अलग-अलग योजनाओं की मदद सीधे मछुआरा परिवारों तक पहुंचाने की कोशिश कर रही है.
उपराष्ट्रपति ने युवाओं से कहा कि वे मछली पालन को केवल परिवार से चला आ रहा काम न समझें. आज इस क्षेत्र में नई मशीनों, विज्ञान और तकनीक की मदद से बहुत कुछ किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि युवा मछली पालन को एक नए और अच्छे करियर के रूप में देख सकते हैं. इसके लिए सरकार और संस्थानों को मछुआरों को सही जानकारी, तकनीक और पैसे की मदद देनी चाहिए.
उपराष्ट्रपति ने लक्षद्वीप को देश का ‘गहना’ बताया. उन्होंने कहा कि यहां मछली पालन और समुद्र से जुड़े कामों को बढ़ाने की बहुत बड़ी संभावना है. लक्षद्वीप में बड़ी संख्या में टूना मछली पाई जाती है. यहां मछली उत्पादन की क्षमता एक लाख टन से ज्यादा होने का अनुमान है. इसमें करीब 94 हजार टन टूना और उससे जुड़ी मछलियां शामिल हैं. जापान और दूसरे देशों में टूना की काफी मांग है.
राधाकृष्णन ने बताया कि भारत आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश है. दुनिया में होने वाली कुल मछली के करीब 8 प्रतिशत उत्पादन में भारत का योगदान है. मत्स्य क्षेत्र से करीब 3 करोड़ मछुआरों और मछली पालकों को रोजी-रोटी मिलती है. मछली लोगों के लिए भोजन और पोषण का भी एक अच्छा स्रोत है.
भारत की मछली और दूसरे समुद्री उत्पाद दुनिया के 120 से ज्यादा देशों में भेजे जाते हैं. पिछले वित्त वर्ष में भारत का सीफूड निर्यात 73,000 करोड़ रुपये से ज्यादा रहा. सरकार अब मछली पकड़ने और समुद्री उत्पादों के कारोबार में नई तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाना चाहती है. नावों की निगरानी, डिजिटल अनुमति और अंतरराष्ट्रीय प्रमाणपत्र जैसी सुविधाओं से भारतीय समुद्री उत्पादों को विदेशी बाजार में और जगह मिल सकती है.
लक्षद्वीप में मछली पालन को बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत 62 करोड़ रुपये से ज्यादा की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है. इन योजनाओं से मछुआरों को बेहतर सुविधाएं देने और उनकी कमाई बढ़ाने में मदद मिलेगी.
केंद्रीय मत्स्य मंत्री राजीव रंजन सिंह ने बताया कि लक्षद्वीप के समुद्र में 300 से ज्यादा तरह की सजावटी मछलियां पाई जाती हैं. इन मछलियों की दुनिया के कई देशों में मांग है. उन्होंने कहा कि अगर इन मछलियों को सही तरीके और सरकारी नियमों के अनुसार पकड़ा और विदेश भेजा जाए, तो इससे मछुआरों और महिला स्वयं सहायता समूहों की कमाई बढ़ सकती है.
मत्स्य मंत्री ने बताया कि देश में मछली उत्पादन तेजी से बढ़ा है. 2013-14 में मछली उत्पादन 95.7 लाख टन था, जो 2024-25 में बढ़कर 197.75 लाख टन हो गया. यानी इस दौरान उत्पादन करीब 105 प्रतिशत बढ़ा है. मछली का निर्यात भी बढ़ा है. 2013-14 में भारत ने 30,213 करोड़ रुपये की मछली और समुद्री चीजें विदेश भेजी थीं. 2024-25 में यह बढ़कर 62,408 करोड़ रुपये हो गया. 2025-26 में निर्यात करीब 73,890 करोड़ रुपये तक पहुंच गया.
सरकार का लक्ष्य मछली उत्पादन बढ़ाने के साथ समुद्र को सुरक्षित रखना भी है. अगर मछुआरे सही नियमों का पालन करें और नई तकनीक का इस्तेमाल करें, तो मछली पालन से ज्यादा कमाई हो सकती है. ब्लू रिवोल्यूशन का मकसद यही है कि समुद्र से मिलने वाले संसाधनों का सही इस्तेमाल हो, मछुआरों की आय बढ़े और समुद्र आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित रहे.
ये भी पढ़ें:
Animal Diet in Winter: सर्दियों में गाय-भैंस से भरपूर दूध चाहिए तो रोज खाने में दें ये खुराक
Sugar Price: चीनी के दाम घटाने की तैयारी, महाराष्ट्र में 15 दिन पहले शुरू हो सकती है गन्ने की पेराई